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Saturday 27th of November 2021
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हज़रत मासूमा

सर्वसमर्थ व महान ईश्वर से निकट होने का एक मार्ग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम अपने पवित्र परिजनों का सदैव सम्मान करते थे और लोगों से कहते थे कि वे उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करें। पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र क़ुरआन के बाद अपने पवित्र परिजनों का परिचय इस्लामी समुदाय व राष्ट्र के लि
हज़रत मासूमा

सर्वसमर्थ व महान ईश्वर से निकट होने का एक मार्ग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम अपने पवित्र परिजनों का सदैव सम्मान करते थे और लोगों से कहते थे कि वे उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करें। पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र क़ुरआन के बाद अपने पवित्र परिजनों का परिचय इस्लामी समुदाय व राष्ट्र के लिए अपनी सबसे बड़ी धरोहर व यादगार के रूप में किया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिजनों से प्रेम इस बात का कारण बनता है कि इन महान हस्तियों को हम जीवन के समस्त मामलों में अपना आदर्श बनायें।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिजनों की शहादत या जन्म दिन इस बात का अवसर है कि हम इन महान हस्तियों के ज्ञान व परिपूर्णता के अथाह सागर से अपनी प्यासी आत्माओं को तृप्त करें। आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिवार में से एक महान महिला का जन्म दिन है। १७३ हिजरी क़मरी में ज़ीक़ादा महीने की पहली तारीख को महान ईश्वर ने हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम को एक पुत्री प्रदान की जिसका नाम फ़ातेमा रखा गया। यह महान महिला विभिन्न उपाधियों से प्रसिद्ध हुईं जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध उपाधि मासूमा है। हज़रत मासूमा हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की बहन है और आज उनका पवित्र मज़ार ईरान के धार्मिक नगर क़ुम में स्थित है जो सदैव पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करने वालों से भरा रहता है। प्रिय श्रोताओ इस महान महिला के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और आज के कार्यक्रम में हम उनके जीवन के कुछ आयामों पर प्रकाश डाल रहे हैं।
उस दिन की विशेषता और महानता बयान नहीं की जा सकती जिस दिन क़ुम वासियों को यह सूचना मिली थी कि एक कारवां उनके नगर में प्रवेश करने वाला है और उस कारवां में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिवार की एक महान महिला हैं। यह महान महिला हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की सुपुत्री और हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की महान बहन थीं। हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ने अपने भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से मिलने के लिए २०१ हिजरी क़मरी में मदीना नगर को ईरान के मर्व क्षेत्र के लिए छोड़ा। हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा रास्ते की कठिन यात्रा के बाद बहुत बीमार पड़ गयीं। इस प्रकार कि यात्रा को जारी रखना उनके लिए संभव नहीं रह गया तो विवश होकर उन्होंने अपने कारवां का रुख क़ुम नगर की ओर मोड़ दिया। क़ुम वासियों को जब हज़रत मासूमा सलामुल्ला अलैहा के आने का शुभ समाचार मिला तो वे बहुत प्रसन्न हुए। क्योंकि वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिजनों से अगाध प्रेम करते थे और अपने मध्य पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार की एक महान महिला की उपस्थिति को विभूति व गर्व का कारण समझते थे। बूढ़े और जवान सब लोगों ने अपने आपको हज़रत मासूमा के स्वागत के लिए तैयार कर लिया था।
इतिहास में आया है कि क़ुम नगर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति मूसा बिन खज़रज रात को हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के स्वागत के लिए गये और हज़रत मासूमा के ऊंट की नकेल अपने हाथों में पकड़ी और उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया और बहुत आग्रह किया। क़ुम नगर में १७ दिन रहने के बाद अधिक बीमारी के कारण हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का स्वर्गवास हो गया परंतु इसी थोड़े से समय में ही क़ुम नगर का वातावरण बदल गया और क़ुम में हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा की उपस्थिति इस नगर के इतिहास का महत्वपूर्ण एवं स्वर्णिम बिन्दु बन गई। दूर और निकट के लोग आपसे मिलने के लिए क़ुम नगर आये। आपने उस बीमारी की दशा में भी यथासंभव अपने ज्ञान से वास्तविकता प्रेमियों की प्यास बुझाई।
ज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ने ऐसे परिवार में आंखे खोली जो समस्त ज्ञानों एवं सदगुणों का प्रतीक था। आपने अपने पिता हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के जीवनकाल में उनसे बहुत लाभ उठाया और उनकी शहादत के बाद अपने महान भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान के अथाह सागर से मोती एकत्रित किए। आप अपने भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से अगाध प्रेम करती थीं। आप अपना परिचय कराते हुए कहती थीं" मैं मासूमा रज़ा की बहन हूं" यह वाक्य अपने भाई हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम से उनकी आत्मीयता का सूचक है। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम भी अपनी बहन हज़रत मासूमा से बहुत प्रेम करते थे। इस प्रकार से कि अपनी बहन से दूरी हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के लिए बहुत कठिन थी। इस आधार पर मदीना छोड़ देने और मर्व में रहने के बाद हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपनी बहन को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा और उन्हें मर्व आने के लिए कहा। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने एक विश्वसनीय व्यक्ति के माध्यम से मदीना पत्र भेजा और उस विश्वसनीय व्यक्ति से कहा कि जितनी जल्दी हो सके वह उनकी बहन को मर्व पहुंचा दे। हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ने भी भाई का पत्र मिलते ही स्वयं को यात्रा के लिए तैयार कर लिया और मर्व चल पड़ीं। यद्यपि भाग्य इस प्रकार था कि आप अपने भाई से न मिल सकीं।
ज्ञान, सदगुण, चरित्र और आत्मिक विशेषता व परिपूर्णता की दृष्टि से हज़रत मासूमा सलामुल्लाह का स्थान बहुत ऊंचा था। इन वास्तविकताओं को इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित आपकी उपाधियों एवं विशेषताओं के माध्यम से देखा जा सकता है। हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के परिजनों के बीच मौजूद हदीस अर्थात हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम व उनके परिजनों के कथनों को बयान करने वालों में विशेष स्थान रखती थीं। आपने अपने पिता और दादा के हवाले से हदीसें बयान की हैं जिन्हें इस्लाम के बड़े-२ धर्मगुरू प्रमाण के रूप में पेश करते हैं। बाल्याकाल से ही ज्ञान एवं आध्यात्मिकता के चिन्ह आपके महान अस्तित्व में प्रतिबिंबित थे। इस्लामी इतिहास में आया है कि आप बचपने में ही धर्मशास्त्र आदि से जुड़े बहुत से प्रश्नों का उत्तर देती थीं। आपके दादा हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने आपके जन्म के समय कहा था" उनका मज़ार क़ुम में पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार से विशेष ठिकाना है" हज़रत मासूमा के मज़ार के दर्शन के समय जो विशेष दुआ पढ़ी जाती है उसमें आपके महान स्थान के कुछ पहलुओं की ओर संकेत किया गया है। इसी प्रकार महान धार्मिक व्यक्तियों के हवाले से आपकी कुछ उपाधियों का उल्लेख किया गया है जो हज़रत मासूमा के ज्ञान और आध्यात्मिक स्थान की सूचक हैं। सिद्दिक़ा और मोहद्दिसा भी आपकी उपाधियां है।
सिद्दिक़ा का अर्थ है बहुत अधिक सच बोलने वाली महिला और मोहद्दिसा का अर्थ है कथनों एवं घटनाओं को बयान करने वाली महिला। प्रमाणों के आधार पर हज़रत मासूमा करीमये अहलेबैत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। करीमा अर्थात दानी। हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा क़ुरआन और इस्लामी शिक्षाओं के अनुसरण को सफल जीवन की कुंजी मानती है। आप महान ईश्वर की याद और उसके प्रेम में अपना जीवन बिताती थीं। इस आधार पर धर्म का पूरा अनुसरण करने और क्षण भर के लिए भी सही मार्ग से विचलित न होने के कारण आप मानवीय परिपूर्णता के चरम शिखर पर पहुंच गईं। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने पवित्रता, ईश्वरीय भय और सदाचारिता के कारण ही आपको मासूमा अर्थात पापों से पवित्र महिला की संज्ञा दी है।
शताब्दियां बीत जाने के बावजूद ईरान के क़ुम नगर में आपका मज़ार हज़ारों श्रद्धालुओं का केन्द्र बना रहता है। देश- विदेश के हज़ारों लोग आपके दर्शन के लिए आते हैं। क़ुम में हज़रत मासूमा का पावन अस्तित्व इस नगर के विकास और उसमें बड़े-२ शिक्षा केन्द्र बनने का कारण बना है। इस्लामी ज्ञान व शिक्षाओं के प्यासे हज़ारों लोग विश्व के विभिन्न कोनों से क़ुम में आकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं। क़ुम का धार्मिक शिक्षा केन्द्र मज़बूत एवं सुदृढ़ मोर्चे की भांति है जो इस्लामी सिद्धांतों एवं शिक्षाओं की रक्षा कर रहा है और समय बीतने के साथ महान धर्मगुरूओं एवं विद्वानों ने उसमें शिक्षा ग्रहण की। स्वर्गीय हज़रत इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह उन महान धर्मगुरूओं एवं विद्वानों में से एक हैं जो विश्व में महत्वपूर्ण परिवर्तनों के स्रोत थे। वर्तमान समय में पवित्र नगर क़ुम का धार्मिक शिक्षा केन्द्र प्रज्वलित दीपक की भांति है और वह पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों की सर्वोच्च शिक्षाओं के दृष्टिगत अशांत व दिग्भ्रमित विश्व में आज के मनुष्यों का मार्ग दर्शन कर रहा है।
हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर एक बार फिर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और सर्वसमर्थ व महान ईश्वर से इस बात की प्रार्थना करते हैं कि वह हम सबको पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम तथा उनके पवित्र परिजनों से अधिक से अधिक प्रेम करने एवं उनके द्वारा बताये गये मार्गों पर चलने क्षमता व भावना प्रदान करे। अपने इस कार्यक्रम का समापन हम हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के एक स्वर्ण कथन से कर रहे हैं। आप कहते हैः जो भी क़ुम में फ़ातेमा अर्थात हज़रत मासूमा का दर्शन करेगा वह उस व्यक्ति की भांति है जिसने हमारा दर्शन किया हो।

 


source : alhassanain
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