Hindi
Monday 22nd of January 2018
code: 81301

असबाबे जावेदानी ए आशूरा

यूँ तो ख़िलक़ते आलम व आदम से लेकर आज तक इस रुए ज़मीन पर हमेशा नित नये हवादिस व वक़ायए रुनुमा होते रहे हैं और चश्मे फ़लक भी इस बात पर गवाह है कि उन हवादिस में बहुत से ऐसे हादसे भी हैं जिन में हादस ए करबला से कहीं ज़्यादा ख़ून बहाये गये और शोहदा ए करबला के कई बराबर लोग बड़ी बेरहहमी और मज़लूमी के साथ तहे तेग़ कर दिये गये लेकिन यह तमाम जंग व जिनायात मुरुरे ज़मान के साथ साथ तारीख़ की वसीअ व अरीज़ क़ब्र में दफ़्न हो कर रह गयीं मगर उन हवादिस में से फ़क़त वाक़ेया ए करबला है जो आसमाने तारीख़ पर पूरी आब व ताब के साथ बद्रे कामिल की तरह चमक रहा है बावजूद इस के कि दुश्मन हर दौर में इस हादसे को कम रंग या नाबूद करने की कोशिशें करता रहा है मगर यह वाक़ेया उन तमाम मराहिल से गुज़रता हुआ आज चौदहवीं सदी में भी अपना कामयाब सफ़र जारी रखे हुए है, आख़िर सबब क्या है?

आख़िर वह कौन से अनासिर हैं जो इस वाक़ेया को हयाते जावेदाना अता करते हैं? मज़कूरा सवाल को मद्दे नज़र रखते हुए चंद मवारिद की तरफ़ मुख़्तसर इशारा किया जा रहा है जो क़यामे इमाम हुसैन (अ) को ज़िन्दा रखने में मुअस्सिर होते हैं।

वादा ए इलाही

जब हम कुरआन की तरफ़ रुजू करते हैं तो हमें मालूम होता है कि ख़ुदा वंदे आलम अपने बंदों से यह वादा कर रहा है कि तुम मेरा ज़िक्र करो मैं तुम्हारा ज़िक्र करूँगा। हर मुनसिफ़ नज़र इस आयत को और सन् 61 हिजरी के पुर आशोब दौर को मुलाहिज़ा करने के बाद यह फ़ैसला करने पर मजबूर हो जाती है कि चूँ कि उस दौर में जब नाम व ज़िक्र ख़ुदा को सफ़ह ए हस्ती से मिटाया जा रहा था तो सिर्फ़ इमाम हुसैन (अ) थे जो अपने आईज़्ज़ा व अक़रबा के हमराह वारिदे मैदान हुए और ख़ुदा के नाम और उस के ज़िक्र को तूफ़ाने नाबूदी से बचा कर साहिले निजात तक पहुचाया। लिहाज़ा ख़ुदा वंदे मुतआल ने भी अपने वादे के मुताबिक़ ज़िक्रे हुसैन को उस मेराज पर पहुचा दिया कि जहाँ दस्ते दुश्मन की रसाई मुम्किन ही नही है और यही वजह है कि दुश्मनों की इंतेहाई कोशिशों के बावजूद भी ज़िक्रे हुसैन (अ) आज भी ज़िन्दा व सलामत है।

क़यामे इलाही

इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का क़याम एक इलाही क़याम था जो हक़ व दीने हक़ को ज़िन्दा करने के लिये था चुँनाचे आप का जिहाद, आप की शहादत, आप के क़याम का मुहर्रिक सब कुछ ख़ुदाई था और हर वह चीज़ जो लिल्लाह हो और रंगे ख़ुदाई इख़्तियार कर ले वह शय जावेद और ग़ैर मअदूम हो जाती है, क्योकि क़ुरआन मजीद कह रहा है कि जो कुछ ख़ुदा के पास है वह बाक़ी है और दूसरी आयत कह क रही है हर शय फ़ना हो जायेगी सिवाए वजहे ख़ुदा के, जब इन दोनो आयतों को मिलाते हैं तो नतीजा मिलता है कि न ख़ुदा मअदूम हो सकता है और न ही जो चीज़ ख़ुदा के पास है वह मअदूम हो सकती है।

इरादा ए इलाही

ख़ुदा वंदे का इरादा है कि हर वह चीज़ जो बशर व बशरियत के हक़ में फ़ायदेमंद हो उसे हयाते जावेदाना अता करे और उस को दस्ते दुश्मन से महफ़ूज़ रखे।

क़ुरआने मजीद कहता है कि दुश्मन यह कोशिश कर रहा है कि नूरे ख़ुदा को अपनी फ़ूकों से ख़ामोश कर दे लेकिन ख़ुदा का नूर ख़ामोश होने वाला नही है, इमाम हुसैन (अ) चूँ कि नूरे ख़ुदा के हक़ीक़ी मिसदाक़ हैं और क़यामे इमाम भी हर ऐतेबार से बशर और बशरियत के लिये सूद मंद है लिहाज़ा इरादा ए इलाही के ज़ेरे साया यह क़याम ता अबद ज़िन्दा रहेगा।

उन के अलावा और भी बहुत से मौरिद हैं मसलन क़यामे इमाम (अ) की जावेदानी ज़िन्दगी और उस के दायमी सफ़र पर ख़ुद पैग़म्बर (स) भी अपनी मोहरे ताईद सब्त करते हुए फ़रमाते हैं कि शहादते हुसैन (अ) के परतव क़ुलूबे मोमिनीन में एक ऐसी हरारत पाई जाती है कि जो कभी सर्द नही हो सकती। इस हदीस के अंदर अगर ग़ौर व ख़ौज़ किया जाये तो बख़ूबी रौशन हो जाता है कि रसूले अकरम (स) ने इस हादसे के वुक़ूस से पहले ही उस के दायमी होने की ख़बर दे दी थी।

या इस के अलावा वाक़ेया ए करबला के बाद जब अमवियों ने यह सोच लिया था कि दीने ख़ुदा मिट गया, नामे पैग़म्बर (स) व आले पैग़म्बर नीस्त व नाबूद हो चुका है और उसी वक़्ती फ़तहयाबी की ख़ुशी के नशे में मख़मूर जब यज़ीद ने कहा कि कोई ख़बर नही आई, कोई वही नाज़िल नही हुई यह तो बनी हाशिम का हुकूमत अपनाने का महज़ एक ठोंग था तो उस मौक़े पर अली (अ) की बेटी ज़ैनब और इमाम सज्जाद (अ) के शररबार ने यज़ीद के नशे को काफ़ूर करते हुए दरबार में अपनी जीत का डंका बजाया और भरे दरबार में जनाबे ज़ैनब हाकिमे वक़्त क मुखातब कर के कहा कि ऐ यज़ीद तेरी इतनी औक़ात कहाँ कि अली (अ) की बेटी तुझ से बात करे लेकिन इतना तूझे बता देती हूँ तू जितनी कोशिश और मक्कारियाँ कर सकता है कर ले, लेकिन याद रख तो हरगिज़ हमारी महबुबियत को लोगों के दिलों से नही मिटा सकता। जनाबे ज़ैनब (स) की ज़बाने मुबारक से निकले हुए यह कलेमात इस बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि हुसैन (अ) और अहले बैत (अ) के नाम की महबुबियत को ख़ुदा ने लोगों के दिलों में वदीयत कर रखा है और जब तक सफ़ह ए हस्ती पर लोग रहेगें ज़िक्रे हुसैन और नामे हुसैन (अ) को ज़िन्दा रखेगें।

user comment
 

latest article

  मैराजे पैग़म्बर
  इमाम अली अ.स. एकता के महान प्रतीक
  अब्बासी हुकूमत का, इमाम हसन असकरी अ.स. से ...
  तरकीबे नमाज़
  मैराजे पैग़म्बर
  तरकीबे नमाज़
  इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की अहादीस
  हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इरशाद
  इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की जीवनशैली
  शरमिन्दगी की रिवायत