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Monday 11th of December 2017
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आज़ाद तीनत सिपाही जनाबे हुर्र बिन यज़ीदे रियाही



हुर्र बिन यज़ीद बिन नाजिया बिन क़अनब बिन अत्ताब बिन हारिस बिन उमर बिन हम्माम बिन बनू रियाह बिन यरबूअ बिन हंज़ला, तमीम नामक क़बीले की एक शाख़ा से संबंधित हैं (1) इसीलिये उनको रियाही, यरबूई, हंज़ली और तमीमी कहा जाता है (2) हुर्र का ख़ानदान जाहेलीयत और इस्लाम दोनों युगों में बहुत सम्मानित रहा है (3)


हुर्र आशूरा से पहले


हुर्र कूफ़ा के एक प्रसिद्ध योद्धा थे (4)


वह इब्ने ज़ियाद की सेना के एक विश्वस्त कमांडर और एक हज़ार सिपाहियों से सेनापति थे और आप सैन्य अनुशासन और आदेशों का पूर्णरूप से पालन करने वालों में से थे (5) हुर्र को सियासत से कोई दिलचस्पी नहीं थी इसीलिये किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ में 60 हिजरी के तनावपूर्ण माहौल में भी हुर्र के किसी भी राजनीतिक क़दम उठाए जाने के बारे में कुछ नहीं लिखा है, लेकिन बलअमी ने अपनी संदिग्ध रिवायत में आपको उन शियो में से लिखा है जिन्होंने अपने अक़ीदे को छिपा रखा था। (6)


कूफ़े की सेना का सेनापति होना


उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद को जब इमाम हुसैन (अ) के कूफ़ा की तरफ़ आने की सूचना मिली तो उसने हुर्र को उनके क़बीले के बड़े लोगों के साथ बुलाया और एक हज़ार की सेना का सेनापति बना कर इमाम हुसैन (अ) से मुक़ाबले के लिये भेजा


आवाज़ जो हुर्र ने सुनी


हुर्र से रिवायत की गई है कि जब मैं इब्ने ज़ियाद के महल से बाहर निकला और हुसैन (अ) की तरफ़ चला तो मैंने अपने पीछे से तीन बार आवाज़ सुनी जो कह रही थीः


“ए हुर्र तुमको स्वर्ग की शुभसूचना मुबारक हो” वह कहते हैं कि मैंने अपने पीछे देखा तो किसी को न पाया, अपने आप से कहा “ईश्वर की सौगंध यह बशारत नहीं है, यह कैसे बशारत हो सकती है जब कि मैं हुसैन (अ) से लड़ने जा रहा हूँ”


यह बात हुर्र के दिमाग़ में रह गई और जब आप हुसैनी सेना में पहुँचे तो आपने उनसे यह बात कही इमाम हुसैन (अ) ने फ़रमायाः


तुम वास्तव में नेकी और सौभाग्य के रास्ते पर आ गए हो। (7,8)


इमाम हुसैन से आमना सामना


ज़ीहुस्म पर इमाम हुसैन (अ) और हुर्र की सेना का आमना सामना हुआ (9) ऐतिहासिक स्रोत यह कहते हैं कि हुर्र को इमाम हुसैन (अ) से युद्ध करने के लिये नहीं बल्कि केवल हुसैन (अ) को इब्ने ज़ियाद तक लाने के लिये भेजा गया था और यही कारण था कि वह अपनी सेना के साथ इमाम हुसैन (अ) के ठहरने के स्थान पर खड़ा हो गया (10)


अबू मख़निफ़ ने हुर्र की सेना की इमाम हुसैन (अ) से मुलाक़ात के बारे में दो असदी लोगो की ज़बानी जो कि जो इमाम के साथ इस यात्रा में थे इस प्रकार बयान करते हैं


जब हुसैनी काफ़िल अपने स्थान से चला तो दिन में दूरे से शत्रु सेना का अग्रदल दिखाई दिया, इमाम ने अपने साथियों से फ़रमायाः


“क्या इस क्षेत्र में कोई पनाहगाह है जिसमें हम पनाह ले सकें और उसको अपने पीछें रखें और इन लोगों से एक तरफ़ से मुक़ाबला करें” कहा हां बाईं तरफ़ एक जगह है जिसका नाम ज़ू हुस्म है।


इमाम ज़ु हुस्म की तरफ़ चल पड़े, शत्रु सेना भी उसी तरफ़ चली जा रही थी लेकिन इमाम अपने साथियों के साथ पहले उस स्थान पर पहुँच गए, इमाम ने ख़ैमे लगाए जाने का आदेश दिया।


हुर्र बिन यज़ीद रियाही और उसकी सेना ज़ोहर के समय वहां पहुँची और वह लोग प्यास की हालत में इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों के सामने पहुँचे, बावजूद इसके कि वह शत्रु सेना थी लेकिन इमाम हुसैन (अ) ने उनके साथ अच्छा बर्ताव किया और इमाम ने अपने साथियों को आदेश दिया कि हुर्र की सेना और उनके घोड़ों को पानी पिलाया जाए, और जब हुर्र ने कहा कि वह अपने साथियों के साथ इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ना चाहता है तो आपने स्वीकार कर लिया।


हुर्र ने इमाम को अपने आने का कारण बताया। इमाम ने फ़रमायाः


कूफ़े के लोगों ने उनको कूफ़ा बुलाया है और उनकी तरफ़ से पत्राचार के बारे में बताया और कहा कि अगर कूफ़े वाले अपने इरादे से पलट गए हैं तो वह भी वापस चले जाएंगे।


हुर्र ने इस प्रकार के पत्राचार के अनभिज्ञ्ता प्रकट की और कहा वह और उसके साथी पत्र लिखने वालों में से नहीं है और उसको आदेश दिया गया है कि इमाम को कूफ़े में इब्ने ज़ियाद के समक्ष प्रस्तुत करे।


जब इमाम हुसैन (अ) अपने साथियों के साथ चलने लगे तो हुर्र ने इमाम को कूफ़े की तरफ़ जाने या फिर वापस हिजाज़ जाने से रोक दिया, हुर ने सुझाव दिया कि इमाम कूफ़ा या मदीना के अतिरिक्त किसी और रास्ते का चुनाव कर लें ताकि वह इब्ने ज़ियाद से दूसरे आदेश को प्राप्त कर सके।


हुर्र ने इमाम से कहाः “मुझे आपसे युद्ध का आदेश नही दिया गया है लेकिन मुझे आदेश दिया गया है कि मैं आपका पीछा न छोड़ूँ यहां तक कि आपको कूफ़ा पहुँचा दूँ, अब अगर आप मेरे साथ आने से इंकार करते हैं तो कोई ऐसा रास्ता चुने जो न आपको कूफ़ा पहुँचाए और न ही मदीने, ताकि मैं एक पत्र उबैदुल्लाह को लिखूँ और अगर आप भी चाहें तो यज़ीद को पत्र लिखें, ताकि यह मामला अच्छे से और बिना युद्ध के समाप्त हो जाए और मेरे लिये यह इससे कहीं अच्छा है कि आपसे युद्ध करूँ।”


उसके बाद इमाम हुसैन (अ) और उनके साथी ओज़ीब और क़ादेसिया की तरफ़ चल पड़े और हुर्र भी आपके साथ था। (11)


ओज़ीब में कूफ़े से इमाम के चार साथी इमाम के पास पहुँचे हुर्र ने उनको गिरफ़्तार करना चाहा लेकिन इमाम ने रोक दिया उन्होंने कूफ़े के बिगड़ते हालात और इमाम के दूत क़ैस बिन मुसह्हर सैदावी की शहादत की सूचना दी और युद्ध के लिये एक बड़ी सेना के आने की ख़बर दी। (12)


हुर्र ने पत्र के बारे में हुसैन (अ) को बताया तो आपने कहा कि हमें नैनवा या ग़ाज़ेरिया में उतर जाने दो।


दो मोहर्रम को इमाम हुसैन (अ) और हुर्र के बीच की सदभावना समाप्त हो गई, जब यह दोनों नैनवा पहुँचे तो हुर्र के पास इब्ने ज़ियाद की तरफ़ से एक पत्र पहुँचा जिसमें लिखा था कि हुसैन (अ) के साथ सख़्ती से पेश आओ और उनको किसी बियाबन और बंजर स्थान पर रोक दो। (13)


हुर्र ने इब्ने ज़ियाद की तरफ़ से लगाए गए जासूसों के कारण मजबूरन इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों को नैनवा, ग़ाज़ेरिया या उसके आसपास ठहरने से रोक दिया और इमाम विवश होकर करबला में उतरे।


ज़ोहैर ने इमाम से कहाः ख़ुदा की क़सम मैं देख रहा हूँ कि इसके बाद से हमारे लिये सख़्तियां बढ़ जाएंगी, हे पैग़म्बर के बेटे इस समय इस गुट (हुर्र और उसके साथी) से युद्ध करना हमारे लिये उससे कहीं आसान है जो इनके बाद आ रहे हैं, मुझे मेरी जान की क़सम है कि इनके बाद वह लोग आएंगे जिसने लड़ना आसान न होगा।


इमाम ने फ़रमायाः ज़ोहैर सही कह रहे हो लेकिन मैं युद्ध आरम्भ नहीं करूँगा।


इमाम हुर्र के साथ चलते रहे यहां तक कि करबला पहुँच गए, हुर्र और उसके साथियों ने इमाम को और आगे जाने से रोक दिया, हुर्र ने कहां यहीं रुक जाइये कि फ़ुरात पास में ही है। हुर्र ने एक पत्र इब्ने ज़ियाद को लिखा और उसको इमाम के करबला में ठहरने की सूचना दी।


हुर्र की तौबा


हुर्र अगरचे इमाम के साथ सख़्ती से पेश आया लेकिन उसका व्यहार इमाम के साथ सम्मान जनक था यहां तक कि उसने एक बार हज़रत फ़ातेमा (स) के विशेष सम्मान की भी बात कही। (14)


आशूरा को उमरे सअद ने अपनी सेना को तैयार किया और सेना की हर टुकड़ी का कमांडर नियुक्त किया, उसने हुर्र को बनी तमीम और बनी हमदान का सेनापति नियुक्त किया और इस प्रकार उमरे सअद की सेना हुसैन (अ) की साथ युद्ध के लिये तैयार हो गई।


हुर्र ने जब कूफ़ियों को इमाम हुसैन (अ) के साथ युद्ध करने के लिये तैयार देखा तो उमरे सअद के पास गया और कहाः क्या तुम इस मर्द (इमाम हुसैन) से युद्ध करना चाहते हो? उसने कहाः हां ख़ुदा की क़सम ऐसी जंग करूँगा कि सर और हाथ हवा में उड़ते दिखाई देंगे।


हुर्र ने कहाः क्या तुमको उनका सुझाव पसंद नहीं आया? इब्ने सअद ने कहाः अगर चीज़ें मेरे हाथ में होती तो स्वीकार कर लेता लेकिन तेरा अमीर (उबैदुल्लाह) नहीं मानता है।


हुर्र उमरे सअद से अलग हो गए और सेना के एक कोने में खड़े हो गए और धीरे धीरे इमाम की सेना के क़रीब बढ़ने लगे। मोहाजिर बिन ओवैस (जो सअद की सेना में था) ने हुर्र से कहाः क्या हमला करना चाहते हो? हुर्र ने कांपते हुए उत्तर दियाः नहीं, मोहाजिर ने कहाः ख़ुदा की क़सम मैंने तुमको किसी भी युद्ध में इस प्रकार नहीं देखा अगर कोई मुझसे पूछता कूफ़ा का सबसे बहादुर व्यक्ति कौन है तो मैं तेरा नाम लेता, तुम इस प्रकार क्यों कांप रहे हो?


हुर्र ने कहाः निसंदेह मैं स्वंय को स्वर्ग और नर्क के बीच पाता हूँ ईश्वर की सौगंध अगर टुकड़े टुकड़े कर दिया जाऊँ और मुझे आग में जला दें तो मैं स्वर्ग के अतिरिक्त किसी दूसरी चीज़ को स्वीकार नहीं करूँगा। हुर्र ने यह कहा और अपने घोड़े को एड़ लगाई और हुसैनी ख़ैमों की तरफ़ चल पड़ा।


उसने इमाम से क्षमा मांगी, इमाम ने उसको क्षमा किया और फ़रमाया तुम दुनिया और आख़ेरत में आज़ाद (हुर्र) हो। (15)


शहादत


हज़रत हुर्र की तौबा और उनकी शहादत में बहुत अधिक फ़ासेला नहीं था, एक रिवायत के अनुसार हुर्र ने इमाम हुसैन (अ) से कहा कि चूँकि उसी ने सबसे पहले इमाम का रास्ता रोका था इसलिये अनुमति जीजिए की वही सबसे पहले शत्रु की सेना से लड़ने जाए और शहादत पेश करे। (16)


हुर्र इमाम हुसैन (अ) की सेना में शामिल होने के तुरन्त बाद ही युद्ध के लिये चले गए और शत्रु के साथ लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुती दे दी। (17)


हज़रत हुर्र बहुत ही वीरता से लड़े और अगरचे उसका घोड़ा घायल हो चुका था और उसके कानों एवं माथे से ख़ून बह रहा था लगातार सिंहनाद पढ़ रहे ते और युद्ध करते जा रहे थे यहां तक की आपने शत्रु सेना के चालीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया


इब्ने सअद की पैदल सेना ने एक साथ मिलकर उनपर आक्रमण किया और उनको शहीद कर दिया कहा जाता है कि आपकी शहादत में दो लोग शरीक थे एक अय्यूब बिन मिसरह और दूसरा कूफ़े का एक व्यक्ति।


इमाम के साथी उनकी लाश को लाए इमाम ने उनके सरहाने पर बैठकर हुर्र के चेहरे से ख़ून को साफ़ किया और फ़रमायाः तुम आज़ाद हो जैसे कि तुम्हारी माँ ने तुम्हारा नाम रखा है, तुम दुनिया में भी आज़ाद हो और आख़ेरत में भी।


अंतिम संस्कार


सैय्यद मोहसिन अमीन के अनुसार (18) जब करबला के शहीदों को बनी असद के लोदों द्वारा दफ़्न किया जाने लगा तो हुर्र के क़बीले के एक गुट ने हुर्र को करबला के दूसरे शहीदों के साथ दफ़्न न होने दिया और उनको दूसरे शहीदों से दूर एक स्थान पर जिसका पहले नाम नोवावीस था दफ़्न किया (19) और यही कारण है कि हुर्र की क़ब्र इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र से एक मील की दूरी पर स्थित है, इस समय हुर्र का मक़बरा करबला से सात किलोमीटर की दूरी पर है।


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(1)इब्ने कल्बी जिल्द 1, पेज 213, 216

(2)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 472,476,489, दैनवरी पेज 249, तबरी जिल्द 5, पेज 422

(3)देखें समावी पेज 203

(4)तबरी जिल्द 5, पेज 392, 427, इब्ने कसीर जिल्द 8, पेज 195

(5)बलाज़री जिल्द 2, पेज 473, दैनवरी पेज 252, तबरी जिल्द 5, पेज 402-403।

(6)जिल्द 4, पेज 704।

(7.8)मसीरुल अहज़ान, पेज 44.

(9)नफ़सुल महमूम, पेज 231.

(10)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 472, तबरी जिल्द 5, पेज 400, मुफ़ीद जिल्द 2, पेज 69, अख़तब ख़्वारज़्म, जिल्द 1, पेज 327, 330.

(11)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 473, दैनवरी पेज 249-250, मुफ़ीद जिल्द 2, पेज 80, अख़तब ख़्वारज़्म जिल्द 1, पेज 332.

(12)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 473-474, तबरी जिल्द 5, पेज 403-406, अख़तब ख़्वारज़्म जिल्द 1, पेज 331-333

(13)दैनवरी, पेज 251, तबरी जिल्द 5, पेज 408-409, मुफ़ीद जिल्द 2, पेज 81-84, अख़तब ख़्वारज़्म जिल्द 1, पेज 334

(14)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 475-476, 479, तबरी जिल्द 5, पेज 392, 422, 427-428, मुफ़ीद जिल्द 2, पेज 100-101, अख़तब ख़्वारज़, जिल्द 2, पेज 12-13 इमाम के इस कथन को हुर्र के युद्ध के बाद का समझते हैं

(15)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 475-476, 479, तबरी जिल्द 5, पेज 392, 422, 427-428, मुफ़ीद जिल्द 2, पेज 100-101, अख़तब ख़्वारज़, जिल्द 2, पेज 12-13 इमाम के इस कथन को हुर्र के युद्ध के बाद का समझते हैं

(16)इब्ने अअसम कूफ़ी, जिल्द 5, पेज 101, अख़तब ख़्वारज़म, जिल्द 2, पेज 13

(17)बिलाज़री जिल्द 2, पेज 476, 489, 494, 517, तबरी जिल्द 5, पेज 428-429, 434-435, 437, 440-441, मुफ़ीद, जिल्द 2, पेज 102-104

(18)जिल्द 1, पेज 613

(19)इब्ने कल्बी, जमहरतुन नसब, जिल्द 1, पेज 216

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