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Friday 14th of December 2018
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हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इरशाद

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इरशाद

१. मुसलमान वह शख़्स है जिसकी ज़बान और जिसके हाथों से मुसलमान महफ़ूज़ (सुरक्षित) रहें।


२. हर रंज व ग़म और ख़ुशी व मसर्रत की इन्तेहा (हद) है सिवाय जहन्नमियों के रंज व ग़म की जिसकी कोई इन्तेहा (हद) नहीं।


३. जब किसी काम का इरादा करो उसके नताएज (नतीजे का बहु वचन) को सोच लो अगर अच्छा है तो इक़दाम (क़दम बढ़ाओ) करो वरना इज्तेनाब (बचो) करो।


४. मुसलमान वह है जिससे लोगों की जान व माल महफ़ूज़ रहे।


५. सबसे होशियार वह शख़्स है जो अल्लाह से ज़्यादा डरे और उसकी इताअत (आदेशानुपालन) ज़्यादा करे।


६. जो दूसरों की ख़ताओं (त्रुटियों) से दरगुज़र करता है अल्लाह उसके गुनाहों से दरगुज़र करेगा।


७. जो शख़्स ईमान के मज़े को चखना चाहता है वह लोगों से सिर्फ़ अल्लाह के लिये मोहब्बत (प्रेम) करे।


८. किसी मुसलमान के लिये यह रवा नहीं के वह अपने बरादरे इमानी से 3दिन से ज़्यादा (ग़ुस्से की वजह से) मेल मिलाप न रखे।


९. सबसे अहम ज़ख़ीरा मुसीबत से दिनों में सब्र (सहनशीलता) है जो शख़्स सब्र को अपना शआर बना ले फिर उसे हादसे (घटनाओं) का ख़ौफ़ (भय) नहीं।


१०. सब्र (सहनशीलता) और नेकी ,बुर्दबारी और ख़ुश अख़लाकी (सुशीलता) पैग़म्बरों (ईश्वरीय दूत ,अवतार) की सीरत है।


११. इन्सान की यह कितनी बड़ी कमज़ोरी है के दूसरो के ऐब को शुमार करता है और वही चीज़ अपने बारे में भूल जाता है।


१२. किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म (अन्याय) करना ज़ुल्म की सबसे बड़ी क़िस्म है।


१३. ख़ुदग़र्ज़ी और ख़ुदपसन्दी नादानी की अलामत है।


१४. अपने माल से अपनी आबरू की हिफ़ाज़त करो यह एक अच्छा काम है।


१५. अक़्लमन्द वह शख़्स है जो आख़ेरत और उक़बा (यमलोक) की फ़लाह (अच्छाई) के लिये कोशां (प्रयत्नशील) रहे।


१६. परहेज़गार (बुराई से बचने वाले) बनों क्योंकि तक़वा (आन्तरिक संयम ,ईशवर से भय) बेहतरीन ख़ज़ाना है और ज़बरदस्त मुहाफ़िज़ है।


१७. क्या कहना उस शख़्स का जो अपने नफ़्स (आत्मा) की इस्लाह (शुध्दि ,त्रुटियों का सुधार) करे और जायज़ जराय (उचित तरीक़े से) से रोज़ी हासिल करे।


१८. झूठों की दोस्ती से बचो क्योंकि उनकी दोस्ती (मित्रता) ऐसा सराब (धोका) है जो दूर की चीज़ को नज़दीक और नज़दीक की चीज़ को दूर दिखाती है।


१९. अपने माल और अपनी रविश (तरीके) में हमआहंगी (मेल मिलाप) रखो यह बुज़ुर्गवारी (बड़ापन) की अलामत है.


२०. (इसका ख़्याल रखो के) तुम्हारें हमनशीं (साथ उठने बैठने वाला) नेक लोग हों और तुम्हारे दोस्त परहेज़गार (बुराई से बचने वाला) हो।


२१. ख़ुदपसन्द शख़्स अपने मलामत करने वालों में इज़ाफ़ा करता रहता है।


२२. पड़ोसियों से ख़ुश अख़लाक़ी (सुशीलता) का बर्ताव (व्यवहार) करो।


२३. हर चीज़ का एक मअदन (खान) होता है तक़वे (आन्तरिक संयम) का मअदन (खान) ख़ुदाशुनास (न्यायवान) लोगों का दिल है।


२४. तमाम बुराईयों की कुंजी गुस्सा (क्रोध) है।


२५. इबादतगुज़ार (तपस्या करने वाला) वह शख़्स है जो वाजेबात (जिसके न करने में पाप हो) को पूरा करे।


२६. अहमक़ (बेवकूफ़) का दिल उसकी ज़बान पर है अक़्लमन्द (बुध्दिमान) की ज़बान उसके दिल में है।


२७. जो शख़्स हक़ से किनारा कशी (दूरी) करता है ज़लील हो जाता है।


२८. हसद और कीना (मन में शत्रुता) इन्सान की मसर्रतों (ख़ुशियों) को ख़त्म करने में सबसे ज़्यादा मोस्सर (प्रभावपूर्ण) है।


२९. तमाम बुराईयों की किलीद (कुंजी) झूठ है झूठ के ज़रिये इन्सान फ़क़्र (ग़रीबी) में मुबतला होता है।


३०. अक़्लमन्द वह है जो इलाही अहकामात (ईशवरीय आदेश) के आगे सर झुकाये ,ऐहतियात और दूरअन्देशी को अपनाये।


३१. होशियार वह है जिसका आज कल से बेहतर हो और बुराईयों के दरवाज़े अपने ऊपर बन्द कर ले।


३२. ख़ुदावन्दे आलम के नज़दीक शराफ़त व बुज़ुर्गी आमाल के ज़रिये है ज़बानी नहीं।


३३. बदतरीन शख़्स वह है जिससे किसी ख़ैर की उम्मीद (आशा) नहीं और उसके शर (बुराई) से अमान (रक्षा) नहीं।


३४. सख़ावत (ईशवरीय मार्ग में धन वितरित करना) बुज़ुर्गी (बड़ापन) की अलामत (चिन्ह) है और पाकदामनी (नेकचलनी ,सदाचार) तमाम ख़ूबियों (अच्छाईयों) का सरचश्मा (स्त्रोत) है।


३५. बेकार व बेतुकी बातों से इज्तेनाब (बचने) करो क्योंकि बात चीत उसी क़द्र काफ़ी है जिससे मफ़हूम (मतलब) अदा हो जाये।


३६. नेक काम बुरी मौत से बचाते है और हर नेक काम सदक़ा (दान) है।


३७. ख़ुदावन्दे आलम ने बदज़बानों पर जन्नत हराम कर दी है और बदख़ुल्क़ी (दुर्व्यवहार) बदबख़्ती की अलामत है।


३८. किसी नादान से अगर नेक काम हो तो उसे क़ुबूल (स्वीकार) कर लो अगर किसी दानिशमन्द (बुध्दिमान) की लग़्ज़िश (त्रुटि) ज़बान पर देखो तो माफ़ कर दो।


३९. ख़ुदावन्दे आलम उस शख़्स को पसन्द नहीं करता जो अपने दुनयावी मामेलात में बड़ाई करे और आख़ेरत (परलोक) के मसाएल में जाहिल हो।


४०. अगर कोई बाइज़्ज़त ज़लील और कोई सरवतमन्द (धनी) ग़रीब हो जाये तो उस पर रहम करो।


(सलवात)

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