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Tuesday 25th of June 2019
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बैतुलमुक़द्दस की ज़ियारत हराम, फतवे पर हंगामा

बैतुलमुक़द्दस की ज़ियारत हराम, फतवे पर हंगामा

जार्डन में मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंधित जबहतुल अमलिल इस्लामी नामक पार्टी द्वारा बैतुल मुक़द्दस में स्थित  मस्जिदुलअक़्सा  की ज़ियारत को हराम घोषित किये जाने के बाद अरब और इस्लामी जगत में इस फतवे पर जम कर चर्चा हो रही है।
जार्डन के वक़्फ मंत्री डाक्टर हायल दाऊद ने इस फतवे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस प्रकार का फतवा देने वाले न जाने कौन से युग में जी रहे हैं ... इस्राईली, मुसलमानों को हथियार दिखा कर मस्जिदुअक्सा की ज़ियारत से रोकते हैं और यह लोग फतवा देकर इस पवित्र मस्जिद की ज़ियारत से मुसलमानों को रोक रहे हैं।
याद रहे कुछ दिनों पूर्व जार्डन की जबहतुल अमलिल इस्लामी नामक पार्टी की धार्मिक मामलों की समिति ने एक बयान जारी करके कहा था कि मस्जिदे अक्सा और बैतुलमुकद्दस की ज़ियारत करना हराम क्योंकि उस पर इस्राईल का क़ब्ज़ा है और उसकी ज़ियारत बड़ा पाप हो सकती है
जार्डन के वक्फ मंत्री ने कहा कि इस प्रकार के फतवों का कोई आधार नहीं होता क्योंकि पैगम्बरे इस्लाम (स) ने मस्जिदे अक्सा की ज़ियारत का आदेश दिया है और इस समय कि जब बैतुल मुकद्दस पर इस्राईलियों का क़ब्ज़ा है उसकी ज़ियारत करना मना कैसे हो सकता है?
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के फतवे इस्लाम धर्म और उसके सिद्धान्तों से अवगत लोग नहीं दे सकते। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के फतवे इस्राईली योजना का हिस्सा हैं ताकि बैतुलमुकद्दस के यहूदीकरण में सरलता हो। जार्डन के वक़्फ मंत्री डाक्टर हायल दाऊद ने पूरे विश्व के मुसलमानों को बैतुलमुकद्दस के दर्शन करने का आह्वान करते हुए कहा कि पूरी दुनिया से यहूदी बैतुलमुकद्दस के दर्शन के लिए आते हैं किंतु इस्राईली, मुसलमानों को मस्जिदुल अक्सा की ज़ियारत नहीं करते थे और अब कुछ लोग इस प्रकार के फतवे देकर इस्राईल की योजना में सहयोग कर रहे हैं।
याद रहे फिलिस्तीन के बैतुलमुक़द्दस नगर में स्थित मस्जिदे अक्सा मुसलमानों का पहला क़िब्ला है अर्थात इस्लाम के आरंभ में मुसलामन इसी मस्जिद की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ा करते थे।
बैतुलमुकद्दस के बारे में कितना जानते हैं आप?
पैग़म्बरे इस्लाम (स) बैतुल मुक़द्दस के स्थान पर मस्जिदुल अक़्सा को क़िबला बनाने की दुआ कर रहे थे। ईश्वर ने अपने अंतिम दूत की यह इच्छा पूरी कर दी और उन्हें प्रसन्न कर दिया। क़ुरान की यह आयत ज़ोहर की नमाज़ के बीच बनी सालिम बिन औफ़ मस्जिद में नाज़िल हुई। पैग़म्बरे इस्लाम (स) दो रकअत नमाज़ बैतुल मुक़द्दस की ओर रुख़ करके अदा कर चुके थे, उन्होंने बाक़ी दो रकअतें मस्जिदुल हराम की ओर रुख़ करके पढ़ीं। यही कारण है कि इस मस्जिद को दो क़िबलों वाली मस्जिद कहा जाता है।
कुछ सवाल!
वर्ष दूसरी हिजरी क़मरी में क़िबले में परिवर्तन के संबंध में कुछ सवाल उठते हैं। पहला यह कि क्यों मुसलमानों का क़िबला पहले बैतुल मुक़द्दस था? क्यों लगभग साढ़े चौदह वर्षों तक इस पवित्र स्थल की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ने के बाद, पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने क़िब्ले के परिवर्तन के लिए दुआ की। इतिहासकारों के अनुसार, जब मुसलमान मक्के में थे उनका क़िबला बैतुल मुक़द्दस था, इसलिए कि उस समय अनेकेश्वरवादी काबे में मूर्ति रखते थे और उसकी ओर रुख़ करके पूजा करते थे।
मुसलमानों ने अनेकेश्वरदियों से ख़ुद को जुदा करने और बुतों की ओर रुख़ करके नमाज़ न पढ़ने के लिए ईश्वर के आदेशानुसार, बैतुल मुक़द्दस की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ना शुरू किया। क़िबला बदलने के लिए ईश्वर ने आदेश दिया, ताकि ईश्वरीय अंतिम धर्म के रूप में इस्लाम की स्वतंत्र एवं स्वाधीन पहचान बन सके। हालांकि क़िबले के परिवर्तन के बाद, विरोधियों विशेष रूप से यहूदियों के तानों में वृद्धि हो गई। वे कहते थे कि अगर बैतुल मुक़द्दस की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ना सही था तो क़िबला क्यों बदल गया और अगर काबा स्थायी क़िबला है तो पहले बैतुल मुक़द्दस मुसलमानों का क़िबला कैसे बन गया था। दिलचस्प बात यह है कि क़ुराने मजीद ने क़िबले के परिवर्तन पर आधारित आयतों में पहले ही इस तरह के तानों और कटाक्ष की भविष्यवाणी कर दी थी और उसका जवाब दे दिया था।
सूरए बक़रा की 142वीं आयत में उल्लेख है कि शीघ्र ही कम बुद्धि वाले लोगों से कहेंगे, क्यों उन्होंने अपना क़िबला बदल दिया। उनसे कह दो, पूरब और पश्चिम ईश्वर के हैं, ईश्वर जिसे चाहेगा सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शित कर देता है। इस प्रकार ईश्वर उल्लेख करता है कि इस पूरी धरती और संसार का मालिक वह है और वह किसी भी स्थान को क़िबला निर्धारित कर सकता है।
मुसलमानों के लिए क़िबला परिवर्तन के कुछ परिणाम निकले। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण स्वतंत्र और स्वाधीन पहचान का हासिल होना था। अब उनका वही क़िबला था कि जो उन्हीं से विशेष था। उसके 6 साल बाद मक्के को फ़तह करने के साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली के हाथों काबे में रखे बुत नष्ट हो गए और मुसलमानों ने पूर्ण संतोष से काबे की ओर रुख़ करके नमाज़ अदा की।
दूसरी ओर, क़िबले का परिवर्तन उन मुसलमानों के लिए एक परीक्षा थी कि जो पहले यहूदी या ईसाई थे और अब काबे की ओर रुक़ करके नमाज़ पढ़ने में अधिक रूची नहीं रखते थे। बिल्कुल उसी तरह कि जो लोग इस्लाम के आरम्भ में मुसलमान हुए थे और काबे से विशेष लगाव रखते थे, वे मस्जिदुल अक़्सा की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ने में रूची नहीं रखते थे। दोनों ही मामलों में ईश्वरीय आदेश के प्रति मुसलमानों की गंभीरता स्पष्ट हो गई।
यहां यह बिंदु ध्यान योग्य है कि मस्जिदुल अक़्सा से मस्जिदुल हराम की ओर क़िबले के परिवर्तन का अर्थ मस्जिदुल अक़्सा के महत्व का कम होना नहीं है। क़ुरान ने इस मस्जिद के महत्व का उल्लेख किया है और मुसलमान हमेशा से ही एकेश्वरवाद के प्रतीक इस केन्द्र का विशेष सम्मान करते रहे हैं। वे मस्जिदुल अक़्सा को अपना प्रथम क़िबला मानते हैं और अतिक्रमणकारी ज़ायोनियों से उसकी रक्षा को अपना कर्तव्य समझते हैं। मस्जिदुल अक़्सा के विध्वंस की साज़िश रचने और बैतुल मुक़द्दस से मुसलमानों को बेघर कर देने की ज़ायोनी शासन की साज़िश पर मुसलमान शासकों की चुप्पी के प्रति मुसलमानों में रोष व्याप्त है। निःसंदेह, काबे में परिवर्तन इस्लामी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह घटना मुसलमानों में एकता और समन्वय का कारण है। लेकिन आज जो लोग मुसमानों में फूट डालने का प्रयास कर रहे हैं, वास्तव में वे इस घटना का अर्थ नहीं समझ सके हैं।


source : abna
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