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Tuesday 6th of December 2022
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ख़ून की विजय

आज आशूर अर्थात दसवीं मुहर्रम है जो ऐसा दुखों भरा दिन है जिसका सामना करके इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने धर्म और मानवता की रक्षा की। अत्याचारी शासक का यज़ीद की हज़ारों की सेना ७२ लोगों को घेरे हुए थी और सत्य व असत्य की कभी न भूलने वाली युद्ध की पूरी तैयारी हो चुकी थी। यह लड़ाई मुसलमानों के पैगम्बर, हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के नवासे और उनकी अत्यन्त प्रिय पुत्री हज़रत फातेमा ज़हरा के बेटे इमाम हुसैन और उन लोगों के मध्य थी जो नाम के मुसलमान थे। इमाम हुसैन के सामने ह
ख़ून की विजय

आज आशूर अर्थात दसवीं मुहर्रम है जो ऐसा दुखों भरा दिन है जिसका सामना करके इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने धर्म और मानवता की रक्षा की। अत्याचारी शासक का यज़ीद की हज़ारों  की सेना ७२ लोगों को घेरे हुए थी और सत्य व असत्य की कभी न भूलने वाली युद्ध की पूरी तैयारी हो चुकी थी। यह लड़ाई मुसलमानों के पैगम्बर, हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के नवासे और उनकी अत्यन्त प्रिय पुत्री हज़रत फातेमा ज़हरा के बेटे इमाम हुसैन और उन लोगों के मध्य थी जो नाम के मुसलमान थे। इमाम हुसैन के सामने हज़ारों सेना की और उनके साथ बस बहत्तर लोग, किंतु इन बहत्तर में से हरेक की यही आकांक्षा थी कि काश उनके पास कई जीवन होते और वह हर जीवन, इमाम हुसैन पर न्योछावर कर देते।
 
 
 
आशूर के दिन दोपहर ढल रही थी और रणक्षेत्र में लड़ाई भी आरंभ हो चुकी थी किंतु व्यापक आक्रमण बाकी था एसे में इमाम हुसैन ने अपने शत्रु से नमाज़ पढ़ने तक की मोहलत मांगी किंतु स्वंय को मुसलमान कहने वाले उन के शत्रुओं ने उन्हें नमाज़ की मोहलत नहीं दी और पैग़म्बरे इस्लाम के भूखे प्यासे नवासे ने तीरों की बौछार में नमाज़ पढ़ी। वह भी इस तरह से कि उनके कुछ साथियों ने उनके सामने खड़े होकर तीरों की बौछार को अपने सीनों पर रोका और शहीद हो गये।
 
     दोपहर ढलते ढलते आशूर के दुख अपने चरम पर पहुंच चुके थे। अंतिम ईश्वरीय दूत  के अत्यन्त प्रिय नवासे इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया था उनके सिर को काट कर भाले की नोक पर लगा दिया गया था। यह वही हुसैन थे जिनके बारे में पैगम्बरे इस्लाम ने फरमाया था कि हुसैन मार्गदर्शन का चिराग और मुक्ति की नौका हैं।  इसी प्रकार पैगम्बरे इस्लाम ने फरमाया था कि तुम लोगों ने मेरे द्वारा ज्ञान प्राप्त किया, अली ने तुम्हें राह दिखायी, हसन के हाथों तुम्हें भलाई मिली किंतु तुम्हारे कल्याण व विनाश  की कसौटी हुसैन हैं। जान लो कि हुसैन स्वर्ग का एक द्वार हैं और जो भी उनसे शत्रुता करेगा, ईश्वर उस पर स्वर्ग की सुगंध भी हराम कर देगा।  
 
 
 
इतिहासकारों की दृष्टि में आशूरा दो काले और सफेद पन्ने हैं। सफेद पन्ने पर ईश्वरीय प्रेम, चेतना, स्वतंत्रता, त्याग बलिदान और मानवता लिखी है जबकि काले पन्ने पर यज़ीद और उसके अनुयाइयों की काली करतूतें लिखी हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने आंदोलन द्वारा जिसका चरम दसवीं मुहर्रम को देखने को मिला, लोगों को मानवता, स्वतंत्रता व सत्य की राह पर डटे रहने का संदेश दिया और उनका यह संदेश, मदीना नगर से उनकी यात्रा के आरंभ के लेकर उनके अंतिम पड़ाव कर्बला और उसके बाद उनके परिजनों की बंदियों के रूप में पूरी यात्रा के दौरान मानव समाज तक पहुंचता रहा।
 
   
 
    हालांकि आशूर की पूरी घटना एक दिन में घटी किंतु उसके प्रभाव अनन्त हैं और लोगों के दिलों की इतनी गहराई तक पहुंचे हैं कि चौदह सौ वर्षों के बाद भी उनका शोक हर वर्ष पूरे विश्व में मनाया जाता है और इसमें धर्म व मत की सीमाएं भी अर्थहीन हो जाती है जिसका एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इमाम हुसैन का लक्ष्य और संदेश भी विश्व व्यापी था और स्वतंत्रता, सत्त व संकल्प व ईश्वर पर भरोसा की जिस भावना का उनके आंदोलन ने प्रदर्शन किया उसे निश्चित रूप से भौगोलिक या युगों व मतों की रेखाओं से सीमित नहीं किया जा सकता।
 
 
 
इमाम हुसैन ने अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने भूख व प्यास के साथ अंतिम क्षणों तक युद्ध किया और शहीद हुए और उनके के परिजनों को बंदी बना कर कूफा नगर ले जाया गया किंतु फिर भी बहत्तर शहीदों ने वीरता की जो गाथा लिख दी थी वह आज भी मानव इतिहास में जगमगा रही है और सदा जगमगाती रहेगी और यही नहीं, आशूर की घटना को केवल इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद नहीं किया जाता है बल्कि इस घटना ने अपने बाद एक नये संस्कृति को जनम दिया और इस्लामी इतिहास की असंख्य घटनाओं व परिवर्तनों की आधार बनी।
 
 
 
यद्यपि कर्बला के मैदान में अन्याय पूर्ण युद्ध के दौरान विदित रूप से असत्य ने सत्य की सभी मशालों को बुझा दिया और युद्ध में यज़ीद को विजयी घोषित किया गया किंतु यदि गहराई से विचार किया जाए तो असली जीत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की हुई क्योंकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने आंदोलन द्वारा एक नया संदेश विश्व वासियों को दिया और एक सत्य व मानवीय मूल्यों के लिए सब कुछ त्याग देने की एक एसी संस्कृति की आधारशिला रखी  जो अमिट हो गयी। जर्मनी के प्रसिद्ध लेखक मोसियू मारबीन के अनुसार इस्लामी जगत के इस महान योद्धा ने विश्व वासियों के सामने यह सिद्ध कर दिया कि अत्याचार और अन्याय अधिक दिनों तक जारी रही रहता और अत्याचार का महल देखने में चाहे जितना विशाल और मज़बूत हो सत्य के सामने घास फूस की भांति उड़ जाता है।
 
 
 
आशूर मानव इतिहास की एक अत्याधिक महत्वपूर्ण घटना की याद दिलाता है कि जिसके  दौरान आधे दिन से भी कम समय में पवित्र हस्तियों के शरीर , खून में लथपथ होकर इराक़ के कर्बला नामक मरूस्थल में  भूमि पर गिर गये और असत्य ने समझा कि वे उनके शरीरों के भूमि पर गिरते ही वह उठ गया और उसने सत्यता का चोगा पहन लिया किंतु विश्व और इतिहास ने अत्याचारी को पहचाना और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के संदेश को सीने से लगाया और आज भी विश्व के कोने कोने में बहुत सी जातियां और राष्ट्र हैं जिन्हें मुक्ति, स्वतंत्रता व सत्यता का पाठ, इमाम हुसैन के महान आंदोलन से ही मिला है।   
 
 
 
मिस्र के प्रसिद्ध इस्लामी बुद्धिजीवी सैयद क़ुतुब कहते हैं एसे बहुत से शहीद हैं जो यदि एक हज़ार वर्ष भी जीवित रहते तो अपने धर्म को उतना लाभ नहीं पहुंचा सकते थे जितना उन्हों ने मर कर पहुंचाया होता है। वे जीवित रह कर किसी भी दशा में इतने महान मानवीय अर्थों को मानव जाति के ह्रदय की गहराईयों में इस प्रकार उतार नहीं पाते और न ही अपने अंतिम संदेश से हज़ारों लोगों को महान कार्यों पर प्रोत्साहित कर पाते।
 
 
 
     यही कारण है कि इमाम हुसैन और उनके साथियों का महान आंदोलन और उनकी शहादत विश्व भर के स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए आदर्श बना और विश्व के बहुत से नेताओं ने अपने स्वतंत्रता संग्राम में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन  से पाठ लिया और उसे अपना आदर्श बनाया। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का यह एतिहासिक बयान कोई नहीं भूल सकता कि मैं ने भारत वासियों को कोई नयी चीज़ नहीं दी बल्कि मैंने कर्बला के नायक की जीवनी के अध्ययन से जो कुछ प्राप्त किया था वही भारत वासियों को दे दिया  यदि हम भारत को स्वतंत्र कराना चाहते हैं तो हमारे लिए अनिवार्य है कि हम उसी मार्ग पर चलें जिस पर अली के पुत्र हुसैन चले थे। और आशूर की महान घटना का ही प्रभाव था कि महात्मा गांधी नमक आंदोलन में बहत्तर साथियों के साथ निकले थे।
 
 
 
आशूर उन निराले लोगों की गाथा है जिन्होंने ईश्वरीय राह में, सत्य व मानवता के लिए अपना सब कुछ हंसते मुस्कराते लुटा दिया और बार बार अपना सब कुछ लुटाने की हसरत लिए, इस संसार से चले गये किंतु उनकी इसी भावना ने उन्हें अमर बना दिया और आज विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में शोक में डूबे लोग और मुहर्रम का मनाया जाना उनकी इसी भावना को श्रद्धांजलि है। हम सलाम करते हैं हुसैन और उनके बहत्तर साथियों को जिन्होंने मानवीय मूल्यों की रक्षा के मार्ग में अपने प्राण त्यागे और मानव जाति को युद्ध व संघर्ष का नया तरीका सिखा दिया एसा मार्ग सुझाया जिसमें कभी हार नहीं होती।


source : irib
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