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Thursday 28th of January 2021
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हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम की शहादत 2

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम की शहादत 2

हिजरी क़मरी कैलेन्डर के अनुसार तीन जमादिस्सानी को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की शहादत का दिन है। इस अवसर पर हम अपने सभी श्रोताओं की सेवा में हार्दिक संवेदना प्रकट करते हैं।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम, अपने पिता पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद मात्र ९० दिन जीवित रहीं। पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास का दुख सभी मुसलमानों विशेषकर उनके परिजनों के लिए बहुत बड़ा था क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उनके परिजनों के लिए विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो गयी थीं। इतिहासकारों ने लिखा है कि हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम अपने पिता के वियोग में बहुत रोती थीं किंतु उनका दुख पिता का वियोग ही नहीं था। बल्कि उनके मन को वह घटनाएं भी पीड़ा दे रही थीं जो पैग़म्बरे इस्लाम के बाद सामने आयी थीं। इसके साथ ही वे इस बात से भी दुखी थीं कि मानव समाज का एक महान मार्गदर्शक चला गया। यही कारण था कि हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम ने अपने पिता के अभियान को आगे बढ़ाने का बीड़ा भी उठाया। इस संदर्भ में उन्होंने दो अत्यन्त महत्वपूर्ण भाषण दिये एक मदीने की मस्जिद में और दूसरा पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ अनुयाइयों के मध्य।

मदीना नगर में मस्जिदे नबी में हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम का इतिहासिक भाषण कई भागों पर आधारित है और उसके हर भाग का उद्देश्य, समाज के लिए मार्गों का निर्धारण और सही-गलत की पहचान कराना है। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम ने अपने इस भाषण में ईश्वरीय संदेश की झलक उपस्थित लोगों को दिखायी और एकीश्वरवाद, ईश्वरीय दूत और पैग़म्बरे इस्लाम के बाद की घटनाओं पर प्रकाश डाला तथा धार्मिक शिक्षाओं व नैतिक मूल्यों का वर्णन किया। इस भाषण में एक स्थान पर वे कहती हैं

                                                                                   

निश्चित रूप से ईश्वर ने ईमान व आस्था को, तुम लोगों को, अनेकेश्वरवाद से पवित्र बनाने का साधन बनाया, नमाज़ को घमंड से दूरी, ज़कात व दान को, आत्मा की पवित्रता और अजीविका में वृद्धि तथा रोज़े को सदभावना व शुद्ध इरादों में स्थायित्व का माध्यम बनाया।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम ने अपने इस भाषण में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत किया और वह महत्वपूर्ण बिन्दु मुसलमानों में फूट है। वे फूट से बचने का मार्ग, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत अर्थात परिजनों से जुड़े रहने को बताते हुए कहती हैं

ईश्वर ने अहले बैत की इमामत और नेतृत्व को, मनमानी और फूट से दूर रखने तथा एकता के लिए अनिवार्य किया है ताकि उसकी छत्रछाया में मुसलमान, लोक परलोक की सफलता प्राप्त कर सकें।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम का पालन पोषण, उस घर में हुआ था जो ईश्वरीय संदेशों का केन्द्र था और वे एसे घर में रहती थीं जो ईश्वरीय शिक्षाओं और कुरआन की आयतों के उतरने का स्थान था। वे बचपन में ही इन उच्च ईश्वरीय मूल्यों व नैतिक सिद्धान्तों से अवगत हुईं और अपने पिता के व्यवहार और कथनों में इन मूल्यों को व्यवहारिक होते हुए देखा। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम बहु आयामी व्यक्तित्व की स्वामी थीं और सभी मानसिक व आत्मिक एवं नैतिक आयामों से उच्च स्थान की स्वामी थीं। उपासना के समय इस प्रकार से ईश्वर के गुणगान में लीन हो जातीं कि घंटों बीत जाते और उन्हें समय बीतने का आभास भी न होता। इतिहासकारों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के एक कथन को लिखा है जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि मेरी बेटी फ़ातेमा, सभी पीढ़ियों और युगों की महिलाओं की सरदार है। वह मेरे अस्तित्व का अंश और दिल का टुकड़ा है। वह ऐसी अप्सरा है जिसे मानव रूप दे दिया गया है। जब वह अपने ईश्वर के सामने उपासना के लिए खड़ी होती है तो उसके अस्तित्व से फूटने वाला तेज, आकाश के फ़रिश्तों को प्रकाश देता है ठीक उसी प्रकार जैसे तारों का प्रकाश, पृथ्वी पर रहने वालों पर पड़ता है।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की दृष्टि में उपासना अपने भीतर अत्यन्त व्यापक अर्थ लिए हुए है और इसे केवल नमाज़ या विशेषप्रकार के संस्कारों में ही सीमित नहीं किया जा सकता। ईश्वर की उपासना और उसकी सेवा, हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम के जीवन का मूल लक्ष्य था। लोगों के साथ सदव्यवहार उनकी मुख्य विशेषता थी और इससे उस समय का हर व्यक्ति अवगत था। कई बार ऐसा हुआ कि हाथ फैलाने वाला, हर दरवाज़े से निराश होने के बाद जब उनके द्वार पर पहुंचा तो उसकी झोली भर दी गयी क्योंकि हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम इस प्रकार से लोगों की सहायता को एक प्रकार की उपासना और ईश्वर की राह में संघर्ष समझती थीं और इससे उन्हें अपार सुख प्राप्त होता था।

इस्लामी इतिहास की इस महान हस्ती के विचार में मनुष्य इस संसार में जीवन बिता कर और उससे आनंद उठा कर ही अपने मन को ईश्वर के असीम प्रेम से सजा सकता है। यही कारण है कि उन्होंने एक दिन अपने पिता पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम से कहाः हे पिता ईश्वर की उपासना से मुझे जो सुख प्राप्त होता है उसने मुझे, हर इच्छा से दूर कर दिया है और मेरा मन चाहता है कि सदैव ईश्वरीय ध्यान में लीन रहूं।

निश्चित रूप से ईश्वर की गहरी पहचान और आध्यात्मिक स्थान ने ही, हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम के लिए सभी दुखों और समस्याओं को सहनीय और सरल बना दिया था।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम का पूरा जीवन, अरब में अज्ञानता के काल के अंधविश्वासों और गलत परंपराओं को बदलने पर आधारित था। वे महिलाओं और बेटियों के अपमान की गलत पंरपरा को पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा समाप्त किये जाने का प्रतीक थीं। एसे युग में जब बेटियों को जीवित ही गाड़ दिया जाता था, पैग़म्बरे इस्लाम, अपनी पुत्री के हाथों को सम्मान से चूमा करते थे। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की संसारिक मोह माया में अरूचि, समय की धारा से अलग होने का एक अन्य प्रतीक है। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम बचपन से ही जीवन दर्शन पर गहरी नज़र रखती थीं। पैग़म्बरे इस्लाम के प्रसिद्ध अनुयायी सलमान फ़ारसी कहते हैं कि एक दिन मैंने देखा कि हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम एक सस्ती और साधारण सी चादर ओढ़े हैं मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैंने सोचा कि ईरान और रोम के राजाओं की बेटियां, सोने के सिंहासन पर बैठती हैं और बहुमूल्य वस्त्र पहनती हैं किंतु पैग़म्बरे इस्लाम की पुत्री, साधारण वस्त्र और चादर का प्रयोग करती हैं। कुछ दिनों बाद मैंने हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम को यह कहते सुनाः सांसारिक तड़क भड़क मुझे धोखा नहीं दे सकती। ईश्वर ने अपने विशेष सुख, उपासकों के लिए प्रलय में रखे हैं।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम ने कभी भी संसार के जल्दी समाप्त होने वाले सुखों पर ध्यान नहीं दिया। वे सफलता को, ईश्वरीय आदेशों के पालन में देखती थीं। वे इस विश्वास तक पहुंच चुकी थीं कि सच्चे मन से ईश्वर की उपासना ही मनुष्य द्वारा ईश्वर की दासता का आधार और ईश्वर द्वारा सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार की प्राप्त का मार्ग है। इस संदर्भ में वे कहती थीः जो सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करता है, ईश्वर उसे सर्वश्रेष्ठ रूप में लाभ पहुंचाता है। उपासना में लगन व सच्चाई, मनुष्य के कल्याण व परलोक में उसकी सफलता का कारण है और इससे मनुष्य का पूरा अस्तित्व भलाई व सच्चाई से भर जाता है जैसा कि स्वंय हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम के अस्तित्व में हमें यह विशेषता दिखायी देती है। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम के जीवन की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता यह भी है कि आध्यात्मकि रूप से इतने उच्च स्थान पर होने के बावजूद वे, समाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों से अनभिज्ञ नहीं थीं। अत्याचार के सामने डट जाने और अपने अधिकारों की मांग तथा समाज में सक्रिय रूप से सार्थक भूमिका निभाना भी हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम के जीवन का वह भाग है जो सभी महिलाओं के लिए आदर्श बन सकता है। इस प्रकार से हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम ने धर्म और संसार के मध्य एक तार्किक संबंध स्थापित किया था और धार्मिक शिक्षाओं को ससांरिक जीवन में व्यवहारिक किया। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम जीवन के सभी क्षेत्रों में, अपने दांपत्य जीवन और बच्चों के पालन पोषण से लेकर सत्य की रक्षा के लिए भाषण देने तक के सभी चरणों में केवल अपने ईश्वर के आदेशों के पालन के बारे में सोचती थीं।

हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम को ज्ञात था कि यद्यपि उनकी आयु बहुत कम है किंतु पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद सब से पहले वहीं उनसे भेंट करने वाली हैं। यह वह सूचना थी जो स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें दी थी। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम का कोमल मन, अपने पिता के वियोग से आहत था और पैग़म्बरे इस्लाम के बाद की घटनाओं ने उनके हृदय को पीड़ा से भर दिया था और फिर अपने पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अधिकारों की रक्षा के दौरान जो घाव उन्हें लगे थे उन सब ने मिल कर उन्हें बिस्तर पर डाल दिया। हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की आयु के अंतिम क्षण थे। पैग़म्बरे इस्लाम की वसीयत की अनदेखी करने वाले मुसलमानों से उनका मन दुखी था। अंतिम समय में उन्होंने पानी मांगा और उससे वूज़ू करके काबे की ओर मुंह करके लेट गयीं। अपने पति हज़रत अली से अपनी वसीयत में कहा कि उनके शव को रात में नहलाया जाए और रात में ही उन्हें दफन किया जाए और किसी को भी उनके मरने की सूचना न दी जाए। यह कहते कहते हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की महान आत्मा, पीड़ा भरे उनके शरीर को छोड़ कर चली गयी। उनके पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी पत्नी के दुख में डूबे हुए उठे और कहा हे फातेमाः तुम्हारी दूरी मेरे लिए बहुत कठिन है और यह मेरे लिए एसा दुख है जिसकी पीड़ा कभी समाप्त नहीं होगी। कार्यक्रम के अंत में हम एक बार फिर हज़रत फ़ातेमा अलैहस्सलाम की शहादत दिवस पर संवेदना प्रकट करते हैं और अपने कार्यक्रम को उनके एक कथन से समाप्त करते हैं। वे कहती हैं तुम्हारे संसार की तीन वस्तुएं मुझे प्रिय हैं क़ुरआन पढ़ना, पैग़म्बरे इस्लाम के मुख के दर्शन और ईश्वर के लिए दान दक्षिणा करना।


source : irib.ir
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