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Monday 21st of September 2020
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कुमैल के लिए ज़िक्र की हक़ीक़त 2

कुमैल के लिए ज़िक्र की हक़ीक़त 2

पुस्तक का नामः दुआए कुमैल का वर्णन

लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

 

कुमैल ने कहाः अधिक व्याखया करे। अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने कहाः रहस्य के बहुबल के माध्यम से घूंघट (हेजाब) का तोड़ना।

कुमैल ने कहाः अधिक व्याखया करे। अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने कहाः प्रकाशीय है जो अनंत काल से चमक रहा है तथा इसके प्रभाव की किरणे एकेश्वरवाद (एकता, तौहीद) के शरीर पर पड़ रही है।

कुमैल ने कहाः अधिक व्याखया करे। अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने कहाः दीपक बुझा दो कि सुबह हो गई है।[1]

2- कुमैल पुत्र ज़ियाद को अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) की बाते जिनकी व्याख्या स्वयं कुमैल करते हैः

अबु तालिब के पुत्र अमीरुल मोमेनीन अली (अ.स.) ने मेरा हाथ पकड कर जंगल मे ले गये, जैसे ही वहाँ पहुँचे एक प्रकार की आवाज़ निकाली क्योकि आवाज़ से दुख प्रकट हो रहा था, तत्पश्चात कहाः



[1] ( یَا أمِیرَ المُؤمِنِین، مَا الحَقِیقَۃَ؟ فَقَالَ: مَا لَکَ وَالحَقِیقَۃَ فَقَالَ أوَ لَستُ صَاحِبَ سِرِّکَ قَالَ: بَلَی، وَ لَکِن یَرشَحُ عَلَیکَ مَا یَطفَحُ مِنِّی: فَقَالَ: أو مِثلَکَ تَخِیبُ سَائِلاً؟ فَقَالَ: ألحَقِیقَۃُ کَشف سُبحَاتِ الجَلَالِ مِن غَیرِ إِشَارَۃ۔ فَقَالَ: زِدنِی بَیَاناً، قَالَ عَلَیہِ السَّلام: مَحوَ المَوھُومِ وَ صَحوَ المَعلُومِ، فَقَالَ: زِدنِی بَیَاناً، قَالَ: ھَتَکَ السِرَّ لِغَلبَۃِ السِرِّ، فَقَالَ: زِدنِی بَیَاناً، قَالَ:نُور یَشرَقُ مِن صُبحِ الاَزَلِ فَیَلُوحُ عَلَی ھَیَاکِلِ التَوحِیدِ آثَارَہُ، فَقَالَ: زِدنِی بَیَاناً، فَقَالَ: إطفِ السِّرَاجَ فَقَد طَلَعَ الصُبحُ )

या अमीरल मोमेनीन, मल हक़ीक़ता? फ़क़ालाः मा लका वलहक़ीक़ता फ़क़ाला अवा लस्तो साहेबा सिर्रेका क़ालाः बला, वलाकिन यरशहो अलैका मा यतफ़हो मिन्नीः फ़क़ालाः अवा मिसलका तख़ीबो साएलन? फ़क़ालाः अलहक़ीक़तो कश्फ़ो सुबहातिल जलाले मिन ग़ैयरे इशारतिन। फ़क़ालाः ज़िदनी बयानन, क़ाला अलैहिस्सलामः महवल महमूमे व सहवल मअलूमे, फ़क़ालाः ज़िदनी बयानन, क़ालाः हतकस्सिर्रे लेग़लबतिस्सिर्रे, फ़क़ालाः ज़िदनी बयानन, क़ालाः नूरून यशरक़ो मिन सुबहिल अज़ले फ़यलूहो अला हयाकेलित्तौहीदे आसारहू, फ़क़ालाः ज़िदनी बयाननः फ़क़लाः इतफ़िस्सिराजा फ़क़द तलाअस्सुबहो ( नूरूल बराहीन, जज़एरि, भाग 1, पेज 221; रौज़ातुल जन्नात, भाग 6, पेज 62; शरहुल असमाइल हुसना, मुल्ला हादी सबज़ावारी, भाग 1, पेज 131 )

   

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