Hindi
Saturday 13th of August 2022
0
نفر 0

क़ुरआने करीम की तफ़्सीर के ज़वाबित

हमारा मानना है कि क़ुरआने करीम के अलफ़ाज़ को उनके लुग़वी व उर्फ़ी मअना में ही इस्तेमाल किया जाये,जब तक आयत में अलफ़ाज़ के दूसरे मअना में इस्तेमाल होने का कोई अक़्ली या नक़्ली क़रीना मौजूद न हो। (लेकिन मशकूक क़रीनों का सहारा लेने से बचना चाहिए और क़ुरआने करीम की आयात की तफ़्सीर हद्स या गुमान की बिना पर नही करनी चाहिए।

जैसे क़ुरआने करीम फ़रमाता है कि मन काना फ़ी हाज़िहि आमा फ़हुवा फ़ी अलआख़िरति आमा[1] यानी जो इस दुनिया में नाबीना रहा वह आख़ेरत में भी नाबीना ही रहे गा।

हमें यक़ीन है कि यहाँ पर आमाके लुग़वी मअना नाबीना मुराद नही हो सकते,इस लिए कि बहुत से नेक लोग ज़ाहेरन नाबीना थे,बल्कि यहाँ पर बातिनी कोर दिली व नाबीनाई ही मुराद है। यहाँ पर अक़्ली क़रीने का वुजूद इस तफ़्सीर का सबब है।

इसी तरह क़ुरआने करीम इस्लाम दुश्मन एक गिरोह के बारे में फ़रमा रहा है कि सुम्मुन बुकमुन उमयुन फ़हुम ला यअक़ीलूना [2] यानी वह बहरे ,गूँगे और अन्धे है,इसी वजह से कोई बात नही समझ पाते।

यह बात रोज़े रौशन की तरह आशकार है कि वह ज़ाहिरी तौर पर अन्धे,बहरे और गूँगे नही थे बल्कि यह उन के बातिनी सिफ़ात थे। (यह तफ़्सीर हम क़रीना-ए- हालिया के मोजूद होने की वजह से करते हैं।)

इसी बिना पर क़ुरआने करीम की वह आयते जो अल्लाह तआला के बारे में कहती हैं किवल यदाहु मबसूसतानि [3] यानी अल्लाह के दोनों हाथ खुले हुए हैं। या व इस्नइ अलफ़ुलका बिआयुनिना [4] यानी (ऐ नूह)हमारी आँखों के सामने किश्ती बनाओ।

इन आयात का मफ़हूम यह हर गिज़ नही है कि अल्लाह के आँख, कान और हाथ पाये जाते है और वह एक जिस्म है। क्योँ कि हर जिस्म में अजज़ा पाये जाते हैं और उस को ज़मान, मकान व जहत की ज़रूरत होती है और आख़िर कार वह फ़ना हो जाता है। अल्लाह इस से बरतर व बाला है कि उस में यह सिफ़तें पाई जायें। लिहाज़ा यदाहुयानी हाथों से मुराद अल्लाह की वह क़ुदरते कामिला है जो पूरे जहान को ज़ेरे नुफ़ूज़ किये है,और आयुनयानी आँख़ों से मुराद उसका इल्म है हर चीज़ की निस्बत।

इस बिना पर हम ऊपर बयान की गई ताबीरात को चाहे वह अल्लाह की सिफ़ात के बारे में हों या ग़ैरे सिफ़ात के बारे में अक़्ली व नक़्ली क़रीनों के बग़ैर क़बूल नही करते । क्योँ कि तमाम दुनिया के सुख़नवरों की रविश इन्हीँ दो क़रीनों पर मुनहसिर रही है और क़ुरआने करीम ने इस रविश को क़बूल किया है। मा अरसलना मिन रुसुलिन इल्ला बिलिसानि क़ौमिहि[5] यानी हमने जिन क़ौमों में रसूलों को भेजा उन्हीँ क़ौमों की ज़बान अता कर के भेजा। लेकिन यह बात याद रहे कि यह क़रीने रौशन व यक़ीनी होने चाहिए, जैसे ऊपर भी बयान किया जा चुका है।



[1] सूरए इसरा आयत न. 72

[2] सूरए बक़रह आयत न. 171

[3] सूरए मायदह आयत न. 64

[4] सूरए हूद आयत न.37

[5] सूरए इब्राहीम आयत न. 4


source : http://al-shia.org
0% (نفر 0)
 
نظر شما در مورد این مطلب ؟
 
امتیاز شما به این مطلب ؟
اشتراک گذاری در شبکه های اجتماعی:
لینک کوتاه

latest article

क़ानूनी ख़ला का वुजूद नही है
क़ुरआन नातिक़ भी है और सामित भी
ज़ियारते हज़रत मासूमा-ए-क़ुम (स:अ)
रहबर हुसैन हैं
क़ानूनी ख़ला का वुजूद नही है
उसकी ज़ाते पाक नामुतनाही ...
मलंग कौन शिया या सुन्नी
हिदायत व रहनुमाई
सूर –ए- तौबा की तफसीर 2
ज़ीक़ाद महीने के आमाल

 
user comment