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Tuesday 26th of September 2017
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इमाम अली (अ) की ख़िलाफ़त के लिये पैग़म्बरे अकरम (स) की तदबीरें

क़ारेईने केराम, हमने यह अर्ज़ किया है कि पैग़म्बरे अकरम (स) को अपना जानशीन और ख़लीफ़ा मुअय्यन करना चाहिये, लिहाज़ा ख़लीफ़ा को मुअय्यन करना शूरा पर छोड़ देने वाला नज़रिया बातिल हो चुका है और हमने यह भी अर्ज़ किया कि पैग़म्बरे अकरम (स) की जानशीनी की लियाक़त व सलाहियत सिर्फ़ अली बिन अबी तालिब (अ) में थी, क्यो कि आपकी ज़ाते मुबारक में तमाम सिफ़ात व कमालात जमा थे और आप तमाम असहाब से अफज़ल व आला थे।

अब हम देखते है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) की जानशीनी और ख़िलाफ़त के लिये क्या क्या तदबीरें सोचीं हैं।

हम पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ से हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त व जानशीनी के लिये सोची जाने वाली तदबीरों को तीन क़िस्मों में ख़ुलासा करते हैं:
हज़रत अली (अ) की बचपन से तरबीयत करना, जिसकी बेना पर आप ने कमालात व फज़ायल और मुख़्तलिफ़ उलूम में मखसूस इम्तियाज़ हासिल कर लिया। आपकी विलायत व इमामत के सिलसिले में बयानात देना। ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों में मख़सूस तदबीरों के साथ अमली तौर पर विलायत का ऐलान करना।


अ.तरबीयती तैयारी

चूँकि तय यह था कि हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ), रसूले ख़ुदा के ख़लीफ़ा और जानशीन बनें, लिहाज़ा मशीयते इलाही यह थी कि इसी अहदे तफ़ूलीयत से मरकज़े वहयी और रसूले ख़ुदा (स) की आग़ोश में तरबीयत पायी।

1. हाकिम नैशापूरी तहरीर करते है: अली बिन अबी तालिब (अ) पर ख़ुदावंदे आलम की नेमतों में से एक नेमत उनकी तक़दीर थी, क़ुरैश बेशुमार मुश्किलात में गिरफ़्तार थे, अबू तालिब की औलाद ज़्यादा थीं, रसूले खु़दा ने अपने चचा अब्बास (जो बनी हाशिम में सबसे ज़्यादा मालदार शख्सियत थी) से फरमाया: या अबुल फ़ज़्ल, तुम्हारे भाई अबू तालिब अयालदार हैं और सख़्ती में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं, उनके पास चलते हैं ताकि उनको बोझ को कम करें, मैं उनके बेटों में एक को ले लेता हूँ और आप भी किसी एक फ़रजंद को इंतेख़ाब कर लें, ताकि उनको अपनी किफ़ालत में ले लें, चुनाँचे जनाबे अब्बास ने क़बूल कर लिया और दोनो जनाबे अबू तालिब के पास आये और मौज़ू को उनके सामने रखा, जनाबे अबू तालिब ने उनकी बातें सुन कर अर्ज़ किया: अक़ील को मेरे पास रहने दो, बक़िया जिस को भी चाहो इँतेख़ाब कर लो, पैग़म्बरे अकरम (स) ने अली (अ) को इँतेख़ाब किया और जनाबे अब्बास ने जाफ़र को, हज़रत अली (अ) बेसत के वक़्त तक पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ रहे और आँ हज़रत (स) की पैरवी करते रहे और आपकी तसदीक़ की। (मुसतदरक हाकिम जिल्द 3 पेज 182)

2. उस ज़माने में पैग़म्बरे अकरम (स) नमाज़ के लिये मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा) में जाते थे, उनके पीछे पीछे अली (अ) और जनाबे ख़दीजा जाते थे और आँ हज़रत (स) के साथ मल ए आम में नमाज़ पढ़ते थे, जबकि उन तीन अफ़राद के अलावा कोई नमाज़ नही पढ़ता था। (मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 209, तारीख़े तबरी जिल्द 2 पेज 311)

अब्बाद बिन अब्दुल्लाह कहते हैं: मैंने अली (अ) से सुना कि उन्होने फ़रमाया: मैं ख़ुदा का बंदा और उसके रसूल का बरादर हूँ और मैं ही सिद्दीक़े अकबर हूँ, मेरे बाद यह दावा कोई नही कर सकता मगर यह कि वह झूठा और तोहमत लगाने वाला हो, मैंने दूसरे लोगों से सात साल पहले रसूले अकरम (स) के साथ नमाज़ पढ़ी। (तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 56)

इब्ने सब्बाग़ मालिकी और इब्ने तलहा साफ़ेई वग़ैरह नक़्ल करते हैं: रसूले अकरम (स) बेसत से पहले जब भी नमाज़ पढ़ते थे, मक्के से बाहर पहाड़ियों में जाते थे ताकि मख़्फ़ी तरीक़े से नमाज़ पढ़ें और अपने साथ हज़रत अली (अ) के साथ हज़रत अली (अ) को ले जाया करते थे और दोनो साथ में जितनी चाहते थे नमाज़ पढ़ते थे और फिर वापस आ जाता करते थे। (अल फ़ुसुलुल मुहिम्मह पेज 14, मतालिबुस सुऊल पेज 11, तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 58)

3. इमाम अली (अ) नहजुल बलाग़ा में उन दोनो की इस तरह तौसीफ़ फ़रमाते हैं:

हदीस (नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 192)

तुम्हे मालूम है कि रसूले अकरम (स) से मुझे किस क़दर क़रीबी क़राबत और मख़्सूस मंज़िलत हासिल है, उन्होने बचपने से मुझे अपनी गोद में इस तरह जगह दी कि मुझे अपने सीने से लगाये रखते थे, अपने बिस्तर पर जगह देते थे, अपने कलेजे लगा कर रखते थे और मुझे मुसलसल अपनी ख़ूशबू से सरफ़राज़ फ़रमाया करते थे और ग़ज़ा को अपने दाँतों से चबा कर मुझे खिलाया करते थे, न उन्होने मेरे किसी बयान में झूट पाया और न मेरे किसी अमल में ग़लती देखी और अल्लाह ने दूध बढ़ाई के दौर से ही उनके साथ एक अज़ीम तरीन मुल्क को कर दिया था जो उनके साथ बुजुर्गियों के रास्ते और बेहतरीन अख़लाक़ के तौर तरीक़े पर चलता रहता था और रोज़ाना मेरे सामने अपने अख़लाक़ का निशाना पेश करते थे और फिर मुझे उसकी इक्तेदा करने का हुक्म दिया करते थे।

वह साल में एक ज़माना ग़ारे हिरा में गुज़ारते थे जहाँ सिर्फ़ मैं उन्हे देखता था और कोई दूसरा न होता था, उस वक़्त रसूले अकरम (स) और ख़दीजा के अलावा किसी घर में इस्लाम का गुज़र न हुआ था और उनमें तीसरा मैं था, मैं नूरे वहयी रिसालत का मुशाहेदा किया करता था और ख़ूशबु ए रिसालत से दिमाग़ मुअत्तर रखता था।

मैं ने नुज़ूले वहयी के वक़्त शैतान की चीख़ की आवाज़ सुनी थी और अर्ज़ किया था: या रसूल्लाह, यह चीख़ कैसी थी? तो फ़रमाया यह शैतान है जो अपनी इबादत से मायूस हो गया है. तुम वह सब कुछ देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ और वह सब कुछ सुन रहे हो जो मैं सुन रहा हूँ, सिर्फ़ फ़र्क़ यह है कि तुम नही हो लेकिन मेरे वज़ीर भी हो मंज़िल ख़ैर पर भी हो।

4. जब पैग़म्बरे अकरम (स) ने मदीने की तरफ़ हिजरत करना चाही तो हज़रत अली (अ) को इँतेख़ाब किया ताकि वह आपके बिस्तर सो जायें और (रसूले अकरम (स) के पास) मौजूद अमानतों को उनके मालिकों तक पहुचा दें और फिर बनी हाशिम की औरतों को लेकर मदीने की तरफ़ हिजरत कर जायें। (मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 348, तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 99, मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 4, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 13 पेज 262)

5. रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को उनकी जवानी के आलम में अपना दामाद बना लिया और दुनिया की बेहतरीन ख़ातून हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) से आपका निकाह कर दिया, यह इस आलम में था कि अबू बक्र व उमर के रिश्ते को रद्द कर दिया था। (अल ख़सायस पेज 102)

पैग़म्बरे अकरम (स) ने शादी के मौक़े पर (जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स)) से फ़रमाया: मैंने तुम्हारी शादी ऐसे शख्स से की है जो इस्लाम में सबसे पहला, इल्म में सबसे ज्यादा और हिल्म में सबसे अज़ीम हैं। (मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 26)

6.अक्सर जंगों में मुसलमानों या मुहाजेरीन का परचम हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) के हाथों में होता था। (अल इसाबह जिल्द 2 पेज 30)

7. हज़रत अली (अ) हुज्जतुल वेदाअ में पैग़म्बरे अकरम (स) की क़ुर्बानी में शरीक थे। (कामिले इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 302)

8. पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी हयाते तैय्यबा में आपको एक ऐसा मख़्सूस इम्तियाज़ दे रखा है कि जिसमें कोई दूसरा शरीक नही था, यानी आँ हज़रत (स) ने इजाज़त दे रखी थी कि हज़रत अली (अ) सहर के वक़्त आपके पास आये और गुफ़्तगू करें। (अल ख़सायस हदीस 112)

इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: मैं पैग़म्बरे अकरम (स) से दिन रात में दो बार मुलाक़ात करता था, एक दफ़ा रात में और एक दफ़ा दिन में। (अस सुननुल कुबरा जिल्द 5 पेज 1414 हदीस 8520)

9. जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आयत नाज़िल हुई:

(सूरह ताहा आयत 132)

अपने अहल को नमाज़ का हुक्म दें।

पैग़म्बरे अकरम (स) नमाज़े सुबह के लिये हज़रत अली (अ) के बैतुश सऱफ़ से गुज़रते हुए फ़रमाते थे: …..(सूरह अहज़ाब आयत 33)

तर्जुमा, ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत, ख़ुदा तो बस यह चाहता है कि तुम को हर तरह की बुराई से दूर रखे और जो पाक रखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे। (तफ़सीरे क़ुरतुबी जिल्द 11 पेज 174, तफ़सीरे फ़ख्रे राज़ी जिल्द 22 पेज 137, तफ़सीरे रुहुल मआनी जिल्द 16 पेज 284)

10. जंगे ख़ैबर में जब अबू बक्र व उमर से कुछ न हो पाया तो पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: (कल) मैं अलम उसको दूँगा जो ख़ुदा व रसूल को दोस्त रखता होगा और ख़ुदा व रसूल भी उसको दोस्त रखते होंगें, ख़ुदा वंदे आलम उसको हरगिज़ ज़लील नही करेगा, वह वापस नही पलटेगा, जब तक ख़ुदा वंद आलम उसके हाथों पर फ़तह व कामयाबी न दे दे, उसके बाद हज़रत अली (अ) को तलब किया, अलम उनके हाथो में दिया और उनके लिये दुआ की (चुनाँचे) हज़रत अली (अ) को फ़तह हासिल हुई। (सीरते इब्ने हिशाम जिल्द 3 पेज 216, तारिख़े तबरी जिल्द 3 पेज 12, कामिले इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 219)

11. पैग़म्बरे अकरम (स) ने अबू बक्र को सूरए बराअत के साथ हुज्जाज का अमीर बनाया तो ख़ुदा वंदे आलम के हुक्म से हज़रत अली (अ) को उनके पीछे रवाना किया कि सूरह को उनसे हाथों से ले लें और ख़ुद लोगों तक सूरए बराअत की क़राअत करें, पैग़म्बरे अकरम (स) ने अबू बक्र के ऐतेराज़ में फ़रमाया: मुझे हुक्म हुआ है कि इस सूरह को ख़ुद क़राअत करू या उस शख्स को दूँ जो मुझ से हैं ताकि वह इस सूरह की तबलीग़ करे। (मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 3, सोनने तिरमिज़ी जिल्द 5 हदीस 3719, हदीस 8461)

12. बाज़ असहाब ने मस्जिद (नबवी) की तरफ़ दरवाज़ा खोल रहा था, पैग़म्बरे अकरम (स) ने हुक्म दिया कि सब दरवाज़े बंद कर दिये जायें सिवाए हज़रत अली (अ) के। (मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 331, सोनने तिरमिज़ी जिल्द 5 हदीस 3732, अल बिदायह वन निहाया जिल्द 7 पेज 374)

13. आयशा कहती हैं: रसूले ख़ुदा (स) ने अपनी वफ़ात के वक़्त फ़रमाया: मेरे हबीब को बुलाओ, मैंने अबू बक्र को बुलवा लिया, जैसे ही आँ हज़रत (स) का निगाह उन पर पड़ी तो आपने अपने सर को झुका लिया और फिर फरमाया: मेरे हबीब को बुलाओ, उस वक़्त मैंने उमर को बुलवा लिया, जैसे रसूले अकरम (स) की नज़र उन पर पड़ी तो (एक बार फिर) आपने अपने सर को झुका लिया और तीसरी बार फ़रमाया: मेरे हबीब को बुलवा दो, चुनाँचे हज़रत अली (अ) को बुलवाया गया, जब आप आ गये तो रसूले ख़ुदा ने अपने पास बैठाया और अपनी उस चादर में ले लिया जिस को ओढ़े हुए थे, रसूले अकरम (स) इस हाल में इस दुनिया से गये कि हज़रत अली (अ) के हाथों में आपके हाथ थे। (अर रियाज़ुन नज़रह पेज 26, ज़ख़ायरुल उक़बा पेज 72)

उम्मे सलमा भी कहती हैं: रसूले अकरम (स) ने अपनी वफ़ात के वक़्त हज़रत अली (अ) से नजवा और राज़ की बातें कर रहे थे और इस हाल में आँ हज़रत (स) इस दुनिया से गये हैं लिहाज़ा अली (अ) रसूले ख़ुदा (स) के अहद व पैमान के लिहाज़ से लोगों में सबसे नज़दीक थे। (मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 138, मुसनद अहमद जिल्द 6 पेज 300)

14. तिरमिज़ी, अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत करते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उखू़व्वत पढ़ा, हज़रत अली (अ) गिरया कुनाँ अर्ज़ किया या रसूल्लाह, आपने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उख़ूव्वत बाँध दिया, लेकिन मेरा किसी के साथ अक़्दे उख़ूव्वत नही पढ़ा? तो पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम दुनिया व आख़िरत में मेरे बरादर हो।

हज़रत अली (अ) पर रसूले अकरम (स) की मख़्सूस तवज्जो सिर्फ़ आपको ख़िलाफ़त व जानशीनी के लिये तैयार करने के लिये थी, नीज़ इस लिये भी वाज़ेह हो जाये कि इस मक़ाम व ओहदे के लिये सिर्फ़ अली (अ) ही सलाहियत रखते हैं।

ब. आपकी इमामत व विलायत पर बयान

पैग़म्बरे अकरम (स) की दूसरी तदबीर यह थी कि 23 साला ज़िन्दगी में जहाँ कहीं भी मुनासिब मौक़ा मिला तो हज़रत अली (अ) की विलायत और जानशीनी के मसअले को बयान करते थे और आप लोगों के सामने इस अहम मसअले की याद दहानी फ़रमाते रहते थे जिनमें से (वाक़ेया ए ज़ुल अशीरा और) ग़दीरे ख़ुम का ख़ुतबा मशहूर है।

स. अमली तदबीरें

पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी उम्र के आख़िरी दिनों में हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त को मज़बूत करने के लिये बहुत से अमली रास्तों को अपनाया ताकि इस ऐलान की मुकर्रर ताकीद के बाद दूसरों के हाथों से ग़स्बे ख़िलाफ़त का बहाना ले लें, लेकिन अफ़सोस कि उन तदबीरों का कोई असर न हुआ, क्यो कि मुख़ालिफ़ पार्टी इतनी मज़बूत थी कि पैग़म्बरे अकरम (स) की तदबीरों को अमली न होने दिया।

क़ारेईने मोहतरम, हम यहाँ पर आँ हज़रत (स) की चंद अमली तदबीरों की तरफ़ इशारा करते हैं: 1.रोज़े ग़दीर इमाम अली (अ) के हाथों को बुलंद करना

पैग़म्बरे अकरम (स) अपने बहुत से असहाब के साथ आख़िरी हज (जिसको हज्जतुल विदाअ कहा जाता है) करने के लिये रवाना हुए, सरज़मीने अरफ़ात में आँ हज़रत (स) ने मुसलमानो के दरमियान एक ख़ुतवा इरशाद फ़रमाया, आँ हज़रत (स) इस ख़ुतबे में अपने बाद होने वाले आईम्मा को उम्मत के सामने बयान करना चाहते थे ताकि उम्मत गुमराह न हो और उसमें फ़ितना व फ़साद बरपा न हो, लेकिन बनी हाशिम का मुखालिफ़ गिरोह जो अहले बैत (अ) से दुश्मनी रखता था, ताक लगाये बैठा था कि कहीं रसूले ख़ुदा (स) इस मजमे में कोई ऐसी बात न कहें जिससे उनके नक़्शे पर पानी फिर जाये। जाबिर बिन समुरा सवाई कहते हैं: मैं पैग़म्बर अकरम (स) के पास था और आँ हज़रत (स) की बातों को सुन रहा था, आँपने अपने ख़ुतबे में अपने बाद होने वाले ख़ुलाफ़ा की तरफ़ इशारा फ़रमाया कि मेरे बाद मेरे जानशीन और ख़ुलाफ़ा की तादाद बारह होगी। जाबिर कहते हैं कि जैसे पैग़म्बरे अकरम (स) ने यह फ़रमाया तो कुछ लोगों ने शोर ग़ुल बरपा कर दिया और शोर इतना ज़्यादा था कि मैं समझ नही सका कि आँ हज़रत (स) ने क्या फ़रमाया, मैं ने अपने वालिद से सवाल किया जो रसूले ख़ुदा (स) से ज़्यादा नज़दीक थे, उन्होने कहा: उसके बाद पैग़म्बर (स) ने आगे फ़रमाया: वह तमाम क़ुरैश से होंगें।

ताअज्जुब की बात है कि जिस मुसनदे अहमद में मुसनद जाबिर बिन मुसरा को देखते हैं तो उसमें जाबिर के अल्फ़ाज़ ऐसे मिलते हैं जो उससे पहले नही देखे गये हैं, जाबिर बिन समरा की बाज़ रिवायतों में बयान हुआ है कि जब पैग़म्बरे अकरम (स) की बात यहाँ तक पहुची कि मेरे बाद बारह जानशीन होंगें तो लोगों ने चिल्लाना शुरु कर दिया, इसके अलावा बाज़ दूसरी रिवायत में बयान हुआ है कि लोगों ने तकबीर कहना शुरु कर दीं, नीज़ बाज़ दूसरी रिवायतों में बयान किया कि लोगों ने शोर ग़ुल करना शुरु कर दिया और आख़िर कार बाज़ रिवायत में यह भी मिलता है कि लोग कभी उठते थे और कभी बैठते थे।

एक रावी से यह तमाम रिवायतें (अपने इख़्तिलाफ़ के बावजूद) इस बात में ख़ुलासा होती हैं कि मुख़ालिफ़ गिरोह ने बहुत सी टोलियों को इस बात के लिये तैयार कर रखा था कि पैग़म्बरे अकरम (स) को अपने बाद के लिये ख़िलाफ़त व जानशीनी का मसअला बयान करने से रोका जाये और उन टोलियों ने वही किया, चुनाँचे हर एक ने किसी न किसी तरह से निज़ामे जलसा को दरहम व बरहम कर दिया और अपने मक़सद में कामयाब हो गये।

पैग़म्बरे अकरम (स) इस अज़ीम मजमें में ख़िलाफ़त के मसअले को बयान न कर सके और मायूस हो गये और दूसरी जगह के बारे में सोचने लगे ताकि इमाम अली (अ) की ख़िलाफ़त को अमली तौर पर साबित करें, इसी वजह से आमाले हज तमाम होने और हाजियों के अलग अलग होने से पहले लोगों को ग़दीरे ख़ुम में जमा किया और इमामत व ख़िलाफ़त के मसअले को बयान करने से पहले चंद चीज़ों को मुक़द्दमें के तौर पर बयानक किया और लोगों से भी इक़रार लिया, पैग़म्बरे अकरम (स) जानते थे कि इस बार भी मुनाफ़ेक़ीन की टोली ताक में है ताकि हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त के मसअले को बयान न होने दें, लेकिन आँ हज़रत (स) ने एक ऐसी अमली तदबीर सोची जिससे मुनाफ़ेक़ीन के नक़्शे पर पानी फिर गया और वह यह है कि आपने हुक्म दिया कि ऊठों के कजाओं को जमा किया जाये और एक के ऊपर एक को रखा जाये (ताकि एक बुलंद जगह बन जाये) इस मौक़े पर आँ हज़रत (स) और हज़रत अली (अ) उस मिम्बर पर तशरीफ़ ले गये, इस तरह सभी आप दोनो को देख रहे थे, आँ हज़रत (स) ने ख़ुतबे में चंद कलेमात को बयान करने और हाज़ेरीन से इक़रार लेने के बाद हज़रत अली (अ) के हाथ को बुलंद किया और लोगों के सामने ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत का ऐलान किया।

पैग़म्बर अकरम (स) की इस तदबीर के सामने मुनाफ़ेक़ीन कुछ न कर सके और देखते रह गये और कुछ रद्दे अमल ज़ाहिर न कर सके।
लश्करे ओसामा को रवाना करना

पैग़म्बरे अकरम (स) बिस्तरे बीमारी पर हैं, इस हाल में (भी) अपनी उम्मत के लिये सख़्त फ़िक्र मंद हैं, इख़्तेलाफ़ और गुमराही के सिलसिले में फ़िक्रमंद, इस चीज़ से रंजीदा कि उनकी तमाम तदबीरों को ख़राब कर दिया जाता है, इस चीज़ से ग़मज़दा कि नबूव्वत व रिसालत और शरीयत में इंहेराफ़ किया जायेगा, ख़ुलाया यह कि पैग़म्बरे अकरम (स) परेशान व मुज़तरिब हैं, रोम जैसा बड़ा दुश्मन इस्लामी सहहदों पर तैयार है ताकि जैसे मौक़ा देखे एक ख़तरनाक हमले के ज़रिये मुसलमानों को शिकस्त दे दे।

पैग़म्बरे अकरम (स) की मुख़्तलिफ़ ज़िम्मेदारियाँ हैं, एक तरफ़ तो बैरूनी दुश्मन का मुक़ाबला है लिहाज़ा आपने बहुत ताकीद के साथ उनसे मुक़ाबले के लिये एक लश्कर को रवाना किया, दूसरी तरफ़ आप हक़ीक़ी जानशीन और ख़लीफ़ा को साबित करना चाहते थे लेकिन क्या करें? न सिर्फ़ यह कि बैरूनी दुश्मन से दस्त व गरीबाँ हैं बल्कि अंदरूनी दुश्मन से भी मुक़ाबला है जो ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में आँ हज़रत (स) की तदबीरों को अमली जामा पहनाने में मानेअ है, पैग़म्बरे अकरम (स) अपनी तदबीर को अमली करने के लिये हुक्म देते हैं कि वह सब जो जिहाद और लश्करे ओसामा में शिरकत की तैयारी रखते हैं मदीने से बाहर निकल निकलें और उनके लश्कर से मुलहक़ हो जायें लेकिन आँ हज़रत (स) ने मुलाहिज़ा किया कि बहुत से असहाब बेबुनियाद बहानों के ज़रिये ओसामा के लश्कर में शरीक नही हो रहे है, कभी पैग़म्बरे अकरम (स) पर ऐतेराज़ करते हैं कि क्यो आपने एक जवान और ना तजरुबाकार इंसान ओसामा को अमीरे लश्कर बना दिया है जबकि ख़ुद लश्कर में साहिबे तजरूबा अफ़राद मौजूद हैं?

पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनके ऐतेराज़ के जवाब में कहा कि अगर आज तुम लोग ओसामा की सरदारी पर ऐतेराज़ कर रहे हो तो इससे पहले तुम उसके बाप की सरदारी पर ऐतेराज़ कर चुके हो, आप की यह कोशिश थी कि मुसलमानों की कसीर तादाद मदीने से निकल कर ओसामा के लश्कर में शामिल हो जाये, नौबत यह पहुच गई कि जब पैग़म्बर अकरम (स) ने बाज़ सहाबा मिन जुमला उमर, अबू बक्र, अबू उबैदा, सअद बिन अबी वक़ास वग़ैरह की नाफ़रमानी को देखा कि यह लोग ओसामा के लश्कर में दाखिल होने में मेरे हुक्म की मुखालेफ़त कर रहे हैं तो उन पर लानत करते हुए फ़रमाया:

हदीस (मेलल व नेहल शहरिस्तानी जिल्द 1 पेज 23)

तर्जुमा, ख़ुदा लानत करे हर उस शख्स पर जो ओसामा के लश्कर में दाखिल होने की मुख़ालेफ़त करे।

लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) की इतनी ताकीद और मलामत के बाद भी उन लोगों ने कोई तवज्जो न की और कभी इस बहाने से कि हम पैग़म्बर (स) की रेहलत के वक़्त की जुदाई को बर्दाशत नही कर सकते, रसूले अकरम (स) को हुक्म की मुख़ालेफ़त की।

लेकिन दर हक़ीक़त मसअला दूसरा था, वह जानते थे कि पैग़म्बरे अकरम (स) अली (अ) और बाज़ दीगर असहाब को जो बनी हाशिम और हज़रत अली (अ) की इमामत व ख़िलाफ़त की मुवाफ़िक़ हैं, उनको अपने पास रोके हुए हैं ताकि रेहलत के वक़्त हज़रत अली (अ) के लिये वसीयत कर दें और आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद सहाबा को वह गिरोह जो लश्करे ओसामा में जायेगा वापस आ कर हज़रत अली (अ) की बैअत करे लिहाज़ा उनको डर था कि कहीं ख़िलाफ़त उनके हाथ से निकल न जाये लेकिन उनका मंसूबा यह था कि हर मुम्किन तरीक़े से इस काम में रुकावट की जाये ताकि यह काम न हो सके।

यह नुक्ता भी क़ाबिले तवज्जो है कि क्यों पैग़म्बरे अकरम (स) ने एक कम तजरुबा कार जवान को लश्कर की सरदारी के लिये इंतेख़ाब किया और बाज़ असहाब के ऐतेराज़ पर बिल्कुल तवज्जो न दी, बल्कि उनकी सरदारी पर मज़ीद ताकीद फ़रमाई, इसका राज़ क्या है?

पैग़म्बरे अकरम (स) जानते थे कि यही लोग उनकी वफ़ात के बाद अली बिन अबी तालिब (अ) की ख़िलाफ़त व इमामत पर मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से ऐतेराज़ करेगें मिन जुमला यह कि अली बिन अबी तालिब (अ) एक जवान हैं, लिहाज़ा आँ हज़रत (स) ने अपने इस अमल से सहाबा को यह समझाना चाहते थे कि ख़िलाफ़त व अमारत, लियाक़त व सहालियत की बेना पर होती है न कि सिन व साल के लिहाज़ से, नीज़ मेरे बाद अली (अ) के सिन व साल को बहाना बना कर ऐतेराज़ न करें और उनके हक़ को ग़स्ब न कर लें, अगर कोई ख़िलाफ़त व अमारत की लियाक़त रखता है तो फिर सब (पीर व जवान, ज़न व मर्द) उनके मुतीअ हों लेकिन (अफ़सोस कि) पैग़म्बरे अकरम (स) की यह तदबीर भी अमली न हो सकी और लश्कर में शामिल न हो कर मुख़्तलिफ़ बहानों के ज़रिये पैग़म्बरे अकरम (स) के नक़्शों पर पानी फेर दिया। (देखिये, तबक़ाते इब्ने साद जिल्द 4 पेज 66, तारिख़े इब्ने असाकर जिल्द 2 पेज 391, कंज़ुल उम्माल जिल्द 5 पेज 313, तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 93, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 21, मग़ाज़ी वाक़ेदी जिल्द 3 पेज 111, तारिख़े इब्ने ख़लदून जिल्द 2 पेज 484, सीरये हलबिया जिल्द 3 पेज 207)

क्या ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे अकरम (स) के हुक्म की इताअत का करने का फ़रमान जारी नही किया है? जहा इरशाद होता है:

(सूरह हश्र आयत 7)

और हाँ जो तुम को रसूल दे दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और खु़दा से डरते रहो, बेशक ख़ुदा सख़्त अज़ाब देने वाला है।

नीज़ इरशाद होता है:

(सूरह निसा आयत 65)

तर्जुमा, बस आपके परवरदिगार की क़मस कि यह हरगिज़ साहिबाने ईमान न बन सकेंगें जब तक आपको अपने इख़्तिलाफ़ात में हकम न बनायें और फिर जब आप फ़ैसला कर दें तो अपने दिल में किसी तरह की तंगी का अहसास न करें और आपके फ़ैसले को सामने सरापा तसलीम हो जायें। 3. वसीयत लिखने का हुक्म

जब पैग़म्बरे अकरम (स) ने देख लिया कि लोगों को लश्करे ओसामा के साथ मदीने से बाहर भेजने की तदबीर नाकाम हो गई तो आपने तय किया कि हज़रत अली (अ) की इमामत के सिलसिले में अपनी 23 साला ज़िन्दगी में जो कुछ लोगों के सामने बयान किया है, उन सब को एक वसीयतनामे में लिख दिया जाये। इसी वजह से आपने बरोज़े जुमेरात अपनी वफ़ात से चंद रोज़ क़ब्ल जबकि आप बिस्तर पर लेटे हुए थे और मुख़्तलिफ़ गिरोहों का मजमा आपके हुजरे में जमा था, मजमे से ख़िताब करते हुए फ़रमाया: क़लम व क़ाग़ज़ ले आओ ताकि मैं उसमें ऐसी चीज़ लिख दूँ जिससे मेंरे बाद गुमराह न हो। चुनाँचे बनी हाशिम और परदे के पीछे बैठी हुई अज़वाजे रसूल इस बात पर इसरार कर रहीं थी कि रसूले इस्लाम (स) को वसीयत लिखने के लिये क़लम व क़ाग़ज़ दिया जाये लेकिन वह गिरोह जिस ने मैदाने अरफ़ात में पैग़म्बरे अकरम (स) को अपने बाद के लिये ख़लीफ़ा मुअय्यन करने न दिया वही गिरोह हुजरे में जमा था, उसने आँ हज़रत (स) के इस हुक्म को अपनी न होने से रोक दिया, उमर फ़ौरन इस बात की तरफ़ मुतवज्जेह हुए कि अगर यह वसीयत लिखी गई तो ख़िलाफ़त को हासिल करने के तमाम नक़्शों पर पानी फिर जायेगा, लेकिन दूसरी तरफ़ पैग़म्बरे अकरम (स) की मुख़ालिफ़त मुनासिब दिखाई न दे रही थी।

लिहाज़ा उन्होने एक दूसरा मंसूबा बनाया और इस नतीजे पर पहुचे कि पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ एक ऐसी निस्बत दी जाये, जिसकी वजह से वसीयत नामा लिखना ख़ुद बखुद बे असर हो जाये, इसी वजह से उन्होने लोगों से ख़िताब करते हुए कहा: तुम लोग क़लम व क़ाग़ज़ न लाओ क्यो कि पैग़म्बर (स) हिज़यान कह रहे हैं, हमें किताबे ख़ुदा काफ़ी है, जैसे ही इस जुमले को उमर के तरफ़दारों यानी बनी उमय्या और कु़रैश ने सुना तो उन्होने भी इस जुमले की तकरार की, लेकिन बनी हाशिम बहुत नाराज़ हुए और उनकी मुख़ालेफ़त में खड़े हो गये, पैग़म्बरे अकरम (स) इस ना रवाँ तोहमत कि जिसने आपकी तमाम शख्सियत और अज़मत को मजरूह कर दिया, उसके मुक़ाबिल कोई कुछ न कर सके सिवाए इसके कि उनको अपने मकान से निकाल दिया, चुनाँचे आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: मेरे पास से उठ जाओ, पैग़म्बर के पास झगड़ा नही किया जाता। (देख़िये, सही बुखारी, क़िताबुल मरज़ी, जिल्द 7 पेज 9, सही मुस्लिम किताबुल वसीयह, जिल्द 5 पेज 75, मुसनद अहमद जिल्द 4 पेज 356 हदीस 2992)

ताअज्जुब की बात तो यह कि उमर बिन ख़त्ताब के तरफ़दारों और कुल्ली तौर पर मदरस ए ख़ुलाफ़ा ने पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ उमर की ना रवाँ निस्बत को छुपाने के लिये बहुत कोशिश की है, चुनाँचे जब लफ़्ज़े हज्र यानी हिज़यान को नक़्ल करते हैं तो उसकी निस्बत मजमे की तरफ़ देते हैं और कहते हैं .................... और जब इसी वाक़ेया की निस्बत उमर की तरफ़ देते हैं तो कहते हैं ..............

लेकिन किताब अस सक़ीफ़ा में अबू बक्र जौहरी का कलाम मतलब को वाज़ेह कर देता है कि हिज़यान की निस्बत उमर की तरफ़ से शुरु हुई और बाद में उमर के तरफ़दारों ने उसकी पैरवी में यही निस्बत पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ दी है, चुनाँचे जौहरी इस निस्बत को उमर की तरफ़ से यूँ बयान करते हैं:

उमर ने एक ऐसा जुमला कहा जिसके मअना यह हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) पर बीमारी के दर्द का ग़लबा है पस इससे मालूम होता है कि उमर के अल्फ़ाज़ कुछ और थे जिसको क़बाहत की वजह से नक़्ले मअना किया है, अफ़सोस कि बुख़ारी और मुस्लिम वग़ैरह ने रिवायत को असली अल्फ़ाज़ में बयान नही किया है बल्कि इस जुमले की सिर्फ़ मज़मून बयान किया है, अगरचे अन निहाया में इब्ने असीर और इब्ने अबिल हदीद के कलाम से यह नतीजा निकलता है कि हिज़यान की निस्बत बराहे रास्त उमर ने दी थी।

बहरहाल पैग़म्बरे अकरम (स) ने मुख़ालिफ़ गिरोग को बाहर निकालने के बाद ख़ालिस असहाब के मजमे में अपनी वसीयत को बयान किया और सुलैम बिन क़ैस की इबारत के मुताबिक़ बाज़ असहाब के बावजूद अहले बैत (अ) में से नाम ब नाम वसीयत की और अपने बाद होने वाले ख़ुलाफ़ा के नाम बयान किये। (किताब सुलैम बिन क़ैस जिल्द2 पेज 658)

अहले सुन्नत ने भी अपनी हदीस की किताबों में इस वसीयत की तरफ़ इशारा किया है लेकिन अस्ले मौज़ू को मुब्हम दिया है।

इब्ने अब्बास इस हदीस के आख़िर में कहते हैं: आख़िर कार पैग़म्बरे अकरम (स) ने तीन चीज़ो की वसीयत की: एक यह कि मुश्रेकीन को जज़िर ए अरब से बाहर निकाल दो, दूसरे यह कि जिस तरह मैं ने क़ाफ़िलों को दाख़िल होने की इजाज़त दे रखी है, तुम भी उन्हे इजाज़त देना, लेकिन तीसरी वसीयत के बारे में इब्ने अब्बास ने ख़ामोशी इख़्तियार की और बाज़ दूसरी रिवायत में बयान हुआ है कि (इब्ने अब्बास ने कहा) मैं तीसरी वसीयत भूल गया हूँ। (सही बुख़ारी किताबुल मग़ाज़ी बाब 78, सही मुस्लिम किताबुल वसीयत बाब 5)

ऐसा कभी नही हुआ कि इब्ने अब्बास ने किसी हदीस के बारे में कहा हो, मैं हदीस के भलाँ हिस्से को भूल गया हूँ या उनको नक़्ल न करें, इसकी वजह यह है कि इब्ने अब्बास ने उमर बिन ख़त्ताब के डर की वजह से इस तीसरी वसीयत को जो हज़रत अली (अ) और अहले बैत (अ) की विलायत, ख़िलाफ़त और इमामत के बारे में थी, बयान नही किया, लेकिन चूँकि इब्ने अब्बास, उमर से डरते थे इस वजह से इस वसीयत को बयान न किया जैसा कि वह उमर बिन ख़त्ताब के ज़माने में औल व ताअस्सुब के मसअले की मुख़ालेफ़त न कर सके, यहाँ तक उमर के इँतेका़ल के बाद हक़्क़े मसअला बयान किया और जब उन से इस मसअले के हुक्म के बारे में ताख़ीर की वजह पूछी गई तो उन्होने कहा: मैं उमर बिन ख़त्ताब के नज़रिये की मुख़ालेफ़त से डरता था। (औल व ताअस्सुब का मसअला मीरास से मुताअल्लिक़ है कि अगर मीरास तक़सीम करते वक़्त कुछ चीज़ बच जाये या किसी का हिस्सा कम पड़ जाये तो उसको किसको दिया जायेगा या किससे लिया जायेगा। ((मुतर्जिम))

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