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Thursday 20th of January 2022
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ज़िन्दगी की बहार-1

इंसान की उम्र बहुत बड़ी ईश्वरीय नेअमत है। इंसान पैदा होने के समय से लेकर मरने तक विभिन्न चरणों को तय करता है और उनमें से हर चरण की अलग अलग विशेषता होती है। इंसान की उम्र में जवानी को उसके उम्र की बहार समझा जाता है और उसका विशेष स्थान है। जवानी वह समय है जिसमें इंसान अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करता है। जवानी वह समय है जिसमें इंसान का व्यक्तित्व संवरता है और विभिन्न विशेषताएं ज़ाहिर होती हैं। इसी प्रकार जवानी वह समय है जिसमें जवान की उमंगे, क्षमताएं
ज़िन्दगी की बहार-1

इंसान की उम्र बहुत बड़ी ईश्वरीय नेअमत है। इंसान पैदा होने के समय से लेकर मरने तक विभिन्न चरणों को तय करता है और उनमें से हर चरण की अलग अलग विशेषता होती है। इंसान की उम्र में जवानी को उसके उम्र की बहार समझा जाता है और उसका विशेष स्थान है। जवानी वह समय है जिसमें इंसान अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करता है। जवानी वह समय है जिसमें इंसान का व्यक्तित्व संवरता है और विभिन्न विशेषताएं ज़ाहिर होती हैं। इसी प्रकार जवानी वह समय है जिसमें जवान की उमंगे, क्षमताएं एवं योग्यताएं खुलकर सामने आती हैं। यही वह समय होता है जिसमें साहस, घमंड और दुस्साहस आदि विशेषताएं भी अपने चरम पर होती हैं। इसी प्रकार जवान के अंदर भिन्नाभिन्न इच्छाएं होती हैं जिनका समुचित उत्तर दिया जाना चाहिये।
 
 
 
जवानी के समय से सही लाभ वही उठा सकेगा जो ज्ञान एवं ईमान से भरपूर लाभ उठायेगा। यद्यपि आरंभ में जवान के पास अनुभव नहीं होता है परंतु अगर वह अपनी आंतरिक क्षमताओं व योग्यताओं पर ध्यान दे और अपनी जवानी से लाभ उठाये तो उसका आधार मज़बूत होगा और कामयाबियां उसके क़दम चूमेंगी। जवान का मस्तिष्क उस ख़ाली ज़मीन की भांति होता है जो हर प्रकार की खेती करने के लिए तैयार होती है।
 
 
 
युवापीढ़ी के मनोवैज्ञानिक डाक्टर महमूद गुलज़ारी जवानी को इंसान की उम्र का सबसे बेहतरीन समय मानते और कहते हैं” जिस तरह सूरज गतिशील है और दिन का आरंभ सूरज निकलने से होता है उसी तरह इंसान की उम्र के चरण गतिशील हैं और जवानी वह समय है जब सूरज आसमान के बीच में होता है। यह वह समय होता है जो प्रकाश और ऊर्जा से भरा होता है। जवानी में बचपने की अपरिपक्वता नहीं होती है। बचपने में बच्चा माता पिता पर निर्भर और उनसे अधिक जुड़ा होता है। जवानी में इंसान स्वाधीनता एवं अपनी अलग पहचान बनाने के प्रयास में होता है जबकि बुढ़ापे में दोबारा समीपवर्ती लोगों पर निर्भरता में वृद्धि हो जाती है। जवानी का समय निर्भरताओं के बीच का समय होता है और वह इंसान की बहुत मूल्यवान पूंजी होती है और जवानी का समय बीत जाने के बाद इंसान समझता है कि जवानी भी एक बहार थी जो गुज़र गयी”
 
 
 
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जवानी की जो ऊर्जा होती है उसके सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। जिस तरह से अगर बाढ़ के पानी को नियंत्रित किया जाये, बड़े बड़े बांधों के माध्यम से उसे रोका जाये और टरबाइन में पहुंचाया जाये तो उससे बिजली पैदा की जा सकती है और उससे गांव, समाज, नगर और पूरे देश को प्रकाशित किया जा सकता है। उसी तरह जवान योग्यताओं व क्षमताओं की वह प्रतिमूर्ति होता है कि अगर उसका सही मार्गदर्शन किया जाये और उसकी क्षमताओं से सही तरह से लाभ उठाया जाए तो पूरे समाज को उसकी योग्यताओं व क्षमताओं के प्रकाश से प्रकाशित किया जा सकता है। जवान जिस तरह नाना प्रकार की अछाइयों का स्रोत हो सकता है और उससे लाभ उठाया जा सकता है उसी तरह से अगर उसका सही मार्गदर्शन न किया गया तो वह सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक बुराइयों की जड़ भी बन सकता है। इसी तरह युवा हर समाज और देश की पूंजी होते हैं।
 
वास्तव में आज के जवान कल के समाज के निर्माता हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। इसी बीच बहुत से लोग, पार्टियां और शक्तियां जवानों की शक्ति व योग्यता का दुरुप्रयोग अपने हितों के लिए करते हैं। ईश्वरीय धर्म इस्लाम के अनुसार योग्यताओं व क्षमताओं के विकास व निखार के लिए सबसे अच्छा समय जवानी का समय है। क्योंकि जवानों का दिल एवं आत्मा पाक होती है और उनका दिल नर्म होता है। बहुत से ईश्वरीय दूतों को जवानी में उपासना के कारण नबी का पद प्रदान किया गया। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” मैं तुमसे जवानों के बारे में अच्छे व्यवहार की सिफारिश करता हूं क्योंकि उनके दिल नर्म और अच्छाइयों को स्वीकार करने वाले होते हैं। ईश्वर ने मुझे अपना दूत बनाकर भेजा है ताकि मैं लोगों को ईश्वर की दया व कृपा की शुभ सूचना दूं और उसके प्रकोप से डराऊं जवानों ने मेरे निमंत्रण को स्वीकार किया और वे मुझसे प्रेम करते हैं परंतु बूढ़ों ने मेरा निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और मेरा विरोध किया।“
 
 
 
 
 
जवान ऊर्जा और स्फूर्ति से भरा होता है। साथ ही वह वास्तविकता की जिज्ञासा रखता है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में हर समाज और देश का जवान प्रगति का केन्द्र बिन्दु होता है। अगर अभियान व आंदोलन क्रांतिकारी और राजनीतिक हो तो जवान सबसे आगे आगे होते हैं और वे दूसरों से अधिक प्रभावी होते हैं। यहां तक कि ईश्वरीय दूतों के अभियान में भी जवान आगे आगे थे।”
 
परिपूर्णता का बीज बचपने में बोया जाता है और जवानी में उसकी खेती की जाती है। यह वह समय है जब ज्ञान, कला और दूसरी अच्छाइयों को स्वीकार करने की तत्परता इंसान के अंदर सबसे अधिक होती है। वास्तव में जवानी इंसान की उम्र का सबसे कीमती व मज़बूत बिन्दु है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है” ईश्वर वही है जिसने तुम्हें पैदा किया है जबकि तुम कमज़ोर थे उसके बाद उसने तुम्हें शक्ति प्रदान की और शक्ति के बाद उसने दोबारा तुम्हें कमज़ोर बनाया और वह जो चाहता है पैदा करता है और वह सर्वज्ञाता एवं हर कार्य करने में पूर्णसक्षम है।“
 
 
 
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” अगर तुम समाज का सुधार व उत्थान चाहते हो तो जवानों से शुरू करो कि वह हर भलाई को स्वीकार करने के लिए सबसे अधिक तत्पर होते हैं और उनके दिल अधिक नर्म होते हैं।“ इस आधार पर अगर जवान की सही शिक्षा- प्रशिक्षा हो तो वह स्वयं एवं अपने समाज का भविष्य प्रकाशमयी बना सकता है।
 
 
 
आज की दुनिया में जवानों का सही मार्गदर्शन अतिआवश्यक है क्योंकि सही मार्गदर्शन में ही उसके लोक -परलोक का कल्याण नीहित है। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने इंसान को परिपूर्णता के शिखर पर पहुंचाने के लिए मार्ग सुझायें हैं। इस्लाम सबसे व्यापक और समुचित धर्म है। महान ईश्वर ने इंसान को पैदा किया है और वह उन समस्त चीजों को जानता है जो उसने इंसान के अस्तित्व में रखा है। दूसरे शब्दों में इस्लाम धर्म में महान ईश्वर ने जो कानून बनाये हैं उन्हें उसने इंसान की सृष्टि को ध्यान में रखकर बनाया है इसलिए इस्लाम धर्म के क़ानून हर धर्म से अधिक मानवीय प्रवृत्ति से मिलते हैं। संक्षेप में यह कि जवानी से सही ढ़ंग से लाभ उठाना समस्त क्षेत्रों में प्रगति व उन्नति एवं मनुष्य की परिपूर्णता का कारण बनता है। इसी कारण इस्लाम में जवानी के महत्व और उससे लाभ उठाने पर बहुत बल दिया गया है।
 
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source : irib.ir
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