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Monday 21st of May 2018

शहीद हुजजी की बीवी ने की पर्दे की गुज़ारिश।

सलाम और दुरूद हो शहीदों के सरदार इमाम हुसैन अ.स. पर इमाम ज़माना अ.स. और आयतुल्लाह ख़ामेनई की ख़िदमत में मुबारकबाद आग़ा मोहसिन पहली बार 2 साल पहले अपनी मर्ज़ी से सीरिया जाना चाहते थे, फिर जाने वालों की लिस्ट में उनका नाम भी आ गया। मैं उन दिनों प्रेगनेंट थी, आग़ा मोहसिन ने मुझ से कहा अभी इस बारे में किसी को मत बताना, वरना मुझे शायद जाने न दिया जाए। कयोंकि मैं ख़ुद उनका पूरी तरह से हौसला बढ़ा रही थी इसलिए मैंने भी इस बारे में किसी को नहीं बताया। क़रीब 2 हफ़्ते में उनके इस सफ़र का काम पूरा हुआ, इन 2 हफ़्तों में आग़ा मोहसिन हर दिन रोज़ा रखते थे, और हर दिन किसी मजलिस या मज़हबी प्रोग्राम मे शिरकत ज़रूर करते। जिस दिन आग़ा मोहसिन को जाना था वह अपने वालेदैन से ख़ुदा हाफ़िज़ी के लिए गए, उन्होंने नियत की थी कि अगर उनकी इस सफ़र पर जाने की दुआ पूरी हो गई तो वह अपने वालेदैन के पैर चूम कर जाएंगे, उन्होंने अपने वालेदैन के पैर चूमे और बताया कि वह सीरिया के सफ़र पर जा रहे हैं। आग़ा मोहसिन के वालेदैन ने भी पूरे धैर्य और हौसले के साथ यह कह कर विदा किया कि ख़ैरियत से जाओ और साथ ख़ैरियत के कामयाब हो कर वापस आओ और अपनी जान इमाम ज़माना अ.स. पर फ़िदा करना। आग़ा मोहसिन ने ख़ुद ख़्वाब में देखा था कि आठवीं डिवीज़न के शहीद उनको उनकी शहादत की ख़बर दे रहे थे, और कह रहे थे कि धैर्य रखो शहादत का समय आने दो। मैं भी उनसे यही कहती थी कि शहादत के लिए इतनी बेताबी मत करें, मैंने ख़ुद अपने हाथों से उनके सफ़र का बैग तैय्यार किया, उनके कपड़ों पर जो बैच लगा था उस पर मैंने ख़ादिमुल महदी (इमाम महदी अ.स. का नौकर) लिखवाया, फिर उन्होंने कहा इसे मेरे कपड़े पर सिल दो, पहली बार जब वह सीरिया से वापस लौटे थे तो जो ड्रेस उनको वहां दी गई थी वह उन्हीं के पास थी, उन्होंने कहा यह अभी नई ड्रेस है बैतुल माल से ख़रीदी हुई है किसी के काम आ जाएगी तुम यह बैच मेरे अपने कपड़ों पर सिल दो, मैंने वह बैच आग़ा मोहसिन की ड्रेस पर सिल दिया। मैंने जब शहीद की तस्वीर देखी तो वह बैच उनकी ड्रेस पर लगे हुए थे, बहुत से लोगों ने कहा कि यह फोटोशॉप द्वारा लगाए गए हैं क्योंकि इस तरह के बैच वहां नहीं दिए जाते, फिर मैंने ही सब को बताया कि वह बैच मैंने ख़ुद अपने हाथों से लगाए थे। शहीद की गिरफ़्तारी और फिर उनकी शहादत की ख़बर सबसे पहले मैंने इंटरनेट पर देखी थी, फिर मैंने अपने और शहीद के घर वालों को ख़बर दी, हम लोगों ने 3 बजे रात को यह ख़बर देखी कि शहीद की तस्वीर के साथ लिखा हुआ था कि ऐ बे सर शहीद, शहादत मुबारक हो। मैं तस्वीर देख कर शॉक्ड हो गई थी, मुझे उम्मीद थी कि वह ज़िन्दा हैं, फिर हम ने टी वी चलाया, क़रीब 10 मिनट बाद हर चैनल पर यही ख़बर थी कि बे सर शहीद मोहसिन की शहादत मुबारक हो। शहीद मोहसिन का कहना था कि शहादत का दस्तरख़ान एक बार फिर बिछा दिया गया है, और इस दस्तरख़ान से अपना रिज़्क़ हासिल करना चाहता हूं। मैंने लिखा था कि आग़ा मोहसिन चले गए कि इमाम ख़ामेनई को अकेलापन महसूस न हो, वह इमाम ख़ामेनई से ख़ास लगाव रखते थे। मैं इस मौक़े पर यह पैग़ाम देना चाहती हूं कि आग़ा मोहसिन जिस राह पर गए उसे खुला रखें वह बंद नहीं होना चाहिए, उन्होंने अपना सर दे दिया ताकि हमारे सर बे पर्दा न रहें, मैं सभी बहनों बेटियों से गुज़ारिश करती हूं कि मोहसिन पर्दे के मामले में बहुत सख़्त थे, मेरी आप सभी से विनम्र गुज़ारिश है कि शहीद की ख़ातिर, शहीद की बेवा की ख़ातिर और शहीद की मां और बहनों की ख़ातिर अपने पर्दे का ख़ास ध्यान रखें, या कम से कम हमारे सामने पर्दे का ज़रूर ख़्याल रखें, हमारे दुश्मन इसी ताक में हैं कि हमारी कमज़ोरी पर वह ख़ुशी मना सकें। मैं नहीं चाहती कि दुश्मन मुझे रोता हुआ देखे, मैंने अपनी आंख से गिरने वाले आंसुओं की दिशा मोड़ दी है, मेरे आंसू शहज़ादी ज़ैनब स.अ. के लिए बह रहे हैं, मेरे आंसू शहज़ादी ज़ैनब स.अ. के क़ैद होने को याद कर के बह रहे हैं। मैंने तो एक शहीद दिया जिसके सर को उसके बदन से जुदा कर दिया गया, मगर हज़रत ज़ैनब स.अ. ने 72 दाग़ देखे, मुझे दिलासा और तसल्ली देने वालों की भीड़ है लेकिन शहज़ादी ज़ैनब के पास कौन था? मुझ से मिलने जो भी आ रहा है मैं हर एक से कह रही हूं कि मोहसिन के लिए आंसू न बहाएं, बल्कि शहज़ादी ज़ैनब स.अ. पर आंसू बहाएं। मुझे यक़ीन है जब तक शहीद मोहसिन की लाश नहीं मिलती हर दिन हज़रत ज़हरा स.अ. की शफ़क़त और मोहब्बत उनको मिलती रहेगी। मेरी दुआ यही है कि मैं अपने बेटे की तरबियत ऐसी कर सकूं कि वह भी शहादत जैसा महान दर्जा पा सके इंशा अल्लाह, और मेरी और मेरे बेटे की ज़िंदगी शहादत पर ख़त्म हो। मैंने अगर शहीद की लाश को मांगा है तो वह उनके बूढ़े मां बाप की ख़ातिर कि उनको किसी तरह सब्र आ जाए। आग़ा मोहसिन जो कुछ चाहते थे मैं भी वही चाहती थी, वह शहादत के लिए बेचैन थे, मैं उनकी बेचैनी को देख कर परेशान रहा करती थी। आग़ा मोहसिन की शहादत की ख़बर सुन कर दिल को आराम सा मिल गया कि वह जिस मंज़िल पर पहुंचना चाहते थे वहां पहुंच गए। जो भी औरतें अपने मर्दों को शहादत की राह में भेजना चाहती हैं उनसे मेरा यही कहना है कि इस राह में केवल ख़ूबसूरती ही ख़ूबसूरती है, और यही हज़रत ज़ैनब स.अ. ने भी फ़रमाया था कि मैंने इस राह में केवल ख़ूबसूरती ही देखी है। एक और बात कहना चाहती हूं कि बहुत से लोग आग़ा मोहसिन से कहते थे कि इतना मत कहा करो कि शाम जा कर शहीद होना चाहता हूं, अभी जाने की ज़रूरत नहीं है, इमाम ज़माना अ.स. के लिए शहीद होना। लेकिन आग़ा मोहसिन हमेशा यही जवाब देते कि मैं एक बार शहादत पर राज़ी होने वाला नहीं हूं, मैं अभी जा कर शहज़ादी ज़ैनब स.अ. पर अपनी जान फ़िदा करूंगा, और फिर जब इमाम ज़माना अ.स. ज़ुहूर करेंगे तो उन पर भी अपनी जान क़ुर्बान करूंगा, मैं एक बार शहीद होने पर राज़ी नहीं रहूंगा।

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