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कुमैल को अमीरुल मोमेनीन (अ.स.) की वसीयत 11

कुमैल को अमीरुल मोमेनीन (अ.स.) की वसीयत 11

पुस्तक का नामः दुआए कुमैल का वर्णन

लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

 

हे कुमैल, आदिल इमाम के बिना (अर्थात इमाम की अनुमति के) जंग और जेहाद नही है एंव सामुहिक रूप मे नमाज़ पढ़ने मे कोई वांछनीय (इसतेहबाब) नही है किन्तु उस इमाम के पीछे जो गुणवान हो (अर्थात सामुहिक रूप से नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम मे निश्चित रूप से एक गुण उसके पीछे पढ़ने वाले लोगो से अधिक हो)।

हे कुमैल, यदि पृथ्वी पर एक भी नबी प्रकट नही हुआ होता और धरती पर एक विश्वास रखने वाला निग्रही व्यक्ति होता, तो वह व्यक्ति अपनी प्रत्येक प्रार्थना से ईश्वर के प्राप्त करने मे ग़लती करता अथवा उसको प्राप्त कर लेता। (तत्पश्चात इमाम अली ने कहाः) ख़ुदा की क़सम निश्चित रूप से ग़लती करता यहाँ तक कि ईश्वर एक दूत भेजे और उसे नबी के रुप मे नियुक्त करता एंव उसकी योग्यता तथा पात्रता की गवाही देता।

हे कुमैल! ईश्वर धर्म के विरूद्ध उठ खड़े होने को दूत (रसूल), नबी अथवा निष्पादक (वसी) के अतिरक्त किसी भी व्यक्ति को स्वीकार नही करता है।

हे कुमैल, मुसलिम समुदाय का नेतृत्व नबुवत और रिसालत एंव इमामत के माध्यम से है, इन माध्यमो की तुलना मे इमाम अथवा विधर्मी (बिदअत ग़ुज़ार) की ओर से विलायत रखते है। निश्चित रुप से ईश्वर अच्छे कार्यो को निग्रही व्यक्तियो से स्वीकृत करता है।           

 

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