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Monday 20th of May 2019
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चेहलुम, इमाम हुसैन की ज़ियारत का सवाब

 

इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम के आते ही इमाम हुसैन (अ) के चाहने वालों और शियों के बीच एक अलग की प्रकार का जोश भर जाता है और उनके दिल हुसैन (अ) की मोहब्बत में और भी तीव्रता से धड़कने लगते हैं। आख़िर क्या कारण हैं कि इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम के लिये उनके चाहने वाले बल्कि अगर शब्द बदल कर कह दिया जाए कि सारी दुनिया इतनी बेक़रार और बेचैन क्यों रहती है? यह दिली खिंचाव और अंदरूनी मोहब्बत धार्मिक हस्तियों के एक सामान्य से कथन से कही अधिक है कि जिसमें उन्होंने इस दिन कुछ मुस्तहेब और वाजिब आमाल के बारे में बताया है।

 

लेकिन चेहलुम के दिन यानी बीस सफ़र को इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत का अपना अलग ही स्थान है, प्रश्न यह उठता है कि इमाम हुसैन (अ) के लिये जो विशेष ज़ियारतें दुआओं और रिवायतों की पुस्तकों में आई हैं उनमें से चेहलुम के दिन की ज़ियारत को विशेष स्थान दिया गया है? इसी प्रकार के और भी बहुत से प्रश्न है जो चेहलुम के बारे में दिमाग़ में आते रहते हैं जैसे यह कि आख़िर क्यों धार्मिक हस्तियों ने अरबईन को इतना आधिक महत्व दिया है? आशूर की क्रांति में चेहलुम का क्या महत्व और रोल है? आदि।

 

ईश्वर और इमाम हुसैन (अ)

السلام عليك يا ثارالله وابن ثاره (2)

इमाम हुसैन (अ) का ईश्वर से संबंध और उससे लगाव इतना अधिक था कि सैय्यदुश शोहदा का रक्त बहाया जाना ऐसा ही था जैसे धरती पर ईश्वर का ख़ून बहाया गया हो, जिसका बदला ईश्वर के विशेष वलियों के इंतेक़ाम के बिना संभव नहीं होगा। जैसा कि ऐनुल्लाह और यदुल्लाह की उपाधि पाने वाले अमीरुल मोमिनी इमाम हुसैन (अ) के लिये क़तीलुल्लाह के शब्द का प्रयोग करते हैं जो इस बात को दिखाता है कि आपका ईश्वर से कितना अधिक संबंध और लगाव था।

 

क़ुरआन और इमाम हुसैन (अ)

हज़रत इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं: हर वाजिब और मुस्तहेब नमाज़ में सूर -ए- फ़ज्र पढ़ो क्योंकि यह इमाम हुसैन (अ) का सूरा है। (1)

 

अरफ़ा और इमाम हुसैन (अ)

अरफ़ा के दिन इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत की फ़ज़ीलत मुतवातिर और बहुत अधिक संख्या में है जैसा कि यह रिवायत जिसमें इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं:

فَمِنْ ذَلِكَ مَا رَوَيْنَاهُ بِإِسْنَادِنَا إِلَى أَبِي جَعْفَرِ بْنِ بَابَوَيْهِ بِإِسْنَادِهِ فِي كِتَابِ ثَوَابِ الْأَعْمَالِ إِلَى أَبِي عَبْدِ اللَّهِ (ع). فِي ثَوَابِ مَنْ زَارَ الْحُسَيْنَ (ع) فَقَالَ مَنْ أَتَاهُ فِي يَوْمِ عَرَفَةَ عَارِفاً بِحَقِّهِ كُتِبَ لَهُ أَلْفُ حَجَّةٍ وَ أَلْفُ عُمْرَةٍ مَقْبُولَةٍ وَ أَلْفُ غَزْوَةٍ مَعَ نَبِيٍّ مُرْسَلٍ أَوْ إِمَامٍ عَادِلٍ . (3)

 

इमाम हुसैन (अ) की  ज़ियारत की फ़ज़ीलत के बारे में फ़रमायाः जो भी अरफ़ा के दिन इस हालत में कि इमाम हुसैन (अ) के हक़ को पहचानता हो उनकी ज़ियारत के लिये जाए उसके लिये 1000 हज और 1000 क़ुबूल उमरे और 1000 बार पैग़म्बर के साथ यान आदिल इमाम के साथ जंग करने का सवाब लिखा जाएगा।

 

और एक दूसरी रिवायत में आया हैः

 

وَ مَنْ أَتَاهُ فِي يَوْمِ عَرَفَةَ عَارِفاً بِحَقِّهِ كَتَبَ اللَّهُ لَهُ أَلْفَيْ حَجَّةٍ وَ أَلْفَيْ عُمْرَةٍ مَقْبُولَةٍ [مُتَقَبَّلَاتٍ ] وَ أَلْفَ غَزْوَةٍ مَعَ نَبِيٍّ مُرْسَلٍ أَوْ إِمَامٍ عَادِلٍ قَالَ فَقُلْتُ وَ كَيْفَ لِي بِمِثْلِ الْمَوْقِفِ قَالَ فَنَظَرَ إِلَيَّ شِبْهَ الْمُغْضَبِ ثُمَّ قَالَ يَا فُلَانُ إِنَّ الْمُؤْمِنَ إِذَا أَتَى قَبْرَ الْحُسَيْنِ ع يَوْمَ عَرَفَةَ وَ اغْتَسَلَ بِالْفُرَاتِ ثُمَّ تَوَجَّهَ إِلَيْهِ كَتَبَ اللَّهُ لَهُ بِكُلِّ خُطْوَةٍ حَجَّةً بِمَنَاسِكِهَا وَ لَا أَعْلَمُهُ إِلَّا قَالَ وَ عُمْرَةً (4)

 

जो भी अरफ़ा के दिन इस हालत में कि वह इमाम हुसैन (अ) के हक़ को पहचानता हो उनकी ज़ियारत को जाए, ईश्वर उसको 1000 हज 1000 क़ुबूल उमरे और 1000 बार पैग़म्बर या आदिल इमाम के साथ जंग करने का सवाब लिखता है।

 

रावी कहता है मैंने इमाम से कहाः क्या किसी दूसरे स्थान पर भी अरफ़ात के मोक़फ़ के जैसा सवाब है? उन्होंने क्रोध भरी दृष्टि से मुझे देखा और मेरा नाम ले कर संबोधित करते हुए फ़रमायाः जब भी मोमिन अरफ़ा के दिन इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिये आए और फ़ुरात के पानी से ग़ुस्ल करे और फिर उनकी क़ब्र की तरफ़ चेहरा करके चले, ईश्वर हर क़दम के बदले एक पूर्ण जह का सवाब उसके लिये लिखता है।

 

एक दूसरी रिवायत में इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमायाः

أَنَّ اللَّهَ تَبَارَكَ وَ تَعَالَى يَتَجَلَّى لِزُوَّارِ قَبْرِ الْحُسَيْنِ ع قَبْلَ أَهْلِ عَرَفَاتٍ وَ يَقْضِي حَوَائِجَهُمْ وَ يَغْفِرُ ذُنُوبَهُمْ وَ يُسْعِفُهُمْ [يُشَفِّعُهُمْ ] فِي مَسَائِلِهِمْ ثُمَّ يَأْتِي أَهْلَ عَرَفَةَ فَيَفْعَلُ بِهِمْ ذَلِكَ (5)

 

ईश्वर अरफ़ात वालों से पहले इमाम हुसैन (अ) के श्रद्धालुओं पर अपना जलवा दिखाया और उनकी हाजतों को पूर्ण किया और पहले उनके गुनाहों को क्षमा कर ता है और उनके चाहने के अनुसार शिफ़ाअत करता है, उसके बाद अरफ़ात वालों की तरफ़ देखता है और यहीं अनुकम्पा उन पर करता है।

 

एक दूसरी रिवायत में इमाम सादिक़ (अ) ने फ़रमायाः

 

إِذَا كَانَ يَوْمُ عَرَفَةَ نَظَرَ اللَّهُ تَعَالَى إِلَى زُوَّارِ قَبْرِ الْحُسَيْنِ بْنِ عَلِيٍّ ع فَقَالَ ارْجِعُوا مَغْفُوراً لَكُمْ مَا مَضَى وَ لَا يُكْتَبُ عَلَى أَحَدٍ ذَنْبٌ سَبْعِينَ يَوْماً مِنْ يَوْمِ يَنْصَرِفُ (6)

जब अरफ़ा का दिन आता है, ईश्वर हुसैन इब्ने अली की क़ब्र के श्रद्धालुओं पर (अनुकम्पा भरी) दृष्टि डालता है औऱ उनको संबोधित करके फ़रमाता हैः पलट आओं, जब कि तुम्हारे पिछले पाप क्षणा कर दिये गये हैं और जिस दिस से श्रद्धालु पलटता है उसके बाद से 70 दिन तक उसके कोई पाप नहीं लिखा जाता है।

इमाम सादिक़ (अ) से एक दूसरी रिवायत में आया हैः

 

مَنْ زَارَ الْحُسَيْنَ بْنَ عَلِيٍّ ع يَوْمَ عَرَفَةَ كَتَبَ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ لَهُ أَلْفَ أَلْفِ حَجَّةٍ مَعَ الْقَائِمِ وَ أَلْفَ أَلْفِ عُمْرَةٍ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ص وَ عِتْقَ أَلْفِ أَلْفِ نَسَمَةٍ وَ حُمْلَانَ أَلْفِ أَلْفِ فَرَسٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَ سَمَّاهُ اللَّهُ عَبْدِيَ الصِّدِّيقُ آمَنَ بِوَعْدِي (7)

 

जो भी अरफ़ा के दिन हुसैन इब्ने अली की ज़ियारत को जाए, ईश्वर इमाम क़ाएम के साथ एक लाख हज और पैग़म्बर के साथ एक लाख उमरे  और एक लाख दासों को स्वतंत्र करने और (जिहादियों की सवारी के लिये) एक लाख घोड़ों को ईश्वर की राह में सदक़ा देने का सवाब उसके लिये लिखता है और उसको इस प्रकार से याद करता हैः मेरा बहुत सच्चा बंदा मेरे वादे पर ईमान लाया।

 

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(1)    तफ़्सीरे नमूना जिल्द 26, पेज 439

(2)    ज़ियारते वारेसा

(3)    सवाबुल आमाल, पेज 115

(4)    मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, जिल्द 2, पेज 58, कामिलुज़्ज़ियारात 169

(5)    सवाबुल आमाल 116, कामेलुज़्ज़ियारात पेज 170

(6)    मिसबाहुल मुजतहिद, पेज 716, कामिलुज़्ज़ियारात पेज 171

(7)    तहज़ीबुल अहकाम, जिल्द 6 पेज 49, कामिलुज़्ज़ियारात पेज 172

 

सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

 

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