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Monday 8th of March 2021
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हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

रमज़ान का पवित्र महीना अपनी पूरी अनुकंपाओं व अध्यात्म के साथ जारी है। इस पवित्र महीने में रोज़ेदार अपने रोज़ेदार भाईयों और बहनों को इफ़्तार का निमंत्रण देते हैं और उनके स्वागत के लिए दस्तरख़्वान पर विभिन्न प्रकार के पकवान सजाते हैं। कुछ लोग मस्जिदों में ईश्वर के बंदों के लिए इफ़्तार भेजते हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों के इफ़्तार का पुण्य उन्हें प्राप्त हो। जब दस्तरख़्वान की
हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

रमज़ान का पवित्र महीना अपनी पूरी अनुकंपाओं व अध्यात्म के साथ जारी है। इस पवित्र महीने में रोज़ेदार अपने रोज़ेदार भाईयों और बहनों को इफ़्तार का निमंत्रण देते हैं और उनके स्वागत के लिए दस्तरख़्वान पर विभिन्न प्रकार के पकवान सजाते हैं। कुछ लोग मस्जिदों में ईश्वर के बंदों के लिए इफ़्तार भेजते हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों के इफ़्तार का पुण्य उन्हें प्राप्त हो। जब दस्तरख़्वान की बात निकलती है तो इतिहास हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के दस्तरख़्वान की याद दिलाता है। रमज़ान की पंद्रहवीं तारीख़ को लोग हज़रत इमाम हसन अलैहिस्लाम का अनुसरण करते हुए अपने रोज़े व उपासनाओं की शोभा वंचितों और अनाथों की सहायता करके बढ़ाते हैं और इस्लाम की इस महान हस्ती के जन्म दिन को बड़े ही उत्साह व हर्षोल्लास से मनाते हैं।
 
 
 
 
 
भलाई करना, हज़रत इमाम हसन अलैहिस्लाम के व्यक्तित्व की विशेष पहचान है। हज़रत इमाम हसन वंचितों और पीड़ितों की आशा की किरण थे। कभी कभी ऐसा होता था कि मांगने वाले ने अभी अपनी मांग बयान ही नहीं की कि उसकी मांग पूरी कर देते थे और उसे इस बात की अनुमति नहीं देते थे कि वह व्यक्ति सवाल करके स्वयं को लज्जित करे। कभी ऐसा होता था कि वंचित को एक साथ इतना पैसा दे देते थे कि वह अपने जीवन चक्र को अच्छे ढंग से चला सके और किसी के आगे हाथ न फैलाए। इसीलिए उन्हें करीमे अहलेबैत अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन के दानी की उपाधि दी गयी।
 
 
 
सुन्नी मुसलमानों के प्रसिद्ध इतिहासकार सियुती लिखते हैं कि हसन इब्ने अली बहुत अधिक नैतिकता और इंसानी गुणों के स्वामी थे, वह महान हस्ती, विनम्र, सम्मानीय, सुशील, दानी, क्षमा करने वाले और लोगों के मध्य पसंदीदा व्यक्ति थे।
 
 
 
 
 
पवित्र रमज़ान की पंद्रहवीं तारीख़, सन तीन हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम के बाग़ में एक सुन्दर फूल खिला। यह पैग़म्बरे इस्लाम का पहला नवासा था जिसके आने से पूरी दुनिया प्रकाशमान हो गयी और लोग पैग़म्बरे इस्लाम के घर उनको नवासे की बधाई देने के लिए दौड़ पड़े। रेडियो तेहरान भी अपने श्रोताओ की सेवा में इस पावन अवसर पर हार्दिक बधाई प्रस्तुत करता है।
 
 
 
हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के जन्म के बाद हज़रत फ़ातेमा ने हज़रत अली से कहा कि नवजात का नाम रख दें। हज़रत अली कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम के रहते हुए मैं अपने पुत्र का नाम नहीं रख सकता। उसके बाद वह अपने पुत्र को कपड़े में लपेट कर पैग़म्बरे इस्लाम के पास ले गये । पैग़म्बरे इस्लाम ने बड़े ही प्रेम से नवजात को अपनी गोद में लिया और उसके दाहिने कान में अज़ान दी और बायें कान में अक़ामत कही और उसके बाद कहा कि ईश्वर की ओर से जिब्राइल आये थे और सलाम व पुत्र के जन्म की बधाई देने के बाद कहा कि अली का स्थान आप के निकट वैसा ही है जैसा कि मूसा के निकट उनके भाई हारून का था, इसीलिए अली के बेटे का नाम हारून के बेटे के नाम पर रखिए। मैंने पूछा हारून के बेटे का नाम क्या था? जिब्राइल ने कहा शब्बर, मैंने कहा कि हमारी भाषा अरबी है, कहा अरबी में हसन है।
 
 
 
 
 
हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों में बहुत उच्च स्थान है। उनके नाना पैग़म्बरे इस्लाम, उनके पिता हज़रत अली और उनकी माता हज़रत फ़ातेमा हैं। उनका पालन पोषण पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली की छत्रछाया में हुआ। हज़रत इमाम हसन ने अपने जीवन के सात मूल्यवान वर्ष पैग़म्बरे इस्लाम की छत्रछाया में गुज़ारे। पैग़म्बरे इस्लाम अपने नवासे को बहुत अधिक चाहते थे और उन्हें अपने कंधे पर बिठाते थे और कहते थे कि मेरे ईश्वर मैं इनसे स्नेह करता हूं तू भी इनसे स्नेह कर।
 
 
 
 
 
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बेटों को पैग़म्बरे इस्लाम बहुत अधिक चाहते थे। एक दिन हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अपने दोनों बेटों इमाम हसन और इमाम हुसैन के साथ पैग़म्बरे इस्लाम से मिलने आईं और कहा कि पिता जी यह दोनों आपके पुत्र हैं, इनके लिए कुछ चीज़ें यागदार कर दें ताकि हमेशा आपको याद रहे। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा इमाम हसन को मेरा रोब व वीरता मिले और इमाम हुसैन को मेरी क्षमाशीलता और वीरता मिले।
 
 
 
इमाम हसन इतने महान थे कि पैग़म्बरे इस्लाम ने उनकी अल्पायु के बावजूद अपने कुछ समझौतों में उनको गवाह बनाया। पैग़म्बरे इस्लाम जब ईश्वर के आदेश पर नजरान के निवासियों से मुबाहेले के लिए निकले तो उन्होंने ईश्वर के आदेश से इमाम हसन, इमाम हुसैन, हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा को अपने साथ लिया और उसी समय उनकी पवित्रता का गुणगान करते हुए आयते ततहीर उतरी।
 
 
 
 
 
हज़रत इमाम हसन अपनी पूरी क्षमता के साथ ईश्वर की प्रसन्नता और उसके मार्ग में भले काम करते थे और ईश्वर के मार्ग में बहुत अधिक धन ख़र्च करते थे। इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने उनकी गौरवपूर्ण जीवनी में उनकी दानशीलता और वंचित लोगों का ध्यान रखने को अपनी किताबों में वर्णन किया है। एक दिन एक वंचित व्यक्ति इमाम हसन के पास आया किन्तु लज्जा के कारण वह अपने मन की बात उनसे नहीं कह सका। इमाम हसन ने उससे कहा कि अपनी मांग को लिखकर मुझे बताओ, उस व्यक्ति ने अपने दिल की बात लिख दी। जब इमाम हसन ने उसका पत्र पढ़ा तो उन्होंने उसकी मांग का दोगुना उसे प्रदान किया। वहां बैठे एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि हे पैग़म्बरे इस्लाम के पुत्र, यह पत्र उसके लिए कितना विभूतियों वाला था। इमाम हसन ने उसके जवाब में कहा उसकी विभूतियां हमारे लिए अधिक थी क्योंकि इसने मुझे भलेकर्म करने वालों में शामिल कर दिया।
 
 
 
इमाम हसन ने अपने पूरे जीवन भर लोगों का मार्गदर्शन किया और लोगों के साथ उनके व्यवहार यहां तक कि शत्रुओं के साथ उनके व्यवहार के कारण लोग उनकी ओर खिंचे चले आते थे। वह लोगों को निष्ठापूर्वक ईश्वर की उपासना करने और पवित्र रहने का निमंत्रण देते थे और स्वयं भी नमाज़ के समय बेहतरीन वस्त्र पहनते थे। किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ईश्वर सुन्दर है और उसे सुन्दरता बहुत पसंद है, मैं इसीलिए ईश्वर के दरबार में उपस्थित होने के समय मैं स्वयं को संवारता हूं, ईश्वर ने आदेश दिया है कि अपनी सुन्दरता के साथ और सज धज कर मस्जिद में उपस्थित हो।
 
 
 
लोगों के मार्गदर्शन के समय इमाम हसन का धैर्य और उनकी क्षमाशीलता, उनकी एक अन्य विशेषता थी। इसी धैर्य और क्षमाशीलता के कारण उन्होंने तत्कालीन सरकार के कई षड्यंत्रों को विफल बना दिया और मुआविया के साथ शांति समझौता करके वास्तव में एक अन्य शैली द्वारा आत्याचारों से संघर्ष का ध्वज लहरा दिया। इतिहासकार लिखते हैं कि एक दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे । वर्तमान सीरिया का रहने वाला एक व्यक्ति उनके रास्ते में आ गया और उन्हें बुरा भला कहने लगा। इमाम हसन ने उस व्यक्ति को सलाम किया और मुस्कुरा कर कहा कि मुझे लगता है कि तू यात्री है, अगर तू मुझसे कुछ चाहता है तो मैं तुझे प्रदान करूं। यदि तू भूखा है तो तुझे पेटभर खाना दूं, यदि तेरे पास कपड़े नहीं हैं तो मैं तुझे बेहतरीन कपड़े दूं, यदि तुझे किसी चीज़ की आवश्यकता तो मैं तेरी आवश्यकता को पूरा करूं। आओ मेरे मेहमान बनो। जब तक तुम यहां पर हो, मरे मेहमान हो, तत्कालीन सीरिया के उस व्यक्ति ने जब यह सब सुना, वह इमाम हसन के पैरों पर गिर गया और रोने लगा और कहा कि मैं गवाही देता हूं कि आप धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि हैं और ईश्वर भलिभांति जानता है कि यह स्थान किसे प्रदान किया जाए। मैं इससे पहले तक आपका और आपके पिता का बहुत बड़ा शत्रु था किन्तु अब मैं दुनिया में सबसे अधिक आपको चाहता हूं। वह व्यक्ति उस दिन के बाद से इमाम हसन अलैहिस्सलाम के अनुयायियों में हो गया और जब तक वह मदीने में रहा, इमाम हसन का मेहमान था।
 
 
 
इमाम हसन अलैहिस्सलाम को सभी लोग बहुत पसंद करते थे, सभी उनका सम्मान करते थे। उनकी लोकप्रियता इन सीमा तक थी कि कभी मदीने शहर के मुख्य द्वार पर उनके लिए चटाई बिछाई जाती थी और वह उस चटाई पर बैठककर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करते थे और उनकी समस्याओं का समाधान करते थे।
 
 
 
वहां से जो भी गुज़रता था एक क्षण के लिए ठहर जाता था ताकि उनकी सुन्दर बातों को सुने और उनके प्रकाशमयी चेहरे को देखे और पैग़म्बरे इस्लाम के प्रकाशमयी चेहरा उनको याद आ जाए। जब वह बाज़ार निकलते थे तो बहुत अधिक लोग उनके इर्दगिर्द एकत्रित हो जाते थे और रास्ता बंद हो जाता था, और जैसे ही इमाम हसन का ध्यान इस ओर जाता था वह फ़ौरन ही उस स्थान से उठ जाते थे ताकि दूसरे लोगों के लिए रास्ता खुल जाए।
 
 
 
इमाम हसन अलैहिस्सलाम का कहना है कि ईश्वर के निकट सबसे उच्च स्थान उसका है जो सबसे अधिक लोगों के अधिकारों से अवगत हो, उनके अधिकारों को अदा करने में सबसे अधिक प्रयास करे, जो भी अपने धार्मिक भाइयों के सामने विनम्रता करे, ईश्वर उसे हज़रत अली का मित्र और उनके चाहने वालों में शामिल करता है। (AK)


source : irib.ir
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