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Thursday 21st of March 2019
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पवित्र क़ुम शहर

 

ईरान के शहरों में क़ुम शहर को विशेष महत्व हासिल है और ईरान में ऐसे शहर कम हैं जिनमें क़ुम के जितना धार्मिक व प्रभावशाली आकर्षण हों क्योंकि इस शहर में जहाँ एक ओर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की पवित्र परिजन के वंश से परपौत्री हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का रौज़ा है जो दूसरी ओर पूरे विश्व में इस्लामी संस्कृति व शिक्षाओं के प्रसार का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र इस शहर में स्थित है। क़ुम का भ्रमण करने वाले अधिकांश पर्यटकों का मुख्य उद्देश्य हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े का दर्शन, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन के आज्ञापालन की फिर से प्रतिबद्धता दर्शाना और आध्यात्मिक लाभ उठाना होता है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम के परपौत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की बेटी हज़रत फ़ातेमा मासूमा का 173 हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में पैदा हुयीं। हज़रत मासूमा एक दक्ष वक्ता व शिक्षक और सदाचारिता में बेजोड़ थीं। वर्ष 201 हिजरी क़मरी में हज़रत मासूमा अपने भाई इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से मिलने के लिए मदीना से ईरान के लिए रवाना होती हैं और ईरान में प्रविष्ट होकर ईरान के पूर्वोत्तरी नगर ख़ुरासान के मार्ग पर बढ़ती हैं किन्तु बीच सफ़र में ही क़ुम नगर के निकट बीमार हो जाती हैं और उन्हें क़ुम लाया जाता है। अंततः क़ुम नगर में बीमारी की हालत में सत्रह दिन बाद उनका स्वर्गवास हो जाता है। उनकी मृत्यु के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह ज़हर से बीमार हुयीं थीं और उसी हालत में उनका स्वर्गवास हुआ। स्वर्गवास के समय हज़रत मासूमा की उम्र 28 वर्ष थी और उन्हें क़ुम नगर में दफ़्न किया गया जहां इस समय उनका भव्य रौज़ा है। शताब्दियों से हज़रत मासूमा का रौज़ा श्रद्धालुओं के दर्शन का केन्द्र बना हुआ है कि इस दौरान उनके रौज़े की इमारत का अनेक बार निर्माण हुआ। वर्तमान रौज़े में ज़रीह, गुंबद, ड्योढी, दालान, प्रांगण, और बहुत ही सुंदर बुर्ज हैं।

 

हज़रत मासूमा के स्वर्गवास के बाद श्रद्धालुओं ने उनकी क़ब्र के ऊपर एक सादा सा रौज़ा बनवाया। वर्ष 256 हिजरी क़मरी में इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की बेटी हज़रत ज़ैनब क़ुम आयीं और उन्होंने हज़रत मासूमा की क़ब्र पर एक गुंबद बनवाया। हज़रत मासूमा का रौज़ा बहुत समय तक इसी स्थिति में रहा यहां तक कि 605 हिजरी में मुज़फ़्फ़र राजवशं के शासक मुज़फ़्फ़र अहमद बिन  इस्माईल ने 613 हिजरी क़मरी में हज़रत मासूमा के रौज़े पर टाइल लगवायीं। वर्ष 925 हिजरी क़मरी बराबर 1519 ईसवी में सफ़वी राजवंश के शासक इस्माईल सफ़वी की रानी शाह बेगम ने छोटे व सादे गुंबद के स्थान पर एक विशाल भव्य गुंबद बनवाया। शाह बेगम बहुत भली व महत्वकांक्षी महिला थीं। इस नए गुंबद के भीतरी भाग में सुनहरे व नीले रंग की चित्रकारी थी जबकि बाहरी भाग पर टाइल लगी हुयी थी किन्तु अब इस गुंबद का कोई निशान मौजूद नहीं है।

 

सफ़वी शासन काल में हज़रत मासूमा के पवित्र रौज़े की ज़रीहव रौज़े सहित अनेक धार्मिक इमारतों का निर्माण हुआ कि जो विकसित होकर इस रूप में पहुंचा है। वर्ष 1998 में हज़रत मासूमा के रौज़े की इमारत की व्यापक स्तर पर मरम्मत की गयी। इस दौरान इमारत की दीवारों के हरे रंग के संगे मरमर तथा टाइलों से सुसज्जित किया गया।           

 

हज़रत मासूमा का रौज़ा अपनी सभी इमारतों के साथ वर्तमान क़ुम नगर के केन्द्र में क़ुमरूद नामक नदी के पूर्वी छोर पर स्थित है। रौज़े की इमारत और इसके बरामदे, प्रांगण, मस्जिद, संग्रहालय एवं अन्य इमारते 14000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल पर फैले हुये हैं। रौज़े का सुनहरा गुंबद वह पहला मनमोहक आकर्षण हे जो रौज़े के दर्शनार्थियों को अपनी ओर खींचता है। यह गुंबद 16 मीटर ऊंचा है और इसका निर्माण 13वीं हिजरी में सुनहरे रंग की ईंट से किया गया है। गुंबद पर सोने के पानी चढ़ाने का काम उस्ताद महमूद मेमार क़म्मी ने किया। इस सुनहरे गुंबद के नीचे हज़रत मासूमा की क़ब्र है जिसके चारों ओर एक बड़ी सुंदर ज़रीह बनी है। चांदी की इस ज़रीह को सुनहरे रंग की टाइल से सुसज्जित किया गया है। इस्फ़हान के कारीगरों के दक्ष हाथों से बनी ज़रीह ने रौज़े की शोभा बढ़ी दी है। इस ज़रीह के ऊपर की छत को उन्नीसवीं शताब्दी में आइनाकारी और मोक़र्नस कला से सजाया गया है। रौज़े के भीतर झाड़फ़ानूस के नीचखे शीशों की चमक हर देखने वाले को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी प्रकार रौज़े की मरमर के पत्थर से पक्की ज़मीन पर बिछे हाथ के बुने ईरानी क़ालीन ने भी रौज़े के आध्यात्मिक आकर्षण को बढ़ा दिया है। रौज़े की ज़रीह के निकट क्षेत्र को बरामदा कहते हैं। रौज़े में चार बरामदे हैं। इन बरामदों को टाइल के काम, सोने के काम, आइनाकारी, प्लास्टर आफ़ पेरिस और सुलेखन से सजाया गया है।

 

रौज़े के प्रवेश द्वारों के पास दालनें बनी हुयी हैं जिनमें ऐवाने तला और ऐवाने आइने नामक दालानें अधिक प्रसिद्ध हैं। रौज़े के उत्तरी प्रवेश द्वार के निकट ऐवाने तला नामक दालान स्थित है। इस दालान को फ़िरोज़ई रंग की अष्टकोणीय छोटी टाइलों से सजाया गया है। टाइल के ऊपर आसमानी रगं की पृष्ठिभूमि में सुंदर लीति में आधे मीटर की परिधि वाले शिलालेख बने हुए हैं जो पूरी दालान में जगह जगह बने हुए हैं।

 

रौज़े के पूर्वी प्रवेश द्वार पर भी एक दालान ऐवाने तला जितनी ऊंची बनी हुयी है। इस दालान को आइनाकारी से सजाया गया है इसलिए इसे ऐवाने आइने कहते हैं। यह दालान तेरहवीं हिजरी के प्रसिद्ध कलाकार उस्ताद हसन मेमार क़ुम्मी की दक्षता का अद्भुत उदाहरण पेश करती है। दालानों के इलावा रौज़े के तीन बड़े प्रांगण हैं जो सेहने नौ, सेहने अतीक़ और सेहने साहेबुज़्ज़मान के नाम से जाने जाते हैं। कुम मिलाकर हज़रत मासूमा का रौज़ा वास्तविक वर्णन शब्दों द्वारा बहुत मुश्किल है। यह रौज़ा ईरान के कलाकारों की कला और आस्था का संगम पेश करता है।    

 

क़म नगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में हज़रत मासूमा के रौज़े के इलावा पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन के वशं से इमामज़ादे एवं महान धर्मगुरुओं के अनेक मक़बरे और क़बरें भी हैं जहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं का तांता बंधा रहता है। इन दर्शन स्थलों ने क़ुम नगर को महत्वपूर्ण शहर बना दिया है। पूरे सालम क़ुम नगर असंख्य दर्शनार्थियों की मेज़बानी करता है। क़ुम और उसके आस-पास लगभग 300 दर्शन स्थल हैं कि हर दर्शन स्थल में गुंबद, प्रांगण और सराय मौजूद हैं कि इनमें से लगभग सभी विभिन्न शताब्दियों की वास्तुकाला का नमूना पेश करते हैं। क़ुम में मौजूद कुछ दर्शन स्थल बहुत प्रसिद्ध हैं। जैसे मस्जिदे जमकारान, मस्जिदे इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम, इमामज़ादा अली बिन जाफ़र, इमाम ज़ादा अहमद बिन क़ासिम और क़ुम की जामा मस्जिद उल्लेखनीय है।

 

मस्जिदे जमकरान क़ुम नगर से 6 किलोमीटर दूर  है और यह इस क्षेत्र की सबसे भव्य मस्जिद है। यह मस्जिद मानवता के अंतिम मोक्षदाता हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम से संबद्ध है। हर सप्ताह पूरे ईरान से लाखों लोग इस मस्जिद का दर्शन करने आते हैं और लाभान्वित होते हैं। शैख़ हसन बिन मुस्ले ने वर्ष 1002 ईसवीं में मस्जिदे जमकरान का निर्माण कराया। अंतिम मोक्षदाता के प्रकट होने की प्रतीक्षा करने वालों का यह सबसे बड़ा केन्द्र है। मस्जिदे जमकरान में समय के साथ ही बहुत विकास हुआ है और इस समय यह बहुत बड़े क्षेत्रफल पर फैली हुयी है।

 

क़ुम की जामा मस्जिद भी क़ुम की सबसे प्राचीन मस्जिद है। इस मस्जिद का निर्माण पांचवी हिजरी क़मरी में हुआ था और इस मस्जिद में ईरान की वास्तुकला के कई युग की यादें बाक़ी हैं। क़ुम की जामा मस्जिद में रात की विशेष नमाज़ के तीन कमरे, बड़ा प्रांगण, बरामदा, तहख़ाना और ऐतिहासिक गुंबद हैं। बरामदे में प्लास्टर आफ़ पेरिस से मुक़र्नस का काम, मस्जिद में टाइल का काम और अद्भुत वास्तुकला को देख कर पर्यटक तारीफ़ किए बिना नहीं रह सकता।

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