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Wednesday 23rd of September 2020
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इमाम हसन असकरी की शहादत

इमाम हसन असकरी की शहादत

आज पैग़म्बरे इस्लाम के एक पौत्र इमाम हसन असकरी का शहादत दिवस है। आज एक ऐसा अवसर है जिसमें हम इस महापुरूष के जीवन की पुस्तक का एक पृष्ठ खोलकर उनकी विचारधारा और उनकी जीवनशैली से पाठ ले सकते हैं। आज ही के दिन सन २६० हिजरी क़मरी में अत्याचारी अब्बासी शासक के हाथों इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम शहीद किये गए। इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की शहादत पर खेद व्यक्त करते हुए हम उनके जीवन की कुछ बातों का उल्लेख करने जा रहे हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों में से प्रत्येक का जीवन और उनकी संघर्ष शैली कुछ इस प्रकार है जो विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग रूप में प्रकट होती है। इमाम हसन असकरी का जन्म पवित्र नगर मदीने में हुआ था किंतु कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनके कारण वे अब्बासी शासकों की ओर से विवश किये जाने के परिणाम स्वरूप अपने पिता इमाम अली नक़ी के साथ मदीना नगर छोड़कर अब्बासियों की सत्ता के तत्कालीन मुख्यालय सामर्रा जाने पर विवश हुए।

इमाम हादी अर्थात इमाम अली नक़ी और उनके सुपुत्र इमाम हसन असकरी के काल में अब्बासी शासकों ने उनपर अत्याचार तेज़ कर दिये थे। अब्बासी शासकों का मुख्य उद्देश्य लोगों को इमाम से दूर करना और जनता तथा उनके बीच दूरी बनाना था। इस प्रकार इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के बाद के सभी इमामों को अपनी मातृभूमि से दूर निर्वासन में शहीद किया गया। यह कहा जा सकता है कि वे इमाम जिन्होंने अब्बासी शासकों के शासनकाल में जीवन व्यतीत किया उनमें से तीन अर्थात इमाम मुहम्मद तक़ी, इमाम अली नक़ी (अ) और इमाम हसन असकरी (अ) ने विषम परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया। अब्बासी शासक ने दो कारणों से इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम के लिए सीमितताएं निर्धारित की थीं। पहला कारण पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की लोगों, विशेषकर इराक़ियों के बीच लोकप्रियता थी जिससे यह शासन बहुत भयभीत रहता था। इसीलिए अब्बासी शासक यह प्रयास करते थे कि इमाम को बंदी बनाकर और उनपर परोक्ष तथा अपरोक्ष ढंग से नियंत्रण रखकर उनके नेतृत्व में अलवियों के आन्दोलन को रोका जाए। दूसरा तर्क इमाम मेहदी अर्थात मानवता के मोक्षदाता के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथन थे जिनमें स्पष्ट रूप में कहा गया है कि संसार के मोक्षदाता इमाम हसन असकरी के सुपुत्र हैं। वे अत्याचार के आधार का सर्वनाश करेंगे और अत्याचारियों को घुटने टेकने पर विवश कर देंगे। इसीलिए अब्बासी शासन ने विभिन्न शैलियों द्वारा इमाम और उनके परिवार को नियंत्रित करने का प्रयास किया ताकि इस पुत्र को जन्म लेने न दिया जाए।

इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम को इराक़ के सामर्रा नगर के एक सैनिक क्षेत्र में रहने पर विवश किया गया जिसके कारण उनके चाहने वालों और अनुसरणकर्तओं से उनका संपर्क बहुत कठिन हो गया। ईश्वरीय मार्गदर्शन के अपने छह वर्षीय काल के दौरान इमाम पर तत्कालीन शासन और उनके तत्वों की ओर से कड़े दबावों के बावजूद इमाम ने इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया और धर्म के भांति-भांति की कुरीतियों से धर्म को दूर रखा। इन कठिन परिस्थितियों में इमाम की शैली यह दर्शाती है कि कोई भी व्यक्ति या कोई भी वस्तु इमाम अर्थात समाज के आध्यात्मिक नेता को उनके ईश्वरीय दायित्वों के निर्वाह से नहीं रोक सकती। अब्बासी शासन की ओर से इमाम पर चारों ओर से प्रतिबंधों के बावजूद ज्ञान संबन्धी इमाम हसन असकरी के प्रयास कुछ इस प्रकार थे कि वे अपने शिष्यों का प्रशिक्षण करने में सफल रहे। वरिष्ठ इस्लामी विद्वान शेख तूसी ने इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम के शिष्यों की संख्या १०० से अधिक बताई है जिनमें बहुत से वरिष्ठ विद्वान थे।

अपने विशेष प्रतिनिधियों के चयन और उनके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों से पत्राचार के तंत्र की स्थापना, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की अपने अनुयाइयों के साथ संपर्क बनाने की महत्वपूर्ण युक्ति थी। यह संपर्क कभी बहुत ही गोपनीय हुआ करते थे। उदाहरण स्वरूप इमाम के एक बहुत निकट सहयोगी उस्मान बिन सईद तेल बेचने वाले के रूप में इमाम के घर आया-जाया करते थे। कभी-कभी इमाम विभिन्न चीज़ों में पत्र रखकर अपने प्रतिनिधियों को भेजा करते थे।

घुटन भरे उस वातावरण में भी इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम अपने अनुयाइयों विशेषकर लोकप्रिय एवं जानेमाने अनुयाइयों को प्रेरित करते और उनका मनोबल बढ़ाते थे। उदाहरण स्वरूप इमाम ने अपने एक साथी अल बिन हुसैन बिन बाबवैह क़ुमी को इन शब्दों में पत्र लिखा था। हे महापुरूष तथा मेरे विश्वसनीय, धैर्य से काम लो और मेरे शीयों को भी धैर्य का आदेश दो। धरती ईश्वर की है और वह अपने जिस किसी दास को भी चाहे उसका उत्तराधिकारी बनाता है। अच्छा अंत केवल सदाचारियों से विशेष है। सलाम, ईश्वर की कृपा और उसकी अनुकंपा हो समस्त शीयों पर।

इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम का एक अन्य कार्य ग़ैबत के काल के लिए पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के चाहने वालों को तैयार करना था। प्रतिनिधियों का प्रयोग वास्तव में जनता के साथ इमाम के विदित संपर्क के कम होने का कारण था ताकि लोग ग़ैबते इमाम में, अर्थात उस काल में जिसमें ईश्वरीय मोक्षदाता अदृश्य हैं, तैयारी कर सकें।

इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम का शहादत दिवस, १५ वर्षों के देश निकाले के पश्चात स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की स्वदेश वापसी के दिन पड़ रहा है। इन दिनों को ईरान में स्वतंत्रता प्रभात के रूप में मनाया जाता है। निःसन्देह, इमाम ख़ुमैनी की एक महत्वपूर्ण नीति जिसपर वे सदैव बल दिया करते थे, अत्याचार से संघर्ष में पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों की जीवनशैली का अनुसरण करना है। अत्याचारियों से मुक़ाबला और उनके सामने न झुकना इन महापुरूषों की जीवनशैली है। इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम जो भ्रष्टाचार का विरोध करते थे और निर्धन्ता तथा अन्याय के विरूद्ध संघर्ष किया करते थे इस माध्यम से संसार के समस्त न्याय प्रेमियों को यह संदेश देना चाहते थे कि अत्याचार और भ्रष्टाचार का मुक़ाबला किया जाना चाहिए। तवल्ला अर्थात ईश्वर के मानने वालों के साथ मित्रता और ईश्वर के शत्रुओं के साथ शत्रुता उनकी शैली थी। तवल्ला अर्थात ईश्वर के चाहने वालों के साथ कृपा एवं मित्रता, सशक्त आकर्षण शक्ति की भांति ईश्वर प्रेमियों को सत्य की परिधि में सुरक्षित रखती है और तबर्रा अर्थात ईश्वर के शत्रुओं के साथ शत्रुता उनको बुराइयों तथा भ्रष्ट मार्गों से दूर रखता है। इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम मुसलमानों के बीच इस ईश्वरीय दायित्व के बारे में कहते हैं कि अच्छे लोगों के बीच मित्रता उनके लिए पुण्य का कारण है और बुरे लोगों के प्रति घृणा भ्रष्टों के अपमान का कारण बनेगी। अपनी विशेष आकर्षण शक्ति से इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम पवित्र प्रवृत्ति वालों तथा निष्ठावान साथियों को अपनी ओर आकृष्ट किया करते थे तथा इसी से वे मिथ्याचारियों और दिगभ्रमित लोगों को स्वयं से दूर करते थे। इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम के एक निकटवर्ती श्रद्धालु उनके आकर्षण एवं उनकी लोकप्रियता के बारे में कहते हैं कि मेरे स्वामी इमाम असकरी एक अद्वितीय व्यक्ति और एसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वे जब भी कहीं से गुज़रते तो उनके चारो ओर भीड़ एकत्रित हो जाया करती थी। सड़क पर लोग जमा हो जाते और उनमे उत्साह पैदा हो जाता था। जब इमाम लोगों के सामने आते तो सब मौन धारण कर लिया करते थे और हृदयों में उतर जाने वाले उनके तेजस्वी मुख और उनके शालीन एवं वैभवशाली व्यवहार की ओर खिंचे चले आते। इस बीच सब लोग एक किनारे हो जाते ताकि इमाम के गुज़रने के लिए रास्ता खुल जाए।

इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम के छह वर्षीय ईश्वरीय मार्गदर्शन काल में तीन अत्याचारी अब्बासी शासक गुज़रे मोतज़्ज़, मोहतदी तथा मोतमिद। इमाम ने इन अत्याचारी शासकों की दुष्टता पर कभी भी मौन धारण नहीं किया और सदैव ही उनसे विरक्तता व्यक्त की। यही कारण है कि इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम को कई बार जेल में डाला गया। अत्याचारी शासकों के सामने प्रतिरोध करने और उनके सम्मुख नतमस्तक न होने के कारण २८ वर्ष की आयु में वे शहीद कर दिये गए।

इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की शहादत पर पुनः हार्दिक संवेदना प्रकट करते हुए उनके कुछ उपदेश आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं।

आप कहते हैं कि धार्मिक शिक्षाओं में ईश्वर की उपासना तथा पैग़म्बर का अनुसरण बंदगी के महत्व को समझने के लिए सबसे उचित और छोटा मार्ग है।

एक अन्य स्थान पर आप कहते हैं कि मैं तुमको ईश्वर के भय, अपने धर्म में निष्ठा, ईश्वर के लिए प्रयास करने, सच बोलने, पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करने और उनके बारे में अमानतदारी की सिफ़ारिश करता हूं जिसने तुमको अमानतदार समझा है। तक़वा अर्थात ईश्वरीय भर रखो, हमारे लिए सम्मान का कारण बनो, ईश्वर का अधिक से अधिक स्मरण करो, मृत्यु को अधिक याद करो, पवित्र क़ुरआन को अधिक से अधिक पढ़ो और पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर अधिक दुरूर भेजो क्योंकि उनपर दुरूद और सलाम भेजने के बदले में दस अच्छाइयां मिलती हैं। तुममे से जो भी अपने धर्म के प्रति निष्ठावान, सच बोलने वाला, अमानतदार और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने वाला हो एसे व्यक्ति के लिए कहा जाता है कि वह हमारा अनुयाई है और यही वे कार्य हैं जो हमें प्रसन्न करते हैं। मैंने तुमसे जो कुछ कहा उसे याद रखो। अब मैं तुमको ईश्वर के हवाले करता हूं।


source : irib.ir
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