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Sunday 20th of September 2020
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आह, एक लाभदायक पश्चातापी 2

आह, एक लाभदायक पश्चातापी 2

पुस्तक का नामः पश्चाताप दया की आलंग्न

लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारियान

 

शहर वासीयो ने उसकी मृत्यु के पश्चात ख़ुशी मनाई तथा उसको शहर से बाहर किसी गढ्ढे मे डाल कर उसके ऊपर घास फूस डाल दिया।

उसी समय एक वली ए खुदा को स्वप्न मे हुक्म हुआ कि उसको ग़ुस्ल व कफ़न दो तथा परहेजगारो के कब्रिस्तान मे उसका अंतिम संसकार करो।

उसने कहाः हे पालनहार वह एक प्रसिद्ध पापी, अपराधी एंव चरित्रहीन था, वह किस कारण तेरे समीप महबूब बन गया तथा तेरी कृपा एंव क्षमा के दायरे मे आगया है ? उत्तर आयाः

उसने स्वयं को नादार मुफ़लिस एंव दर्दमंद देखा तो मेरे दरबार मे रोने लगा, मैने उसको अपनी दया एंव कृपा की आलंग्न मे ले लिया है।

कौन ऐसा दर्दमंद है जिसके दर्द का हमने उपचार ना किया हो और कौन ऐसा हाजतमंद है जो मैरे दरबार मे रोए और मै उसकी आवश्यकता को पूरा ना करुँ, कौन ऐसा बीमार है जो मेरे दरबार मे रोया हो और मैने उसका उपचार ना किया हो?[1]



[1] मनहजुस्सादेक़ीन, भाग 8, पेज 110

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