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Monday 10th of May 2021
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कुमैल का शासन

कुमैल का शासन

पुस्तक का नामः दुआए कुमैल का वर्णन

लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

 

कुमैल अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) की ओर से फ़रात नदि के तट पर स्थित हैयत शहर के राज्यपाल थे, परन्तु वह अपने कर्तव्य इस को भलि भाती चलाने मे असफ़ल थे, सन् 39 हिजरी मे मआवीया ने इस शहर की कुच्छ आबादी तथा गांवो पर आक्रमण किया था जिसकी रक्षा करने मे कुमैल असर्मथ थे और यह कुमैल की एक कमज़ोरी थी इसकी क्षतिपूर्ति के लिए क़रक़ीसा जो मुआविया के अधिकृत था कुमैल ने उस पर आक्रमण कर दिया। अमीरुल मोमेनीन (अ.स.) ने कुमैल के इस कार्य का विरोध किया तथा इस प्रकार कहाः

أَمَّا بَعْدُ فَإِنَّ تَضْيِيعَ الْمَرْءِ مَا وُلِّيَ وَ تَكَلُّفَهُ مَا كُفِيَ لَعَجْزٌ حَاضِرٌ وَ رَأْيٌ مُتَبَّرٌ وَ إِنَّ تَعَاطِيَكَ الْغَارَةَ عَلَى أَهْلِ قِرْقِيسِيَا وَ تَعْطِيلَكَ مَسَالِحَكَ الَّتِي وَلَّيْنَاكَ لَيْسَ بِهَا مَنْ يَمْنَعُهَا وَ لَا يَرُدُّ الْجَيْشَ عَنْهَا لَرَأْيٌ شَعَاعٌ فَقَدْ صِرْتَ جِسْراً لِمَنْ أَرَادَ الْغَارَةَ مِنْ أَعْدَائِكَ عَلَى أَوْلِيَائِكَ غَيْرَ شَدِيدِ الْمَنْكِبِ وَ لَا مَهِيبِ الْجَانِبِ وَ لَا سَادٍّ ثُغْرَةً وَ لَا كَاسِرٍ لِعَدُوٍّ شَوْكَةً وَ لَا مُغْنٍ عَنْ أَهْلِ مِصْرِهِ وَ لَا مُجْزٍ عَنْ أَمِيرِهِ

अम्मा बादो फ़इन्ना तज़यीयल मरऐ मा वुल्लेया वतकल्लोफ़हू मा कोफ़ेया लअजज़ुन हाज़ेरुन वरायुन मुतब्बरुन वइन्ना तआतेयकल ग़ारता अला आहले क़िरक़िसिया वतातीलका मसालेहकल्लति वलैनाका लैसा बेहा मन यमनओहा वला यरूद्दलजैशा अन्हा लारायुन शआउन फ़क़द सिरता जिसरन लेमन अरादल ग़ारता मिन आदाएका अला औलेयाएका ग़ैरा शदीदिलमनकेबे वला महीबिल जानेबे वला सादन सग़रता वला कासेरिन लेअदुविन शोकता वला मुग़निन अन आहले मिसरेहि वला मुजज़िन अन अमीरेहि[1]

मनुष्य का उसे अनदेखी करना जिसका उसे उत्तरदायी बनाया गया है तथा उस काम मे जुट जाना जो उसके कर्तव्यो मे सम्मिलित नही है यह एक स्पष्ट कमज़ोरी और विनाशकारी विचार है। और तुम्हारा क़िरक़ीसया पर आक्रमण करना तथा अपनी सीमाओ को निलंबित छौड़ देना जिनका तुम्हे उत्तरदायी बनाया गया था, उस स्थिति मे कोई उनका रक्षा करने वाला और उनसे लश्करो को हटाने वाला नही था यह एक अत्यधिक ग़लत विचार है। इस प्रकार तुम मित्रो पर आक्रमण करने वाले शत्रुओ के लिए एक साधन बन गए। जहाँ तुम्हारे कंधे मज़बूत थे और कोई तुम्हारी हैबत थी तुमने शत्रु का रास्ता रोका और उसकी पराजय को तोड़ा। शहर वालो के काम आए और ही अपने समृद्ध के कर्तव्य को पूरा किया।  



[1]नहजुल बलाग़ा, पत्र क्रमाँक 61

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