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Tuesday 16th of July 2019
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अब्बासी हुकूमत का, इमाम हसन असकरी अ.स. से डरने का कारण

यह बात हम सभी जानते हैं कि बनी अब्बास ने अहलेबैत अ.स. के नाम पर बनी उमय्या का तख़्ता पलटते हुए यही कहा था कि हुकूमत और ख़िलाफ़त पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. का हक़ है, लेकिन बनी अब्बास की नियत में खोट था, वह बनी उमय्या का तख़्ता पलटने में कामयाब ज़रूर हो गए लेकिन उन्होंने न केवल हुकूमत और ख़िलाफ़त अहलेबैत अ.स. के हवाले नहीं की बल्कि बनी उमय्या ही की तरह अहलेबैत अ.स. को जितनी पीड़ा और तकलीफ़ उन से हो सकती थी देते रहे। अहलेबैत अ.स. की ज़िंदगी कठिन परिस्तिथियों में ज़रूर गुज़री लेकिन उन्होंने कभी हालात से हार मान कर अपनी ज़िम्मेदारियों से हाथ खड़े नहीं किए, बल्कि जब भी जहां भी जैसी भी ज़रूरत दीन को और लोगों को हुई अहलेबैत अ.स. ने हर तरह का ख़तरा मोल लेते हुए वहां दीन की भी मदद की और लोगों की सहायता भी की। यही कारण है कि हुकूमत ने इन्हें हमेशा कभी घर तो कभी सरकारी जेल में क़ैद कर के रखा, क्योंकि हुकूमत को अपनी ग़लतियों और लोगों के साथ किए गए धोखे के बारे में मालूम था इसी लिए वह हमेशा इमामों से डरी हुई रहती थी कि कहीं ऐसा न हो लोगों का समर्थन अहलेबैत अ.स. को मिल जाए और वह हमारी हुकूमत ख़त्म हो जाए। इमाम हसन असकरी अ.स. भी अहलेबैत अ.स. के इसी इतिहास का हिस्सा हैं, जिन पर हुकूमत से जितना हो सका अत्याचार किया आपको पीड़ी दी, लेकिन इन सबके बावजूद हुकूमत को हमेशा आप से डर लगा रहता था, जब कि न आपके पास हुकूमत की तरह फ़ौज होती थी और न ही हथियार और न ही जंग के लिए और दूसरी चीज़ें, लेकिन फिर भी हुकूमत आपसे भयभीत रहती थी। हम इस लेख में इमाम हसन असकरी अ.स. से हुकूमत के डरे रहने के कुछ कारणों को आप के लिए बयान कर रहे हैं।
1. उस समय विशेष कर इराक़ में शियों की तादाद बहुत अधिक हो चुकी थी, अत्याचारी हुकूमत, अल्वियों (इमाम अली अ.स. की पैरवी करने वाले और उस समय इमाम हसन असकरी अ.स. का साथ देने वाले) के सत्ता में आने से भयभीत हो रही थी, और उन्हें डर था कि कहीं इमाम हसन असकरी अ.स. के नेतृत्व में अब्बासियों का तख़्ता पलट न हो जाए। शिया इस दौर में इतने मज़बूत हो चुके थे कि अहमद इब्ने उबैदुल्लाह इब्ने ख़ाक़ान का कहना है कि जाफ़रे कज़्ज़ाब (यह इमाम हसन असकरी अ.स. के भाई थे जिन्होंने इमामत का झूठा दावा किया था इसीलिए इनके नाम के साथ हमेशा के लिए कज़्ज़ाब यानी झूठ बोलने वाला जुड़ गया) एक दिन मेरे वालिद जिनका अब्बासी ख़लीफ़ा के दरबार में ख़ास पद था आए और कहा कि मेरे भाई की इमामत मुझे दिलवा दे, उसके बदले में मैं 20 हज़ार दीनार हर साल तुम्हारे लिए भेजता रहूंगा मेरे वालिद ने कहा, ऐ अहमक़ और बेवक़ूफ़ अब्बासी ख़लीफ़ा ने हाथ में तलवार ले कर तेरे भाई (इमाम हसन असकरी अ.स.) की इमामत को मानने वाले शियों को डरा कर उनकी इमामत के अक़ीदे से रोकना चाहा लेकिन वह न रोक सका, इसलिए अगर सच में शिया तुझे इमाम समझते और मानते हैं तो उसके लिए तुझे मेरी या ख़लीफ़ा की मदद की ज़रूरत नहीं है, लेकिन अगर शिया तुझे इमाम नहीं मानते तो याद रख तू किसी भी रास्ते से अपने को उनका इमाम नहीं बना सकता। मेरे वालिद ने उसके बाद से जाफ़र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और न ही कभी मुलाक़ात की अनुमति दी। (उसूल काफ़ी, जिल्द 1, पेज 505)
2. शिया इमाम हसन असकरी अ.स. और उनकी बातों पर पूरी तरह से ध्यान देते थे, और ग़रीब शियों की मदद कर के उनकों मज़बूत करने के लिए जो मालदार थे वह अपनी दौलत भी इमाम के हवाले कर देते थे, जैसा कि इमाम ने उन्हीं पैसों में से एक लाख सोने के सिक्के अपने भरोसेमंद सहाबी अली इब्ने जाफ़र हुमानी को दिए ताकि वह हज के मौक़े पर ग़रीब शियों में बांट सकें, दोबारा फिर एक लाख दीनार भिजवाए, तीसरी बार फिर शियों का मदद करते हुए उन लोगों में बांटने के लिए 30 हज़ार दीनार उन्हीं को दिए। (अल-ग़ैबत, शैख़ तूसी, पेज 212)
3. इमाम हसन असकरी अ.स. से हुकूमत के भयभीत रहने का एक और कारण आपकी राजनितिक गतिविधियां थीं, आपका अपने सहाबियों के नाम ख़त लिखना, क़ासिद का भेजना और शागिर्दों की तरबियत इन सभी चीज़ों से हुकूमत डरी हुई थी, और यही वह चीज़ें हैं जिनके आधार पर कहा जाता है कि इमाम कभी भी अपने आपको बातिल और अत्याचारी हुकूमत के सामने समर्पण नहीं करता बल्कि वह उस बातिल और ज़ालिम हुकूमत के विरुध्द जिस तरह भी और जो भी गतिविधि मुमकिन होती है उसे अंजाम देता है।
4. एक और सबसे अहम कारण जो बनी अब्बास के हाकिमों को परेशान किए था वह इमाम महदी अ.स. का इमाम हसन असकरी अ.स. का बेटा होना है, अनेक हदीसों के माध्यम से यह बात प्रमाणित है कि इमाम महदी अ.स. ज़ुहूर करेंगे, और जितनी भी बातिल, पापी और अत्याचारी हुकूमतें हैं सबका तख़्ता पलट इमाम महदी अ.स. के हाथों ही होगा, दूसरी ओर से उन लोगों ने यह भी सुन रखा था कि पूरी दुनिया से अत्याचार और अपराध को मिटाने वाला इमाम हसन असकरी अ.स. का ही बेटा होगा, इसी कारण हमेशा डरे हुए रहते थे, इस बात से यह भी समझ में आता है कि इमाम महदी अ.स. 255 हिज्री यानी अपनी पैदाइश से लेकर 260 हिजरी यानी इमाम हसन असकरी अ.स. की शहादत के समय तक आपसे केवल क़रीबी और वफ़ादार सहाबी ही मिल सकते थे।
मोहद्दिस क़ुम्मी इस बारे में लिखते हैं कि बनी अब्बास के तीन ख़लीफ़ाओं ने इमाम हसन असकरी अ.स. को क़त्ल करने की साज़िश की, क्योंकि उन लोगों ने सुन रखा था कि इमाम महदी अ.स. आपके बेटे हैं, इसीलिए उन लोगों ने कई बार आपको जेल में क़ैद कर के रखा। (अनवारुल बहीय्या, पेज 490) इसी तरह हदीस में मौजूद है कि इमाम महदी अ.स. की विलादत के समय इमाम हसन असकरी अ.स. ने फ़रमाया ज़ालिम सोंच रहे थे कि मुझे क़त्ल कर दें ताकि मेरी नस्ल ख़त्म हो जाए, लेकिन अब वह बताएं कि अल्लाह की ताक़त के आगे उन्होंने अपनी ताक़त को कैसा पाया? (बिहारुल अनवार, जिल्द 50, पेज 214)
ऊपर दी गई बातें एक ओर से अब्बासी ख़लीफ़ा के भयभीत होने का कारण बनीं तो दूसरी ओर से यही इमाम हसन असकरी अ.स. और आपके सहाबियों को पीड़ा पहुंचाने का भी कारण बनीं। इमाम हसन असकरी अ.स. अपने सहाबियों और चाहने वालों की जान बचाने के लिए इस बात पर ज़ोर देते थे कि जितना हो सके छिप कर आपस में मिलो, जैसा कि आपके पहले नाएब उस्मान इब्ने सईद अम्री ने तेल की एक दुकान का सहारा लेते हए लोगों से मिलना शुरू किया और उसी की आड़ में इमाम अ.स. की ओर से मिले दिशा निर्देशों को उनके चाहने वालों तक पहुंचाते थे। (सफ़ीनतुल बिहार, जिल्द 6, पेज 143)

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