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Monday 20th of November 2017
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पवित्र क़ुरआन और धर्मांधियों का क्रोध



पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम (स) का अमर चमत्कार और कभी समाप्त न होने वाले उच्च ज्ञान तथा तत्वदर्शिता का भण्डार है। यह ईश्वरीय पुस्तक उचित तथा अनुचित विचारों और व्यवहारों का मानदंड है। इस ईश्वरीय पुस्तक में विषय वस्तु की दृष्टि से समृद्धता, सुन्दर शब्दों का चयन, वाकपटुता तथा महान व उत्तम अर्थों के कारण यह बहुत ही आकर्षक और मनमोहक है। इस प्रकार पवित्र क़ुरआन जहां, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के काल के मुसलमानों के लिए आकर्षक रहा वहीं यह नई एवं वर्तमान पीढ़ियों के लिए भी ज्ञान और तत्वदर्शिता का केन्द्र है।

पवित्र क़ुरआन ने एक ओर तो विद्वानों और बुद्धिजीवियों के ध्यान को अपनी ओर आकृष्टि किया तो दूसरी ओर ईमान और प्रेम से परिपूर्ण हृदयों को भी मंत्रमुग्ध किया। यह ग्रंथ राजनैतिक मामलों और समाज के दिशा निर्देशन में प्रेरणादायक तथा मार्गदर्शक है और जातियों के इतिहास एवं सभ्यताओं के उतार-चढ़ाव और उनके जीवन के बारे में भी शिक्षाप्रद और सीख देने वाला है। पवित्र क़ुरआन जहां एक ओर मार्गदर्शन, उपदेशों और तत्वदर्शिता की पुस्तक है वहीं दूसरी ओर राजनीति, ज्ञान, सम्मान और दूरदर्शिता की भी किताब है।

पवित्र क़ुरआन की विशेषता यह है कि वह अपने आकर्षण और अपनी साख के कारण आज भी बिना किसी फेर-बदल और हेर-फेर के उसी रूप में मौजूद है जिस रूप में उसे फ़रिश्ते के माध्यम से भेजा गया था। यह महा चमत्कार जीवन के नियमों का एसा संकलन है जिसे मानव जाति के लिए अवतरित किया गया है। क़ुरआन की मन में उतर जाने वाली आयतें इस बात को स्पष्ट करती हैं कि इसके नियम उस सर्वोच्च शक्ति की ओर से भेजे गए हैं जो सृष्टि के प्रत्येक आयाम से पूर्णरूप से अवगत है और उसपर प्रभुत्व रखती है और उसके नियम मानव द्वारा बनाए गए नियमों की भांति और प्राकृति के परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होते। तत्वदर्शी ईश्वर, जिसने तौरेत के पश्चात बाइबिल को उतारा पवित्र क़ुरआन को उनका पूरक और पुष्टिकर्ता बनाया। इस संबन्ध में सूरए अनआम की आयत संख्या ९२ में ईश्वर कहता है कि यह विभूतियों से भरी किताब हमने तुम्हारे लिए भेजी है और जो कुछ (ईश्वरीय ग्रंथों में) इससे पहले आया था, यह उसकी पुष्टि करती है।


पवित्र क़ुरआन ने अपने उतरने के समय से ही पवित्र और सादे हृदयों को अपनी जीवनदायी आयतों की ओर आकृष्ट किया और अपने सार्थक नियमों से पतन का शिकार असभ्य और पाश्विक प्रवृत्ति वाले समाज को सभ्य बनाते हुए उन्हें प्रशिक्षित समाज में परिवर्तित कर दिया। इसी बीच पवित्र क़ुरआन के दिन प्रतिदिन बढ़ते प्रभाव को रोकने के उद्देश्य से कुछ अवसरवादी शत्रुओं ने कभी तो क़ुरआन को कहानी-क़िस्सा बताते हुए दावा किया कि वे भी उस जैसी बात कर सकते हैं और कभी उसे एक एसा कविता संग्रह बताया जिसकी रचना पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने स्वयं की है। एक ओर तो यह बात निश्चित है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र क़ुरआन के उतरने से पूर्व लिखने-पढ़ने के लिए किसी से शिक्षा नहीं ली दूसरी ओर क़ुरआन ने अपने चमत्कार को सिद्ध करने के लिए विरोधियों को चुनौती दी है कि यदि उनमें साहस है तो वे उस जैसा कथन ले आएं। इस कार्य के लिए वे ईश्वर के अतिरिक्त जिससे भी चाहें सहायता ले सकते हैं। इन विरोधियों से क़ुरआन कहता है कि यदि वे सक्षम हैं तो दस एसे ही सूरे ले आएं और अगर यह न कर सकें तो क़ुरआन जैसा केवल एक सूरा ही ले आएं। पवित्र क़ुरआन के सूरए बक़रा की आयत संख्या २३ में कहा गया है कि यदि तुम उस चीज़ के बारे में संदेह करते हो जो हमने अपने बंदे या दास पर उतारी है तो तुम उस जैसा एक सूरा लाओ और (इस काम के लिए) ईश्वर के अतिरिक्त जो तुम्हारी सहायता करने वाले हों उनको भी बुला लो यदि तुम सच्चे हो। १४ शताब्दियां व्यतीत हो जाने के पश्चात आजतक कोई भी अरबी भाषा में एसी रचना नहीं ला सका जो सुन्दरता, विषय वस्तु की समृद्धता और वाकपटुता की दृष्टि से क़ुरआन जैसी हो।

पवित्र क़ुरआन ज्ञान को अपने बारे में निर्णय का आधार बताता है और सबकों उसमें चिंतन का निमंत्रण देता है। सभी विद्धान और ज्ञानी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पवित्र क़ुरआन, ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से एक महान चमत्कार है। जर्मन कवि और विद्धान गोएटे कहते हैं कि हमने ज्ञान के मार्ग पर जितना क़दम बढ़ाया और ग़लत भेदभाव को जितना भी दूर किया है पवित्र क़ुरआन और इस्लाम की पवित्र शिक्षाओं की महानता ने हमारे भीतर एक विशेष प्रकार की आश्चर्चय की भावना उत्पन्न की। यह अनउदाहरणीय पुस्तक निकट भविष्य में पूरे संसार को अपनी ओर आकृष्ट करेगी और ज्ञान-विज्ञान पर बहुत गहरे प्रभाव डालेगी और इसके परिणाम स्वरूप पूरे संसार का केन्द्र बन जाएगी।

जागृत अंतरात्माओं पर पवित्र क़ुरआन के पड़ने वाले प्रकाश के बावजूद सदैव ही एसे लोग पाए जाते हैं जो इस मार्गदर्शक प्रकाश के शत्रु रहे हैं और अपने विचार में वे इसके प्रकाश को बुझाना चाहते हैं। किंतु इतिहास, सदैव ही एसे शत्रुओं के असफल और अक्षम होने का साक्षी रहा है जो क़ुरआन के विरुद्ध विभिन्न प्रकार के नाटक करके उसके मुक़ाबले पर आए हैं और उसका अनादर करना चाहते हैं।


पवित्र क़ुरआन से मुक़ाबले के नवीनत उदाहरण में अमरीकी जातिवादी पादरी का नाम लिया जा सकता है। टेरी जोन्स नामक इस अमरीकी पादरी ने कुछ महीनों पूर्व घोषणा की थी कि ग्यारह सितंबर की घटना की वर्षगांठ पर वह पवित्र क़ुरआन की कुछ प्रतियां जलाएगा। पूरे विश्व में मुसलमानों के व्यापक प्रतिरोध के कारण टेरी जोन्स अपने कार्यक्रम के क्रियान्वयन से पीछे हटने पर विवश हुआ। इसके बावजूद यह दुस्साहसी अमरीकी पादरी पवित्र क़ुरआन के अनादर पर डटा रहा और उसने पवित्र क़ुरआन का अध्धयन किये बिना ही इस वर्ष २० मार्च को इस पवित्र धर्मग्रंथ का अनादर किया। क्षमा न किये जाने योग्य और दुस्साहसपूर्ण कार्यवाही करते हुए टेरी जोन्स ने पवित्र क़ुरआन की प्रति को जलाया। अमरीकी पादरी की यह द्वेषपूर्ण दुस्साहसी कार्यवाही, उस व्यवहार एवं अभियान का एक भाग है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान पश्चिम में सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत ईश्वरीय धर्मों और उनकी आस्था के विरूद्ध चलया जा रहा है। हालांकि पश्चिम में इस्लाम से शत्रुता कोई नई बात नहीं है जो वर्तमान समय में वहां पर जातीय एवं धार्मिक भेदभाव के रूप में दिखाई दे रही है।

पिछले वर्ष विक्टोरिया क्लार्क सहित कुछ अमरीकी समीक्षकों और टीकाकारों ने टेरी जोन्स की कार्यवाही का कारण लोकप्रियता और धन बटोरना बताया था। क्लार्क ने अमरीका के कुछ भ्रष्ट पंथों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि क़ुरआन को जलाकर टेरी जोन्स, अपनी धार्मिक दुकान चमका रहा है और इस कार्यवाही द्वारा अधिक से अधिक ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहता था किंतु बहुत से टीकाकार, पवित्र क़ुरआन को जलाने की कटु घटना के पश्चात टेरी जोन्स द्वारा पवित्र ग्रंथ के अनादर को, इस ईश्वरीय पुस्तक के सशक्त तर्कों के मुक़ाबले में इस्लाम के शत्रुओं की अक्षमता बता रहे हैं, जिसकी सार्थक तथा हृदय में उतर जाने वाली आयतों ने विश्ववासियों के विचारों को प्रभावित किया है और जो पूरे संसार में बड़ी तीव्र गति तथा आश्चर्य जनक ढंग से इस्लाम के विस्तार का कारण बनी हैं।

कुछ टीकाकारों का यह मानना है कि योरोप व अमरीका में इस्लाम की ओर बढ़ते झुकाव के अतरिक्त मुस्लिम जगत में जागरूकता और इस्लामी मूल्यों की ओर वापसी की लहर भी वह विषय है जिसका कारण ज़ायोनी-अमरीकी विचारधारा वाले लोग मुसलमानों की आस्था को ठेस पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं। अपने इस कार्य से पश्चिम, ग़ैर मुस्लिम समाजों में बढ़ती इस्लाम के विस्तार की प्रक्रिया और इस्लामी जगत में इस्लाम के मूल नियमों की ओर वापसी जैसी दो लहरों से विश्व जनमत का ध्यान हटाना चाहता है।

बहुत से समाचारिक स्रोत, अमरीका और योरोप में तीव्र गति से इस्लाम की ओर झुकाव की बात को स्वीकार करते हैं। इन्डिपेंडेंट समाचारपत्र की रिपोर्ट के अनुसार इस्लाम विरोधी व्यापक प्रचारों के बावजूद हालिया वर्षों के दौरान ब्रिटेन और अमरीका के श्वेत वर्ण के लोगों के बीच इस्लाम की ओर झुकाव बहुत तेज़ी से बढ़ा है। दस वर्ष पूर्व की जनगणना के अनुसार ब्रिटेन में श्वेत वर्ण के मुसलमानों की संख्या १४ हज़ार थी जो वर्तमान समय में एक लाख बताई जा रही है। न्यूयार्क टाइम्स ने भी कुछ दिनों पूर्व, अमरीका में निर्बाध रूप से इस्लाम के विस्तार के संबन्ध में अपनी रिपोर्ट में प्रतिवर्ष मुसलमानों की बढ़ती संख्या दो लाख बताई थी। वर्तमान समय में ब्रिटेन में मुसलमानों की संख्या लगभग तीस लाख है जबकि अमरीका में मुसलमानों की संख्या लगभग अस्सी लाख बताई जा रही है।

शत्रु इस्लाम की पवित्रता और सुन्दरता को विश्ववासियों से छिपाए रखने के प्रयास कर रहे हैं। यदि टेरी जोन्स ने पवित्र क़ुरआन का अध्ययन किया होता तो उसे पता चलता कि इस्लाम और वास्तविक इसाई धर्म में मूल नियमों में वास्तव में समानता पाई जाती है क्योंकि दोनों ही एकईश्वर की ओर से मानव जाति के लिए भेजे गए हैं।

कनाडा के एक विद्धान डाक्टर गैरी मिलर लंबे समय तक इसाई धर्म के अनुयाई रहे। उनकी गणना इसाई धर्म के प्रचारकों में होती है। पश्चिमी देशों में इस्लाम की ओर बढ़ते झुकाव के दृष्टिगत उन्होंने पवित्र क़ुरआन के अध्ययन का निर्णय लिया ताकि वे उनके मतानुसार उसकी ग़लतियों का पता लगाकर उसके ग़लत होने को सिद्ध कर सकें। वे कहते हैं कि मैंने क़ुरआन में ग़लतियां ढूंढने के उद्देश्य से इसका अध्धयन आरंभ किया। मैं जितना भी क़ुरआन पढ़ता जाता था उतना ही एसी वास्तविकताओं से अवगत होता जा रहा था जो मुझकों अचंभे में डाल रही थीं। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि क़ुरआन में बहुत से एसे विषयों और बिंदुओं का उल्लेख किया गया है जिनके चिन्ह अन्य आसमानी पुस्तकों में नहीं पाए जाते और इसमें कोई ग़लती नहीं है। क़ुरआन, अपनी स्पष्ट तथा सुदृढ़ आयतों में मनुष्य को उसकी आयतों के भीतर चिंतन का निमंत्रण देता है।

यूनिवर्सिटी के इस प्रोफेसर डाक्टर गैरी मिलर ने, पवित्र क़ुरआन का अध्धयन करने के पश्चात, इस्लाम स्वीकार किया। वे कहते हैं कि क़ुरआन का अध्धयन करके मैं यह जानना चाहता था कि देखूं इसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी हज़रत ख़दीजा के स्वर्गवास और उनकी संतान के बारे में क्या कुछ कहा गया है किंतु मेरी अपेक्षा के विपरीत क़ुरआन के अध्धयन के दौरान सूरए मरियम ने मुझको आश्चर्च चकित कर दिया। इस सूरे में हज़रत मरियम की पवित्रता और उनकी महानता का उल्लेख किया गया है। यह एसी स्थिति में है कि जब बाइबिल और तौरेत में मरियम के नाम से विशेष कोई सूरा नहीं है। इसके अतिरिक्त क़ुरआन में हज़रत ईसा का नाम २५ बार आया है जबकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नाम का प्रयोग क़ुरआन में ५ बार से अधिक नहीं मिलता। एक अन्य बात यह है कि क़ुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पुत्री या उनकी पत्नी के नाम से कोई सूरा नहीं है।

वास्तविकता यह है कि पवित्र क़ुरआन एसा प्रज्वलित प्रकाश है जिसके पवित्र प्रकाश ने पूरे संसार को प्रकाशमान कर दिया है और दिन प्रतिदिन उसका प्रकाश फैलता ही जा रहा है। अतः यह स्पष्ट है कि इस ईश्वरीय पुस्तक के अनादर से न केवल यह कि मुसलमानों के बीच उसकी लोकप्रियता कम नहीं होगी बल्कि यह ग़ैर मुसलमानों को भी इस बात के लिए प्रेरित करेगा कि वे अन्तिम ईश्वरीय पुस्तक के रूप में पवित्र क़ुरआन का अध्ययन करें।

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