Hindi
Monday 21st of September 2020
  41
  0
  0

इमाम सज्जाद अलैहिस्लाम के विचार

शाबान की पांच तारीख है। ३८ हिजरी कमरी में शाबान महीने की पांच तारीख को ही पवित्र नगर मदीना में इमाम अली बिन हुसैन अर्थात हुसैन के बेटे अली का जन्म हुआ। ईरानी राजकुमारी शहरबानो आपकी माता हैं।

इमाम अली बिन हुसैन की बहुत सी उपाधियां हैं जिनमें ज़ैनुल आबेदीन और सज्जाद बहुत मशहूर हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के जन्म से संसार ज्ञान और अध्यात्म से प्रकाशमयी व ओत प्रोत हो गया।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के काल में राजनीतिक परिस्थितियां बहुत ही संवेदनशील और जटिल थीं। जब इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के पिता हजरत इमाम हुसैन ने अत्याचारी व धर्मभ्रष्ठ शासक यज़ीद की सरकार के विरुद्ध महाआंदोल किया और अपने ७२ साथियों साहियों के साथ कर्बला में शहीद हो गये और उनके परिजनों को बंदी बना लिया गया तो समाज में भय व आतंक का वातावरण व्याप्त हो गया था। पैग़म्बरे इस्लाम के नाती को शहीद करना और उनके परिजनों को बंदी बना लेना एसा अभूतपूर्व अपराध था जिसे देख व सुनकर लोग हतप्रभ एवं भयभीत हो गये थे।

इसी प्रकार इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का काल सामाजिक परिवर्तन का काल भी था। क्योंकि मुसलमानों ने बहुत से क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी और इन क्षेत्रों से मुसलमान शासकों को बहुत धन सम्पत्ति मिली थी जिसके कारण ये शासक एश्वर्य एवं विलासतापूर्ण जीवन व्यतीत करने में लीन हो गये थे। इसी मध्य ईश्वरीय धर्म इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को परिवर्तित किया जा रहा था और बनी उमय्या की सरकार ने बहुत से लोगों को किराये पर रख रखा था। इन लोगों का काम झूठी हदीसें गढ कर इस्लाम को परिवर्तित करना और उन्हें लोगों के मध्य प्रचलित करना था। इसका एक अन्य उद्देश्य लोगों को ईश्वरीय धर्म इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं से दूर कराना था। क्योंकि जब लोग धर्म से दूर हो जायेंगे तो उनसे हर प्रकार का गलत कार्य कराके अपने अवैध हितों की पूर्ति बड़ी सरलता से की जा सकती है।

विदित में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का व्यवहार लचक व नर्मी का सूचक था इस प्रकार से कि कुछ लोग यह सोचते थे कि इमाम सज्जाद के पास उपासना के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं है और वे सामाजिक एवं सांसारिक कार्यों से दूर हैं। यह उस स्थिति में था जब बनी उमय्या ने घुटन का वातावरण उत्पन्न कर रखा था जिससे लोग इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं से दूर हो गये थे। उस समय की परिस्थिति इस बात की कारण बनी कि इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं को पुनर्जीवित करने के लिए दूसरी पद्धति अपनाई। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने आध्यात्मिक एवं इस्लामी उद्देश्यों व आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए उपदेश और दुआ का मार्ग अपनाया। वास्तव में इमाम ने सही विश्वासों, आस्थाओं और विचारों को स्थानांतरित करने के लिए सर्वोत्तम मार्ग का चयन किया।

इस प्रकार की दुआ व नसीहत का एक उदाहरण वह दुआ है जिसे इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम प्रायः शुक्रवार को पढ़ा करते थे।

बर्ज़ख अर्थात मरने के बाद दो फरिश्ते मुन्किर और नकीर जिन आरंभिक चीज़ों के बारे में सवाल करेंगे वे यह हैं कि तुम्हारा ईश्वर कौन है जिसकी उपासना करते हो, वह पैग़म्बर कौन जिसे तुम्हारे पास भेजा गया है, वह धर्म क्या है जिसका तुम अनुसरण करते हो और वह कौन सी आसमानी किताब है जिसकी तुम तिलावत करते हो और तुम्हारा इमाम कौन है जिसकी विलायत तुमने स्वीकार की है यानी उसे ईश्वरीय प्रतिनिधि मानते हो"

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने अपनी दुआ के अंदर एकेश्वरवाद, नबुअत, अर्थात पैग़म्बरी , इमामत और प्रलय जैसे महत्वपूर्ण विषयों को बयान कर दिया। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इमामों की भाषा में इमामत का अर्थ सरकार होता है।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की दुआ में जिस इमाम का वर्णन किया गया वह वही इमाम है जो पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी है। दूसरे शब्दों में उस पर लोगों के सांसारिक और धार्मिक मामलों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी है और उसके अनुसरण व उसके आदेशों का मानना पैग़म्बरे इस्लाम के आदेशों के मानने जैसा अनिवार्य है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के काल के लोग इस्लाम से इस सीमा तक दूर हो गये थे कि वे सोचते थे कि एक व्यक्ति उनके सांसारिक मामलों में उन पर शासन कर रहा है और दूसरा व्यक्ति उनके धार्मिक मामलों में उनका जिम्मेदार है। वास्तव में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने दुआ और उपदेशों के परिप्रेक्ष्य में इमामत के मामले को बयान कर दिया, लोगों को इस्लामी सरकार एवं समाज के नेतृत्व के मामले से अवगत करा दिया और यह वह चीज़ है जिसके बारे में बनी उमय्या की सरकार बात करना व सुनना तक पसंद नहीं करती थी।

अबु हमज़ा सोमाली नाम के इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के एक बहुत अच्छे व निष्ठावान अनुयायी थे। वे इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के निकटवर्ती लोगों के लिए बयान करते और कहते हैं कि इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम झूठे आराम से लोगों को दूर रहने को कहते हैं क्योंकि यह झूठा आराम दूसरों पर अत्याचार किये बिना प्राप्त नहीं हो सकता। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम अपने अनुयाइयों का ध्यान इस बिन्दु की ओर खींचते हैं कि अमवी सरकार अगर लोगों को आराम देती है तो उसका कारण यह है कि वह लोगों का ईमान ले लेना चाहती है और अगर उन्हें कोई विशिष्टता देती है तो इसकी वजह यह है कि वह अपनी अत्याचारी सरकार के प्रति लोगों के विरोध को कम करना चाहती है।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम नसीहत करते हुए इस प्रकार फरमाते हैं" हे मोमिनो! तुम्हें अत्याचारी और दुनिया से प्रेम करने वाले अत्याचारी धोखा न दें जो अपना दिल दुनिया से लगा बैठे हैं, उसके प्रेमी हो गये हैं और संसार के क्षणिक आनंदों के पीछे भाग रहे हैं। इसके बाद इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम अपने अनुयाइयों को अत्याचार से संघर्ष के मार्ग में मज़बूती से बाक़ी व जमे रहने के लिए पहले के लोगों के अनुभवों और उन दबावों को बयान करते हैं जो मोआविया और उसके बेटे यज़ीद तथा मरवान के काल में पैग़म्बरे इस्लाम एवं उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करने वालों के साथ हुए हैं। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" मेरी जान की क़सम आप लोग अतीत की उस बुराई व फितने से सही सलामत बाह आ गये हैं जो बीत गये हैं जबकि तुम लोग सदैव पथभ्रष्ठ लोगों, धर्म में नई चीज़ उत्पन्न करने वालों और ज़मीन में बुराई फैलाने वालों से दूरी करते थे। तो अब भी ईश्वर से सहायता मांगो और ईश्वर तथा उसके प्रतिनिधि के आदेशों का पालन करो कि वह वर्तमान शासकों से योग्य व बेहतर है"

अबु हमज़ा सोमाली नाम की प्रसिद्ध दुआ में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम इस बात को स्पष्ट शब्दों में बयान करते हैं कि ईश्वर, उसके पैग़म्बर के बाद किसके आदेशों का पालन करना चाहिये। इमाम अपने चाहने वालों और अनुयाइयों के मस्तिष्क में संदेह उत्पन्न होने से रोकने के लिए फरमाते हैं" ईश्वर ने जिसके अनुसरण को अनिवार्य करार दिया है उसे हर चीज़ पर प्राथमिकता दो और कभी भी मामलों में अत्याचारियों के अनुसरण को ईश्वर और उसके प्रतिनिधियों के अनुसरण पर प्राथमिकता न दो। पापी लोगों के साथ उठने बैठने तथा फासिक, फाजिर और भ्रष्ठ लोगों के साथ सहकारिता करने से दूरी करो और उनके फितनों व बुराइयों से बचो, उनसे दूरी करो। जान लो कि जो भी ईश्वरीय प्रतिनिधि का विरोध करेगा और ईश्वर के धर्म के अतिरिक्त किसी और धर्म का पालन करेगा और ईश्वरीय मार्गदर्शन के मुकाबले में अपनी मनमानी करेगा तो वह नरक की आग में गिरफ्तार होगा"

संघर्ष और प्रचार की इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की एक शैली दुआ थी। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने दुआ के परिप्रेक्ष्य में बहुत से इस्लामी ज्ञानों व विषयों को बयान किया और उन सबको सहीफये सज्जादिया नाम की किताब में एकत्रित किया गया है। इस किताब को अहले बैत की इंजील और आले मोहम्मद की तौरात कहा जाता है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम अपनी दुआओं के माध्यम से लोगों के मन में इस्लामी जीवन शैली के कारणों को उत्पन्न करते हैं। इमाम ने दुआ को महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन बताया वह भी उस काल में जब लोग दुनिया के पीछे भाग रहे थे। रोचक बात यह है कि इमाम जगह जगह पर इमामत और अहलेबैत की सत्यता को बयान करते थे। जैसाकि हम सहीफए सज्जादिया की ४६वीं दुआ में पढ़ते हैं" हे ईश्वर यह खिलाफत तेरे प्रतिनिधियों, तेरे चुने हुए और तेरे अमानतदारों का स्थान है कि जिसमें ऊंचे दर्जे हैं जो इनसे विशेष कर दिये गये हैं परंतु दूसरों ने अवैध ढंग से उस पर कब्ज़ा कर लिया है यहां तक कि तेरे प्रतिनिधियों से अधिकार छीन लिया गया है और अब वे देख रहे हैं कि तेरे आदेश को परिवर्तित कर दिया गया है और तेरी किताब को कोने में डाल दी गयी है और तेरे वाजिबात अर्थात जिसे तूने निर्धारित किया है, इधर उधर हो गये हैं और तेरे पैग़म्बर की परम्परा व शैली को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है"

इमाम सज्जाद अलैहिस्लाम अपनी दुआओं में बारम्बार पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरुद व सलाम की पुनरावृत्ति करते हैं और इससे उनका उद्देश्य पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के स्थान को स्पष्ट करना था। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर एक बार फिर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और आज के कार्यक्रम का समापन उनकी दुआ के एक स्वर्णिम वाक्य से कर रहे हैं। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम फरमाते हैं" हे ईश्वर हम सब के कार्यों का अंत अच्छा कर"

 


source : tvshia.com
  41
  0
  0
امتیاز شما به این مطلب ؟

latest article

इस्लामी संस्कृति व इतिहास-3
बनी उमैय्यह इस्लाम से बदला ले रहे थे।
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
वहाबियत, वास्तविकता व इतिहास 5
ईश्वरीय दूतों का वियोग
इस्लामी संस्कृति व इतिहास-4
वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-9
बेसत से पहले पैग़म्बरे अकरम(स.)का ...
अज़ादारी परंपरा नहीं आन्दोलन है 1
हज़रत रोक़य्या बिन्तुल हुसैन ...

latest article

इस्लामी संस्कृति व इतिहास-3
बनी उमैय्यह इस्लाम से बदला ले रहे थे।
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
वहाबियत, वास्तविकता व इतिहास 5
ईश्वरीय दूतों का वियोग
इस्लामी संस्कृति व इतिहास-4
वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-9
बेसत से पहले पैग़म्बरे अकरम(स.)का ...
अज़ादारी परंपरा नहीं आन्दोलन है 1
हज़रत रोक़य्या बिन्तुल हुसैन ...

 
user comment