Hindi
Saturday 10th of April 2021
1570
0
نفر 0
0% این مطلب را پسندیده اند

आदर्श जीवन शैली- १

 

हर समाज और हर व्यक्ति की जीवन शैली, उस व्यक्ति में पायी जाने वाली आस्थाओं या उस समाज में प्रचलित विचारधाराओं से प्रभावित होती है। भौतिक विचारधाराएं तथा आनंददायक व लाभदायक चीज़ें एक विशेष जीवन शैली को जन्म देती हैं और इसी प्रकार ईश्वरीय विचार धाराएं, परिपूर्णता और कल्याण तक पहुंचने की शैली भी एक विशेष जीवन शैली को अस्तित्व प्रदान करती हैं।

 

मनुष्य की वास्तविकता क्या है और जीवन का अर्थ क्या है, इस संबंध में किए जाने वाले व्यापक अध्ययन व शोधों के बावजूद मनुष्यों के बारे में शोध करने वाले शोधकर्ताओं का यह मानना है कि मनुष्य को पहचानने के साधन, मनुष्य और उसके महत्त्वपूर्ण विभिन्न आयामों के बारे में सही और परिपूर्ण उत्तर देने में अक्षम हैं। वास्तविकता यह है कि विभिन्न संस्कृतियों व समाजों में मनुष्य की विचारधाराएं उसके जीवन के अनेक चित्र पेश करती हैं कि जिसके आधार पर उसका जीवन या तो अर्थपूर्ण हो जाता है या अर्थहीन। उदाहरण स्वरूप यदि मनुष्य का लक्ष्य उचित व तार्किक न हो कि पूरा जीवन उसी की ओर चलता रहे या मनुष्य को एक ऐसे अस्तित्व के रूप में पेश किया गया हो जो सामाजिक, ऐतिहासिक व जीवनी की दृष्टि से ज़ोरज़बरदस्ती का शिकार हो, उसको अपना भविष्य निर्धारण करने का अधिकार न हो तो इस स्थिति में उसका जीवन अर्थहीन, ख़ाली और चौपट होकर रह जाएगा। यदि एक ऐसे अस्तित्व के रूप में पेश किया जाए जो तार्किक लक्ष्यों से संपन्न हो और उसे हर प्रकार का अधिकार प्राप्त हो और वह अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए उच्च लक्ष्यों तक पहुंच सकता हो तो उसका जीवन अर्थपूर्ण होगा। इस अंतर का लाभ एक विशेष जीवन शैली के रूप में निकलेगा।

 

ईश्वरीय धर्मों की दृष्टि में मनुष्य का जीवन केवल इस भौतिक जीवन तक ही सीमित नहीं है और मनुष्य यह कि अपने जीवन से भरपूर लाभ उठाए उसे जीवन के ख़ालीपन से दूर रहना चाहिए और यह चीज़ जीवन के बारे में पाये जाने वाले मुख्य प्रश्नों के उत्तर अर्थात हम कहां से आए हैं, हम कहां हैं और हमे कहां जाना है, के अतिरिक्त किसी और वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता।

 

धर्म इन निर्णायक प्रश्नों के स्पष्ट व पारदर्शी उत्तर देता है और जीवन में पाये जाने वाली भ्रांतियों और अंधकार को दूर करता है। अलबत्ता मनुष्य की बुद्धि भी किसी सीमा तक इन प्रश्नों के उत्तर दे सकती है किन्तु बुद्धि की सीमित्ता का इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह इन प्रश्नों के पूर्ण उत्तर देने में अक्षम है।

 

इस संबंध में धार्मिक शिक्षाएं मनुष्य की स्वतंत्रता, उसके अधिकार के क्षेत्रों और उसके लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं और हर व्यक्ति धर्म की छत्रछाया में अपने जीवन के अर्थ को सरलता से पा सकता है। एकेश्वरवाद, पैग़म्बरी और प्रलय के संबंध में धार्मिक शिक्षाओं से इस चीज़ को प्राप्त किया जा सकता है।

 

इस्लाम धर्म में मनुष्य के अस्तित्व के दो महत्त्वपूर्ण भागों के रूप में उसके आरंभ और प्रलय पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है और इन दोनों के बीच के संबंध को विस्तारपूर्वक बयान किया गया है। इस विचारधारा में व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के एक दूसरे से संबंध को बहुत ही अच्छे ढंग से बयान किया गया है और उसके अतीत, उसके वर्तमान और उसके भविष्य, उसके भौतिक व अध्यात्मिक आयामों और उसके रुझहानों और उसकी विचारधाराओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। यही कारण है कि इस्लामी विद्वानों का मानना है कि पैग़म्बरों के भेजे जाने का सबसे ठोस व मज़बूत प्रमाण, लोक परलोक के संबंधों और मनुष्य के कल्याण में प्रभावी व अप्रभावी चीज़ों को जानना है।

 

पैग़म्बरों के भेजे जाने की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां, उनकी महत्त्वपूर्ण शिक्षाएं थीं जिसने अनुयाइयों को संतुलित जीवन की विशेष शैली का पाठ सिखाया। इस बारे में अधिकार विस्तार के लिए इस बिन्दु की ओर संकेत किया जाना आवश्यक है कि मनुष्य सदैव अपने जीवन में दूसरों और प्रकृति से अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के प्रयास में रहता है। तकनीक और वैज्ञानिक शैलियों के सहारे प्रकृति पर नियंत्रण, इन प्रयासों के उदाहरणों में है। यदि समाज की संस्कृति धार्मिक शिक्षाओं से संपन्न न हो या संस्कृति का धार्मिक मूल्यों से टकराव हो तो ऐसी जीवन शैली अस्तित्व में आती है जिसके कारण मनुष्य का इराद धीरे धीरे तकनीक के वर्चस्व में चला जाता है क्योंकि मनुष्य हर चीज़ को विज्ञान व तकनीक से जोड़ कर देखता है। दूसरे शब्दों में अतीत में प्रकृति के सामने मनुष्य की कमज़ोरी, प्रकृति पर विजय प्राप्त करने वाली तकनीक के समक्ष नतमस्तक होने में परिवर्तित हो गयी अलबत्ता यह उदंडी आत्मा के मुक़ाबले में मनुष्य की अक्षमता का एक उदाहरण समझा जाता है।

 

इसके मुक़ाबले में धर्म की शिक्षाओं से प्राप्त धार्मिक मनुष्यों की विचारधाराएं उसको आंतरिक इच्छाओं के क्षणिक आनंदों के मुक़ाबले में सशक्त करती हैं। वास्तव में भौतिक सभ्यताओं के लक्ष्यहीन व असीमित आनंद जो भौतिक संसार के भोग विलास का परिणाम हैं, धार्मिक शिक्षाओं से निकली जीवन शैली में संतुलित व निर्देशित हो जाते हैं। इस प्रकार से भौतिक कल्याण व निर्धनता अवमूलन जैसे विषय, मनुष्य की आत्मा को सर्वोच्च करने के मार्ग के रूप में वांछित हो जाते हैं। इस तरह से इस विचारधारा की छत्रछाया में यह दावा किया जा सकता है कि इस्लाम धर्म के दृष्टिगत व वांछित आर्थिक व सामाजिक विस्तार जैसी बातें उस प्रकार का सामाजिक कल्याण नहीं है जिसे अपने लक्ष्यों की आपूर्ति के लिए प्रयोग किया जाए बल्कि यह इस्लाम के दृष्टिगत विकास के मार्ग हैं जो मनुष्य को उसकी सृष्टि के मुख्य लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होते हैं और यही वह मार्ग है जिसे पवित्र क़ुरआन में श्रेष्ठता और सर्वोच्च मार्ग के रूप में याद किया गया है। 

 

इस्लामी विचारधाराओं की विशेषताओं में से एक यह है कि इसमें एकेश्वरवाद की आस्था पर भरोसा करते हुए संसार में अनन्य ईश्वर को ही वास्तविक शक्ति का स्रोत माना जाता है। पवित्र क़ुरआन भी सामाजिक प्रक्रियाओं और मनुष्य के सामाजिक परिवर्तनों को सदैव ईश्वर से जोड़ता है और इसे ईश्वरीय स्रोत से अलग नहीं समझता। पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में वांछित परिपूर्णता मनुष्य का कल्याण है जो व्यक्तिगत रूप से प्राप्त किया जाता है और इस विचारधारा को सभी नैतिक मत स्वीकार करते हैं।

 

इस्लाम धर्म अपनी विचारधारा से मनुष्य को यह सिखाता है कि एक ओर तो वह पूर्ण रूप से ईश्वर पर निर्भर होता है और दूसरी ओर उसका जीवन सांसारिक जीवन तक ही सीमित नहीं है। इस प्रकार से मनुष्य का उसके आरंभ व उसके अंत से संबंध का पता चलता है। इस प्रकार से मनुष्य को चाहिए कि अपने सांसारिक संबंधों को प्रलय के अमर जीवन के लिए सुरक्षित रखे। इस्लाम की दृष्टि में सांसारिक जीवन, परलोक के कल्याण तक पहुंचने का साधन और भूमिका है कि जिससे सही ढंग से लाभान्वित होना चाहिए।

 

इस परिधि में कि जिसमें मनुष्य से ईश्वर के संबंध को दिखाया गया है, मनुष्य का स्वयं से अन्य लोगों से और प्रकृति से संबंध भी परिभाषित किया गया है। इस्लामी विचारधाराओं के आधारों में मनुष्य का प्रकृति और भौतिक संसार में ईश्वरीय अनुकंपाओं से विशेष संबंध है। इस आधार पर मनुष्य का व्यवहार किस प्रकार होता है और सांसारिक अनुकंपाओं की कमी या उसमें वृद्धि के समय उसकी जीवन शैली कैसी होती है, इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है और मनुष्य अपने व्यवहार से ज़मीन को आबाद करने और श्रेष्ठ सभ्यता का आधार रखने में लाभ उठा सकता है। इस बिन्दु के दृष्टिगत मनुष्य के प्रकृति से संबंध और ईश्वरीय अनुकंपाओं के समक्ष उसकी ज़िम्मेदारियों को पहचानने की आवश्यकता है।

 

इस्लाम की दृष्टि में मनुष्य का अपने अस्तित्व के महत्त्व को समझने और अपने और ईश्वर के मध्य संबंध को सुरक्षित रखने की स्थिति में प्रकृति से उसका संबंध और अधिक मज़बूत हो जाएगा। अर्थात वह ईश्वरीय अनुमति से प्रकृति की समस्त संभावनाओं से व्यक्तिगत हितों व सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लाभ उठा सकता है। इस आधार पर यह ऐसी विचारधारा है जिस पर इस्लाम धर्म में बहुत अधिक बल दिया गया है ताकि इस्लामी समाज अपने उच्च सामाजिक लक्ष्यों तक पहुंच जाए और इसी के साथ आलस और सुस्ती की बहुत अधिक बुराई की गयी है क्योंकि सुस्ती और आलस मनुष्य में पायी जाने वाली सबसे घृणित वस्तु है। इस प्रकार से संसार को आबाद करने के लिए प्रयास करने और भौतिक जीवन के लिए संभावनाओं के प्रबंध करने को प्रलय पर वास्तविक आस्था और परलोक से उद्दंडता का नाम नहीं दिया जा सकता बल्कि इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर इस प्रकार का आदर्श व्यवहार एक प्रकार की उपासना और ईश्वर का अनुसरण समझा जाता है।

 

इस्लामी संस्कृति में जो चीज़ संसार को बुराई के रूप में पेश करती है वह समस्त चीज़ें हैं जो मनुष्य को ईश्वर की यादों से निश्चेत कर देती हैं और जिसमें ईश्वर की अवज्ञा की गंध पायी जाती है। दूसरे शब्दों में संसार उसी समय बुराई का पात्र होता है जब मनुष्य का मुख्य लक्ष्य बन जाए और उसको उसकी सृष्टि के मुख्य लक्ष्य से दूर कर दे।

 

यह कहा जा सकता है कि पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में लोक परलोक मनुष्य के जीवन के दो चरण हैं जिनमें एक जीवन को निकट करके पेश करता है जबकि दूसरा चरण उसे परिपूर्ण करके पेश करता है। प्रत्येक दशा में सांसारिक जीवन न केवल यह कि स्वयं में नकारात्मक होता है बल्कि परलोक के जीवन के लिए भूमिका व साधन और पुल होता है क्योंकि मनुष्य परलोक के जीवन को अपने हाथों से बनाता है और अपने हिसाब से उसे ढालता है।

1570
0
0% (نفر 0)
 
نظر شما در مورد این مطلب ؟
 
امتیاز شما به این مطلب ؟
اشتراک گذاری در شبکه های اجتماعی:

latest article

मानव जीवन के चरण 7
इमाम हसन (अ) के दान देने और क्षमा करने ...
इंतेख़ाबे शहादत
ईश्वर को कहां ढूंढे?
क़ुरआन पढ़ते ही पता चल गया कि यह ...
हज़रत मासूमा
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा उम्महातुल ...
इमाम अली नक़ी अ.स. के दौर के राजनीतिक ...
इस्लामी संस्कृति व इतिहास-2
नेमत पर शुक्र अदा करना

latest article

मानव जीवन के चरण 7
इमाम हसन (अ) के दान देने और क्षमा करने ...
इंतेख़ाबे शहादत
ईश्वर को कहां ढूंढे?
क़ुरआन पढ़ते ही पता चल गया कि यह ...
हज़रत मासूमा
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा उम्महातुल ...
इमाम अली नक़ी अ.स. के दौर के राजनीतिक ...
इस्लामी संस्कृति व इतिहास-2
नेमत पर शुक्र अदा करना

 
user comment