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Friday 19th of July 2019
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क्षेत्र में अशांति का कारण सऊदी अरब / मक्का और मदीना सऊदी अरब की जागीर नहीं।

क्षेत्र में अशांति का कारण सऊदी अरब / मक्का और मदीना सऊदी अरब की जागीर नहीं।

अहलेबैत अ. समाचार एजेंसी अबना की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब के हाथों क्षेत्र में फैली अशांति,यमन पर आले सऊद की आक्रामकता,ईरानी जाएरीन का अपमान और उमरा पर अस्थायी रोक जैसी हालिया दिनों घटी घटनाओं के बारे में वर्ल्ड अहलेबैत असेम्बली की उच्च परिषद के सदस्य आयतुल्लाह डॉक्टर महदी हादवी तेहरानी के साथ अबना ने एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया।

वर्ल्ड अहलेबैत असेम्बली की उच्च परिषद के सदस्य ने बुधवार 15अप्रैल 2015 को इस प्रेस कान्फ़्रेंस में जो अबना के कार्यालय में आयोजित हई, क्षेत्र की वर्तमान घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा: ईरान का इंक़ेलाब ऐसे समय में सफल हुआ कि पश्चिमी विश्लेषकों के अनुसार मध्यपूर्व का क्षेत्र शांतिपूर्ण था लेकिन इसके बावजूद इंक़ेलाब के बाद ऐसा हड़कम्प मचा जो अप्रत्याशित था।

आयतुल्लाह हादवी तेहरानी ने कहा: इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के बाद जब ईरान पश्चिमी प्रभुत्व से बाहर निकल गया तो क्षेत्र के कुछ अन्य देशों को मौका मिला कि वह मध्य पूर्व में पश्चिमी हितों को पूरा करने के लिए उनकी कठपुतली बन जाएं। दूसरी ओर कुछ देशों जैसे इस्राईल कि जो ईरान के प्राकृतिक स्रोतों से वंचित हो गया था, क्षेत्र में एक अड्डे की तलाश में थाऔर परिणाम स्वरूप सऊदी अरब ने इस्राईल को ग्रीन सिग्नल दिया और मध्यपूर्व में इस्राईल को अपना साथी मिल गया।

ईरान का इंक़ेलाब, धार्मिक और राष्ट्रीय पक्षपात से दूर।

हौज़-ए-इल्मिया क़ुम के शिक्षक ने कहा: ईरान का इंक़ेलाब धार्मिक मूल्यों और इस्लामी विचारधारा को ज़िंदा करने के लिए मैदान में उतरा। हालांकि इंक़ेलाब के नेता और जनता सब शिया थे, अहलेबैत अ. के अनुयायी थे लेकिन इंक़ेलाब का नारा सभी दुनिया के मज़लूमों और कुचले हुये लोगों के हित में था। इसलिए इस्लामी इंक़ेलाब के दुश्मनों ने इस्लामी इंक़ेलाब को राष्ट्रीय और धार्मिक रंग देने की कोशिश की।

उन्होंने कहा: अब तक इस्लामी इंक़ेलाब ने जिस चीज को पेश किया वह पीड़ितों और मज़लूमों की रक्षा की है, ईरान दुनिया भर के सभी पीड़ितों की मुसीबतों व कठिनाइयों पर निगाह रखे हुए है और दुनिया भर के पीड़ितों के समर्थन की घोषणा कर रहा है चाहे वह किसी भी धर्म व सम्प्रदाय से सम्बंध रखते हों।

उन्होंने इस्लामी इंक़ेलाब के अन्य देशों पर प्रभाव की ओर इशारा करते हुए कहा: इस्लामी इंक़ेलाब के विचारों में इतना विस्तार पैदा होता गया कि क्षेत्र के अन्य देश भी इससे प्रभावित हुए और क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से इस्लामी जागरूकता की लहर वुजूद में आई।

तकफीरी टोलों के माध्यम से इस्लामी जागरूकता का रुख मोड़ा जाना।

आयतुल्लाह हादवी तेहरानी ने कहा: अरबी देशों के पैसे,पश्चिमी देशों के शैतानी षड़यंत्रों और इस्राईल के प्रोपगंडों ने इस्लामी देशों जिनमें इस्लामी जागरूकता की लहर फैली जैसे टयूनिस जहां से जागरूकता शुरू हुई उन्हें तकफीरी आतंकवादियों का गढ़ बना दिया और इस्लामी जागरूकता का रुख हिंसक और इस्लामो फ़ोबिया की ओर मोड़ दिया,सीरिया में बश्शारुल असद के खिलाफ लड़ने के लिए टयूनिस से आतंकवादी भेजे जाने लगे,जेहादुन नेकाह की बिदअत टयूनिस से शुरू हुई।

उन्होंने कहा: सीरिया में दुश्मनों की नीतियों ने इस तरह चाल चली कि उनके हिसाब से अल्पावधि में सीरिया को उखाड़ फेंक देंगें। सीरिया को सबसे ख़तरनाक आतंकवादी टोलों का गढ़ बनाया गया आईएसआईएल के बारे में कहा जाता था कि आईएसआईएल एक पागल,मूर्ख और जंगली टोला है। लेकिन दुश्मनों ने इस टोले का समर्थन कर उसे सीरिया और इराक के एक व्यापक क्षेत्र पर थोप दिया।

उन्होंने क्षेत्र में दुश्मनों की विफलताओं की ओर इशारा करते हुए कहा: लेकिन ईरान की व्यापक राजनीति,जनता के समर्थन और सुप्रीम लीडर की नीतियों ने हालात को उल्टा कर दिखाया और दुश्मनों को सीरिया और इराक में नाकों चने चबवा दिए। इराक में आईएसआईएल बगदाद से 15किलोमीटर की दूरी पर आ गया था लेकिन शिया मरजेईयत,जनता की दृढ़ता,इराक़ी अधिकारियों के प्रबंधन और ईरान के समर्थन से आईएसआईएल को मुंह की खानी पड़ी।

यमन के आदिवासी और स्थानीय संगठनों का राष्ट्रीय व राजनीतिक आंदोलन “अंसार अल्लाह” में बदल जाना।

आयतुल्लाह हादवी तेहरानी ने अपनी बात के दूसरे भाग में यमन पर जारी अतिक्रमण के बारे में बातचीत करते हुए कहा हौसी क़बीला यमन के ज़ैदी शियों का एक बड़ा क़बीला है। इस कबीले से जुड़ा आंदोलन एक राष्ट्रीय और सैन्य आंदोलन था जिसने कई बार“अली अब्दुल्लाह सालेह” के मुक़ाबले में स्टैंड लिया।

उन्होंने कहा लेकिन इन अंतिम वर्षों में यह आंदोलन एक राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया। अंसारुल्लाह आंदोलन जब सार्वजनिक और राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील हुआ तो व्यापक तौर पर उसे ताक़त मिली।

उन्होंने कहा: अंसारुल्लाह के व्यापक रूप से शक्तिशाली होने के बाद सऊदी अधिकारी को जो यमन को अपनी खिलाफत का हिस्सा समझते थे, अंसारूल्लाह से ख़तरा लगा इसलिए उन्होंने बिना अंजाम की चिंता किये यमन पर हमला कर दिया।

हौज़ ए इल्मिया क़ुम के शिक्षक ने मलिक अब्दुल्लाह की मौत को सऊदी अरब की राजनीति में बदलाव की वजह बताते हुए कहा: मलिक अब्दुल्लाह अपनी उम्र के अंतिम दिनों में इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि तकफीरी टोले यहाँ तक सऊदी अरब के लिए भी हानिकारक हैं इसलिए उन्होंने अपनी उम्र के अंतिम दिनों में तकफीरी आतंकवाद को सीमित कर दिया था लेकिन उनकी मौत से सऊदी अरब की राजनीति में परिवर्तन आ गया और फिर से तकफीरी विचारधारा हावी हो गई तो यह कहा जा सकता है कि यमन पर हमला सऊदी अरब की राजनीति में तकफीरी विचारधारा का परिणाम है। हमें उम्मीद है कि सऊदी सरकार इस नतीजे तक पहुंचेंगी कि यह हमला न केवल उनके हित में नहीं बल्कि उनके पतन का कारण है।

मक्का और मदीना आले सऊद की जागीर नहीं।

आयतुल्लाह हादवी तेहरानी ने अपनी बात के अंत में जद्दा हवाई अड्डे पर ईरानी ज़ाएरीन साथ की गई बदसलूकी की ओर इशारा करते हुए कहा: मक्का और मदीना दो इस्लामी शहर जो सभी मुसलमानों से संबंधित हैं यद्यपि भौगोलिक रूप से सऊदी अरब में स्थित हैं। लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि सऊदी सरकार ने इस्लामी शिक्षाओं और अंतरराष्ट्रीय नियमों के विपरीत इन दो शहरों पर एक विशेष समुदाय के विचारों को जबरदस्ती थोप रखा है और न केवल शियों बल्कि अन्य सभी समुदायों के लिए बहुत सारे प्रतिबंध लगा दिये हैं।

उन्होंने कहा: मक्का और मदीना में ज़ाएरीन के लिए मुश्किलें तो पहले से ही मौजूद थी लेकिन मौजूदा हालात में धार्मिक अराजकता के अलावा इज़्ज़त व सम्मान भी खतरे में पड़ गया है।!

उन्होंने कहा: यह सभी बातें इस बात का सबूत है कि सऊदी सरकार हरमैन शरीफ़ैन के मैनेजमेंट की क्षमता नहीं रखती है।

हौज़ ए इल्मिया क़ुम के शिक्षक ने कहा: ऐसे हाल में जब सऊदी अधिकारी हरमैन के ज़ाएरीन की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं, सभी इस्लामी देशों को मिलकर एक समिति बनानी चाहिए जो हरमैन शरीफ़ैन की सुरक्षा व्यवस्था को अपने हाथ में ले। मुस्लिम उल्मा और इस्लामी संगठनों को मिलकर इस बारे में सोचना चाहिए।

प्रश्न और उत्तर

आयातुल्लाह हादवी तेहरानी के स्पीच के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में संवाददाताओं ने उनसे कुछ सवाल किए आयतुल्लाह हादवी जिनके उत्तर दिए। नीचे इन प्रश्नों और उत्तरों को संक्षेप में बयान किया जा रहा हैः

साप्ताहिक गोया से अली शहीदी: क्या इस्लामी जगत में कुछ ऐसे उल्मा पाये जाते हैं जो सैद्धांतिक या वैचारिक रूप से आईएसआईएल का समर्थन करते हैं?

आईएसआईएल विचारधारा की जड़ें वहाबी वहाबी विचारधारा में निहित हैं। आईएसआईएल का आधार वहाबी विचारधारा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वहाबी खुल्लम खुल्ला, आईएसआईएल का समर्थन करते हैं। जिन लोगों ने आईएसआईएल को जन्म दिया है वह इस्लाम के प्रख्यात उल्मा नहीं हैं और न आईएसआईएल को ज्ञानात्मक विचारधारा के आधार पर वुजूद में लाया गया है।

आईएसआईएल विचारधारा का सम्बंध वहाबियत से है बल्कि दूसरे शब्दों में वहाबियत को अगर क्रियात्मक रूप दिया जाए तो आईएसआईएल बनता है। मेरे विचारानुसार आईएसआईएल सैन्य एजेंसियों के माध्यम से वुजूद में आया है न विचारधारा और आस्था के आधार पर।

इसलिए कि सैन्य एजेंसियों और आईएसआईएल के बीच एक तरह का तालमेल नजर आता है। पश्चिमी देशों का कहना है कि आईएसआईएल का व्यवहार आधुनिक राजनीति के अनुसार है जबकि आईएसआईएल में काम करने वाले लोग इतनी सूझबूझ नहीं रखते,इस बात का प्रमाण यह है कि देखने में आईएसआईएल सऊदी अरब के विरूद्ध है और सऊदी अरब आईएसआईएल का विरोधी। लेकिन हमारे पास पक्की जानकारी है कि सऊदी अरब के मध्य में स्थित नज्द क्षेत्र का बहुमत आईएसआईएल का समर्थक है।

कहा यह जा रहा था कि आईएसआईएल मलिक अब्दुल्लाह की मौत के बाद सऊदी अरब पर हमला करेगा। लेकिन कोई घटना नहीं घटी। आईएसआईएल खुद को इस्लाम का मुजाहिद कहलाता है लेकिन इस्राईल के मुक़ाबले में चुप है। यह सब इस बात की दलील है कि आईएसआईएल का समर्थन करने वाली विदेशी एजेंसियां ​​हैं।

अहलेबैत समाचार एजेंसी की अरबी सर्विस से मोहम्मद सअदी: मुस्लिम ब्रदरहुड का तकफीरी टोलियों ख़ास तौर पर आईएसआईएल से किसी तरह का कोई संपर्क है?

मुस्लिम ब्रदरहुड सल्फ़ी विचारधारा की अनुयायी है। सल्फ़ी विचारधारा की विभिन्न शाखाएं हैं। और वहाबी विचारधारा इसी सल्फ़ी विचारधारा की एक शाखा है। मुस्लिम ब्रदरहुड विचारों की दृष्टि से सल्फ़ी विचारधारा के मालिक हैं और मुस्लिम ब्रदरहुड एक पुराना आंदोलन है जो एक विशेष शैली पर मिस्र में वुजूद में आई और बाद में हमास भी इसी से वुजूद मे आई, तुर्की में अदालत पार्टी को जन्म देने वाली भी यही मुस्लिम ब्रदरहुड विचारधारा है।

यह विचारधारा राजनीतिक विशेषताओं के आधार पर आईएसआईएल की विचारधारा से अलग है। मुस्लिम ब्रदरहुड आईएसआईएल की तरह चरमपंथी नहीं थे और न हैं। जब मिस्र में सत्ता मुस्लिम ब्रदरहुड के हाथ आई तो सरकार पर दबाव डालने वाला एक टोला तकफीरियों का था। इसलिए मुस्लिम ब्रदरहुड,वहाबी और आईएसआईएल विचारधारा की जड़ें, इसी सल्फ़ी विचारधारा से जुड़ी हुई हैं।

साप्ताहिक पत्रिका गोया से अली शहीदी: यमन के ज़ैदी शियों का अंसारूल्लाह आंदोलन से क्या सम्बंध है?

यमन की अक्सर आबादी ज़ैदी शियों पर आधारित है और अहले सुन्नत अल्पसंख्यक हैं। हौसी जैदी,शियों का एक क़बीला है। यह अपने समय की सरकार के विरोधी थे जबकि अली अब्दुल्लाह सालेह खुद जैदी थे। हौसी जो सरकार द्वारा अत्याचार का शिकार थे यह यमन के एक विशेष क्षेत्र में रहते थे धीरे धीरे उनका आंदोलन यमन के दूसरे क्षेत्रों में भी फैल गया। और अंसारुल्लाह आंदोलन एक सार्वजनिक और राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया। अब हौसियों का आंदोलन किसी एक धर्म से विशिष्ट नहीं रहा बल्कि इसके समर्थक सभी समुदायों में पाए जाते हैं और हौसियों ने डेमोक्रेटिक तरीके से सरकार को अपने अधिकार में ले लिया है।

अंसारुल्लाह आंदोलन अगर उनके (सऊदी अरब) अनुसार राष्ट्रीय आंदोलन नहीं है तो ईरान का कहना है कि यह समस्या खुद यमनवासी है जो उन्हें खुद अपने दम पर हल करना है और सऊदी अरब की ओर से बाहरी हस्तक्षेप किसी भी सूरत में सही नहीं है यह अत्याचार ऐसे ही है जैसे इस्राईल फिलिस्तीनियों पर जुल्म ढा रहा है।

अहलेबैत अ.समाचार एजेंसी की पर्शियन सर्विस से अहमद महबूबी: क्या आपकी नज़र में ज़ैदी न्यायशास्त्र में कोई परिवर्तन हुआ है जो इतने लम्बे समय की चुप्पी के बाद उन्होंने आंदोलन किया है और हुकूमत को अपने हाथ में लेना चाहते हैं?

हौसियों के बीच वर्तमान स्थिति एक राजनीतिक आंदोलन का परिणाम है और लोगों ने इस हिसाब से इस आंदोलन का समर्थन किया है न कि उनके विश्वास व विचारधारा में कोई परिवर्तन हुआ है। फ़िक़्ही व अक़ीदती विचारधारा का प्रभाव वर्तमान स्थिति के पीछे बहुत कम हैं। वह चाहते हैं कि अपने हनन हुए अधिकारों को हासिल करें,वास्तव में वह राजनीतिक रूप से मज़बूत हो चुके हैं। बहरैन की समस्या भी ऐसी ही है बहरैन में भी लोग राजनीतिक अधिकार के माध्यम से लोकतंत्र चाहते हैं। यह जो बहुमत ज़ैदियों की है इसका मतलब यह नहीं है कि यह आंदोलन धार्मिक सिद्धांत के आधार पर है बल्कि यह आंदोलन राजनीतिक है और लोग अपना स्वाभाविक अधिकार चाहते हैं।

अल-कौसर इंटरनेशनल चैनल से अरवीली: आज कुछ शिया आंदोलन, अंसारूल्लाह की ज़ैदी विचारधारा की आलोचना करते हुए इसका विरोध करते हैं ऐसी स्थिति में इस समस्या को कैसे पेश किया जाए?

उल्मा की बज़्म में ज्ञानात्मक आधार पर बातचीत करते हुए किसी एक धर्म को की आलोचना की जा सकती है, लेकिन इस समय हमारी बहस यह नहीं है कि ज़ैदियों का विश्वास सही है या गलत? इस समय समस्या यह है कि मुसलमानों की एक बड़ी संख्या यमन में मज़लूम है उन्होंने आंदोलन किया और अपने राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन साम्राज्यवादी शक्तियों ने उनका पतन करना शुरू कर दिया, बिना यह देखे कि वह ज़ैदी हैं या सुन्नी। बहरैनियों को समर्थन शिया होने के आधार पर नहीं है, हम तो फिलिस्तीन के प्रतिरोध समूहों का भी समर्थन करते हैं जबकि वह शिया नहीं हैं। जो लोग ज़ैदी समुदाय की आलोचना करते हैं वह जान लें कि उनकी यह कार्यवाही वहाबी विचारधारा के हित में है इसलिए कि यमन में ज़ौदियों के दुश्मन वहाबी हैं। मौजूदा मामले में अंसारूल्लाह को कमजोर बनाना वहाबियत को मज़बूत करना है और शिया इसना अशरी के हित में नहीं है।

साप्ताहिक पत्रिका गोया से अली शहीदी: यमन में सउदी आक्रमण के परिणाम स्वरूप क्षेत्र की स्थिति क्या होगी?

यमन के लोग कुछ अन्य देशों के विपरीत अक़ीदती विचारधारा और भावना के आधार पर बहादुर हैं। सऊदी अरब पहले भी हौसियों को मिटाने की कोशिश करता रहा है लेकिन सफल नहीं हो सका बल्कि इसके विपरीत अंसारूल्लाह धार्मिक आंदोलन से बाहर निकल कर राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील हो गया है। सऊदी अरब का यमन में कोई भविष्य नहीं है। यमन पर हमला मात्र राजनीतिक मूर्खता है। सऊदी अरब अगर युद्ध को नहीं रोकेगा तो इस दलदल में दफन हो जाएगा वह कुछ बमों से यमन को हरा नहीं सकता। अगर अंसारूल्लाह पूरी गंभीरता के साथ मुकाबले के लिए तैयार हो जाए जो अभी तक नहीं हुआ है तो मुझे लगता है कि सऊदी अरब उसके सामने नहीं टिक पाएगा और अल्पावधि में हार का मज़ा चखेगा और यमन आले सऊद का अंत हो होगा न कि उन्नति का शुभारम्भ।

इरना समाचार से चेहरा क़ानी: विदेश मंत्रालय की कार्यवाहियों से हटकर क्या बेअसे याहज कमेटी ने भी जद्दा की घटना के खिलाफ कोई काम अंजाम दिया है या नहीं?

इस घटना के घटित होते ही “हज व ज़ियारात समिति” और बेअस-ए-रहबरी की ओरसे भी सख्त नोटिस लिया गया और साथ साथ ईरानी वाणिज्य दूतावास की कार्रवाई की वजह से उमरा पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी गई।

अहलेबैत समाचार एजेंसी की अबना सर्विस से मुहम्मद सअदीः हज और उमरे पर अस्थायी रोक क्या ईरान के विरूद्ध दुश्मनों की ओर से दुरुपयोग का कारण नहीं बनेगी?

सऊदी अरब में वहाबियत के विभिन्न रंग व रूप हैं और कट्टरपंथी वहाबी ईरानियों या पूरी दुनिया के शियों के हरमैन शरीफ़ैन में जाने के विरोधी हैं। ऐसे कुछ कट्टरपंथी टोलों के साथ खुद हमारा टकराव रहा है हम उनसे कहते थे कि तुम्हारी सरकार ने हमें वीजा दिया है और हम कानूनी तौर पर यहाँ आए हैं तो वह अपनी सरकार पर लानत भेजते और गालियां देते थे कि क्यों वह शियों को वीज़ा देकर यहाँ बुलाती है। कट्टरपंथी वहाबी शियों के हरमैन में जाने के विरोधी हैं और अगर यह समस्या जल्दी हल नहीं हुई और हज पर पाबंदी लग गई तो वह शियों के खिलाफ प्रचार करेंगे कि शिया मुसलमान नहीं हैं वह हज व उमरे पर विश्वास नहीं रखते।

हौज़ा समाचार से सआदत: क्या इस संबंध में हरमैन शरीफ़ैन संस्था के पास कोई अंतरराष्ट्रीय समाधान है?

पिछले साल सबसे ज़्यादा उमरे पर जाने वाले लोग ईरानी थे। हज व उमरा के लिए जितनी क्षमता ईरानियों के पास है उतनी किसी के पास नहीं। लेकिन हम सऊदी अरब की राजनीतिक सीमाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते और सऊदी सरकार के बारे में कोई चर्चा नहीं करना चाहते हमारा कहना है कि मक्का और मदीना इस्लामी दुनिया से संबंधित है अब अगर मक्का और मदीना सऊदी अरब में स्थित है तो इस सरकार का पहला कर्तव्य यह है कि वह सभी ज़ाएरीन के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराये। उदाहरण के तौर पर संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका में है तो अमेरिकी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह वहाँ सुरक्षा प्रदान करे इसी तरह सऊदी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अमेरिकी सरकार की तरह मक्का और मदीना के ज़ाएरीन को सुरक्षा प्रदान करे, हर ऐतेबार से जानी, माली, वैचारिक। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार यह स्वीकार्य योग्य नहीं है कि मस्जिदुन नबी में एक व्यक्ति दूसरे को सलाम करे तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाए और गिरफ्तार करने का कारण बताया जाए कि मस्जिदुन नबी में दो लोगों का आपस में बातचीत करना निषिद्ध है।

मौज समाचार एजेंसी से शाबरम: हरमैन शरीफ़ैन के प्रबंधन के लिए एक वैश्विक संगठन या समिति की जो आपने बात की और प्रस्ताव दिया है, वह समिति इस्लामी सरकारों की ओर से तय होनी चाहिए या मुस्लिम उल्मा व हौज़ए इल्मिया से?

यह मुस्लिम उल्मा की जिम्मेदारी है कि वह इस विषय पर चर्चा करें कि क्यों मक्का और मदीना इतनी कठिनाइयों से ग्रस्त है। उस्मानी शासनकाल में अहले सुन्नत के चारों सम्प्रदाय हरमैन में मौजूद थे और हर कोई अपने धर्म के अनुसार शांति और सुरक्षा के लिए अपनी गतिविधियां अंजाम देता था लेकिन आज पूरे मक्का और मदीना में एक समुदाय प्रचार कर रहा है और बाकी किसी का नाम व निशान तक नहीं है और यह समुदाय भी वह समुदाय है जो विश्वास के आधार पर उन चारों में से अलग है और बाकी लोगों की गर्दनें काट रहा है।


source : abna
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