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Saturday 27th of November 2021
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मुर्तज़ा मुतह्हरी

मानव इतिहास के विभिन्न चरणों में विभिन्न क्षेत्रों में दक्ष बुद्धिजीवी सामने आये जिन्होंने अन्य लोगों के कल्याण की मशाल प्रज्वलित की। लोगों के सबसे बड़े मार्गदर्शक ईश्वरीय दूत, पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन हैं और उसके बाद इस्लाम धर्म के बुद्धिजीवी यह संदेश पहुंचाने में उनके वारिस होते हैं। शहीद आयतुल्लाह मुतह्हरी इन्हीं सितारों में से एक चमकते व दमकते सितारे हैं जिन्होंने अपने ज्ञान को ईमान व अमल तथा शिष्टाचार से मिश्रित किया और अपने समय के अंधकारमयी समाज का कुशल ढंग से मार्गदर्शन किया, यहां तक कि अंधकार के पुजारी उनके प्रकाशमयी विचारों और अस्तित्व को सहन न कर सके और दो मई वर्ष 1979 की शाम को उन्हें शहीद कर दिया।

 

इस्लामी क्रांति के महान नेता स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी उनकी शहादत के अवसर पर कहते हैं कि मैंने अपनी सबसे प्रिय संतान खो दी जो मेरे पूरे जीवन का परिणाम थी। इस संतान की शहादत से प्रिय धर्म इस्लाम मज़बूत हुआ और संसार को ऐसा आघात पहुंचा जिसकी कोई भी वस्तु भरपाई नहीं कर सकती।

 

इमाम ख़ुमैनी की ओर से अपने सबसे प्रिय शिष्य के बारे में यह असाधारण बात बिना कारण के नहीं थी। प्रोफ़ेसर मुर्तज़ा मुतह्हरी में पायी जाने वाली शैक्षिक व व्यवहारिक योग्यताओं ने उन्हें अन्य चीज़ों से अलग कर दिया। उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में किताबहाए तौहीद, अद्ले इलाही, नबूअत, ख़ातेमियत, इन्साने कामिल, एलले गिराइश बे माद्दिगरी, नेज़ामे हक़ूक़े ज़न दर इस्लाम और ख़िदमाते मुताक़ाबिले इस्लाम व ईरान की ओर संकेत किया जा सकता है।

 

शहीद मुतह्हरी की एक अन्य विशेषता, युवा पीढ़ी की सामाजिक समस्या, और वैचारिक धड़ों विशेषकर वैचारिक भ्रांतियों की गहन पहचान थी। वह इस्लामी विचारों को सही ढंग से बयान करने के साथ साथ पथभ्रष्टता और वैचारिक भ्रांतियों के संबंध में विशेष रूप से संवेदनशीलता थी और इसे वे इस्लामी समाज के पतन का कारण मानते थे। यही कारण था कि उन्होंने इन भ्रांतियों से पर्दा उठाना और लोगों को इससे सचेत करने अपना मिशन बना लिया था। उनकी पुस्तकों व रचनाओं पर एक दृष्टि डालने से अज्ञानता और नादानी से उनका संघर्ष अधिक स्पष्ट हो जाता है।

शहीद मुतह्हरी कहते हैं कि लोगों में एक ऐसी इंद्री पायी जाती है जो कभी कभी अपनी कल्पना में धार्मिक मामलों में विनम्र हो जाती है, उस समय ऐसी विनम्रता का प्रदर्शन करती है जो स्वयं धर्म की अनुमति के विपरीत है, अर्थात बुद्धि के दीप को दूर कर देती है और इसके परिणाम स्वरूप धर्म के मार्ग को खो बैठती है। पवित्र क़ुरआन की आयतें और रिवायतें भी इस बात को दर्शाती हैं कि इस्लाम धर्म में चिंतन मनन किस सीमा तक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम के एक प्रसिद्ध कथन में आया है कि एक घंटे का चिंतन मनन सत्तर वर्ष की उपासना से बेहतर है। इस कथन में कभी भी उपासना के महत्त्व को कम नहीं बताया गया है और न ही उसे छोटा बताया गया है क्योंकि पवित्र क़ुरआन के अनुसार मनुष्य की सृष्टि का महत्त्वपूर्ण कारण, ईश्वर की उपासना है। पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन का उद्देश्य, धर्म में गहन चिंतन मनन और चेतना के साथ उपासना की आवश्यकता पर बल देना है। यह कथन स्पष्ट करता है कि इस्लाम धर्म चिंतन मनन और सोच विचार का निमंत्रण देने वाला धर्म है। यह चिंतन मनन, मनुष्य की सृष्टि, पवित्र क़ुरआन की आयतों, ईश्वरीय नामों व उसके गुणों तथा पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों और उनकी परंपराओं जैसे विभिन्न क्षेत्रों में हो सकता है। इस आधार पर निश्चेतना, अज्ञानता और संकीर्णता को इस्लाम नकारता है।

 

शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी अज्ञानता और संकीर्णता को मनुष्य की दो ख़तरनाक बीमारी की संज्ञा देते हैं जो उसके विकास के मार्ग में बाधा बनती है और अंत में उसकी पथभ्रष्टता और उसके पतन का कारण बनती है। उनका मानना है कि अज्ञानता के कारण मनुष्य या तो ग़ैर धार्मिक जीवन के तड़क भड़क के जाल में फंस जाता है और मुख्य धर्म को पुनर्विचार की आवश्यकता के बहाने भ्रष्ट कर देता है या संकीर्णता का शिकार हो जाता है और हर आधुनिक वस्तु को धर्म विरोधी मानने लगता है।

 

प्रोफ़सर मुर्तज़ा मुतह्हरी ने अज्ञानता और संकीर्णता के ख़तरे को अधिक स्पष्ट रूप से रेखांकित करने के लिए इस्लाम धर्म के आरंभिक काल में खवारिज समुदाय के प्रकट होने की घटना बयान करते हैं। सिफ़्फ़ीन के युद्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सेना मोआविया की सेना को पराजित ही करने वाली थी कि मोआविया के सेना पति उमरे आस ने एक चाल चली और सेना को पवित्र क़ुरआन को भाले पर उठाने का आदेश दिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बहुत से सैनिक अज्ञानता और संकीर्णता के कारण धोखा खा गये और वे नारे लगाने लगे कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी फ़ैसले का अधिकार नहीं है और इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के नेतृत्व को अस्वीकार्य कर दिया।

उन्होंने वास्तव में सूरए अनआम की आयत संख्या 57 की व्याख्या के संबंध में जिसमें कहा है कि आदेश केवल ईश्वर ही के हाथ में है, ऊपरी अर्थ में फंस गये और यह सोचने लगे कि इस्लामी समाज को शासक की आवश्यकता नहीं है जबकि बिना शासक के ईश्वरीय आदेश संपूर्ण रूप से क्रियान्वित नहीं होगा। इस अज्ञानता के परिणाम स्वरूप ख्वारिज के नाम से एक कट्टरपंथी गुट अस्तित्व में आया जो स्वयं को धर्म का प्रतिनिधि और इस्लाम का ठेकेदार समझने लगा और दूसरों के यहां तक कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में उनका कहना था कि उन्होंने इस्लाम धर्म को समझने में ग़लती की।

 

उनका मानना था कि जिस मुसलमान से महापाप हो जाए, वह इस्लाम से निकल जाता है और काफ़िर हो जाता है। इस आस्था ने इस्लामी समाज को बहुत हानि पहुंचाई। वे जो स्वयं को इस्लाम का ठेकेदार समझते थे, हर मुसलमान को जो उनके अनुसार आस्था नहीं रखता था, काफ़िर कहते थे और उसकी हत्या कर देते थे। उदाहरण स्वरूप अब्दुल्लाह बिन ख़ब्बाब पैग़म्बरे इस्लाम के निष्ठावान साथी थे। एक दिन की बात है कि उनका सामना ख़वारिज से हो गया, उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने कहा कि हज़रत अली इब्ने अबी तालिब, तुम से अधिक धर्म के जानकार हैं, उनको और उनकी गर्भवती पत्नी की पाश्विक ढंग से हत्या कर दी।

 

पूरे इस्लामी इतिहास में ख़वारिज विचार धारा ने विभिन्न ढंग से इस्लामी समाज में दरार उत्पन्न की। शहीद मुतह्हरी कहते हैं कि ख़वारिज का इतिहास आश्चर्यजनक व शिक्षाप्रद है, इस दृष्टि से कि जब धार्मिक आस्थाएं, अज्ञानता और संकीर्ण विचारधारा से मिल जाती हैं तो क्या होता है। ख़वारिज वह लोग थे जो इतनी अधिक उपासना करते थे कि उनके माथे और घुटनों में ज़बरदस्त गठ्ठा पड़ गया था और सदैव अपनी जान का बलिदान करने को तैयार रहते थे, किन्तु वे संकीर्ण विचार के लोग थे और उन्होंने इस्लाम को बहुत हानि पहुंचाई और एक अजीब प्रकार का भय उत्पन्न कर दिया यहां तक कि इस वाक्य ने कि आदेश केवल ईश्वर ही के हाथ में है, लोगों के दिलों को भयभीत कर दिया।

 

शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी खवारिज विचारधारा को रद्द करने के लिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कथन का हवाला देते हैं, वे कहते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम  ने खवारिज विचारधारा व आस्था को रद्द करते हुए कहा है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने अपराधियों को मृत्युदंड दिया और उसके बाद उनके शव पर नमाज़ पढ़ी, यदि महापाप, अनेकेश्वरवाद का कारण होता तो पैग़म्बरे इस्लाम को उनके जनाज़े पर नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए थी क्योंकि पवित्र क़ुरआन के अनुसार काफ़िर के शव पर नमाज़ पढ़ना सही नहीं है। इसी प्रकार मदिरा पीने वालों को कोड़े मारते थे किन्तु वित्तीय ख़ज़ाने से उनका भाग काटते नहीं थे।

 

मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति पर नज़र डालने से पता चलता है कि वह ख़तरा जिससे शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी जैसे विद्वान अवगत कराते थे, उस पर ध्यान देने और उससे अधिक सतर्क होने की आवश्यकता है। तकफ़ीरी विचारधारा, इस्लाम के आरंभिक काल में उत्पन्न होने वाली खवारिज विचारधारा का वर्तमान रूप है। ये भी खवारिज की भांति स्वयं को ही पक्का और सच्चा मुसलमान समझते हैं और हर व्यक्ति जो उनका विरोधी है, उसकी पाश्विक ढंग से हत्या कर देते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम खवारिज और संकीर्ण विचार रखने वालों के बारे में कहते हैं कि वे कठोर, श्रेष्ठ विचार ओर कोमल भावनाओं से परे लोग हैं, ऐसे आवारा लोग हैं जो हर कोने से एकत्रित हो गये हैं और धर्म से अनभिज्ञ हैं। वे दूसरे स्थान पर कहते हैं कि जान लोग कि तुम सबसे बुरे लोग हो, तुम शैतान के हाथ की तीर हो जो निशाना लगाने के लिए तुम्हारे अस्तित्व से लाभ उठाता है और तुम्हारे माध्यम से लोगों को पथभ्रष्टता और संदेह में ढकेल देता है।

 

आज के मुस्लिम समाज पर संकीर्ण विचारधारा की होने वाली हानियों में से एक यह है कि रूढ़ीवादी विचार रखने वाले लोगों को सत्य और असत्य के मोर्चे की पहचान में शंकाग्रस्त कर देते है। शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी इस बात की ओर संकेत करते हुए कि इस प्रकार की विचारधारा की पोल शीघ्र खुलनी चाहिए, ख़वारिजों के संबंध में हज़रत अली के बर्ताव की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के जीवन का सबसे साहसिक व महत्त्वपूर्ण क़दम विदित रूप से पवित्र दिखने वाले रुढ़ीवादियों से संघर्ष था। हज़रत अली ने उनसे युद्ध किया और उनकी स्थिति को पागल कुत्तों की भांति बताया है। जिस प्रकार से काट खाने वाले जानवर का कोई उपचार नहीं है, दूसरों पर आक्रमण करता है और बीमारी फैलाता है, यह विचारधारा भी धीरे धीरे मुस्लिम समाज को दूषित कर देगी और इस्लाम की कमर तोड़ देगी। पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम कहते हैं कि दो व्यक्तियों ने मेरी कमर तोड़ दी है,  हठधर्मी मूर्खों और दायित्वहीन ज्ञानी ने।

 

अल्लामा मुर्तज़ा मुतह्हरी ने अपने पूरे जीवन में इस्लाम के चेहरे से अज्ञानता के बादल को छांटने का बहुत अधिक प्रयास किया और इसी मार्ग में अपनी जान न्योछावर कर दी। यद्यपि कई वर्ष बीत गये कि वे हमारे मध्य नहीं हैं किन्तु उनके प्रकाशमयी विचार अब भी सत्य के खोजियों के लिए मार्गदर्शन है। 

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