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Wednesday 22nd of May 2019
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चेहलुम की ज़ियारत क्यों पढ़नी चाहिये?

 

क़ुरआन में सृष्टि का रचयता ईश्वर मोमिनों से कहता है कि मोमिन ईश्वरीय दिन (अय्यामुल्लाह) को याद रखते हैं ताकि यह महान ईश्वरीय दिन भुलाए न जा सकें , चेहलुम भी उन्ही महान दिनों में से एक है जो कि कर्बला की घटना की विस्तार है, इसीलिये आशूरा के दिन यानी ईश्वरीय दिन के सम्मान के लिये इमाम हुसैन (अ) (अ)  के चाहने वाले चेहलुम के दिन इमाम हुसैन (अ) (अ)  की क्रांति के साथ मिल जाते हैं और इस दिली मिलाप को दिखाने के लिये यह लोग कर्बला में इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिये जाते हैं।

इमाम हसन अस्करी (अ) से एक रिवायत में है कि चेहलुम के दिन इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत करना मोमिन की निशानों में से है। इमाम हसन अस्करी (अ) ने फ़रमायाः पाँच चीज़ें मोमिन की निशानियों में से हैं, 51 रकअत नमाज़ वाजिब और मुस्तहेब पढ़ना, अरबईन (चेहलुम) की ज़ियारत, दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना मिट्टी पर सजदा करना और तेज़ आवाज़ में बिसमिल्लाह पढ़ना। (1)

 

चेहलुम के दिन इमाम हुसैन (अ) की विशेष ज़ियारत पढ़ने की दलीलों में से एक दलील तो यह है कि इसी दिन इमाम हुसैन (अ) का पवित्र सर आपके शरीर के साथ दफ़्न किया गया सैय्यद मुर्तज़ा ने अपने कुछ मसअलों में फ़रमायाः इमाम हुसैन (अ) का पवित्र सर शाम से कर्बला वापस आया और इमाम हुसैन (अ) के शरीर से मिलाया गया। शेख़ तूसी ने फ़रमायाः ज़ियारते अरबईन उसी से है।

 

चेहलुम के पहले श्रद्धालु कौन थे?

 

कुछ लेखों में आया है कि इमाम हुसैन (अ) के पहले श्रद्धालु जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी थे जो पैगम़्बरे इस्लाम (स) के महान सहाबी थे जो अतिया के साथ इमाम हुसैन (अ) की शहादत के चालीसवें दिन कर्बला आये और आपकी ज़ियारत की।

عَنْ عَطِیَّةَ الْعَوْفِیِّ قَالَ : خَرَجْتُ مَعَ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْأَنْصَارِیِّ زَائِرَیْنِ قَبْرَ الْحُسَیْنِ بْنِ عَلِیِّ بْنِ أَبِی طَالِبٍ علیهماالسلام فَلَمَّا وَرَدْنَا کَرْبَلَاء.. (2)

अतिया बिन सअद बिन जनादा अल औफ़ी अपने युग के महान ज्ञानियों में से हैं कि जिनके बारे में कहा गया है कि انه أول من زار الحسین علیه السلام مع جابر الأنصاری .» वह पहले व्यक्ति है जिन्होंने जाबिर के साथ इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत की।

 

अतिया औफ़ी कहते हैः जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी के साथ इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत के लिये बाहर निकले, जब हम कर्बला पहुँचे जाबिर फ़ुरात के किनारे पहुँचे और वहां ग़ुस्ल किया, उसके बाद एक लुंगी बांधी और एक कपड़ा अपने कांधे पर डाला, और एक थैला निकाला और कुछ मात्रा में काफ़ूर स्वंय पर डाला। उसके बाद ईश्वर का पाठ करते हुए क़ब्र की तरफ़ चल पड़े और जब क़ब्र के पास पहुँचे तो कहाः मेरे हाथ को क़ब्र पर रख दो, मैंने उनके हाथ को क़ब्र पर रख दिया और वह बेहोश हो गये। मैंने उनके चेहरे पर पानी डाला और वह होश में आ गये। उसके बाद कहाः या हुसैन, और तीन बार इस शब्द को दोहराया और उसके बाद कहाः दोस्त क्या दोस्त का जवाब नहीं देता है? फिर कहाः तुम मुझे कैसे उत्तर दोगे जब कि तुम्हारा सर तुम्हारे शरीर से अलग कर दिया गया, और तुम्हारी रगों को उन्होंने काट दिया है, मैं गवाही देता हूँ कि तुम पैग़म्बरों के बेटे हो और मोमिनों के सरदारों की संतान हो। हे हुसैन आप तक़वे और वादा निभाने वाले थे, और मार्गदर्शन की जड़ समझे जाते थे, तुम किसा के पांचवे सदस्य हो, तुम सैय्यदे नुक़बा के बेटे हो तुम फ़ातेमा ज़हरा की औलाद हो...

 

इसी प्रकार किताबों में है कि अहलेबैते अतहार भी पहले चेहलुम को इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिये कर्बला पहुँचे, अगरचे इस बारे में कि यह लोग पहले चेहलुम को कर्बला पहुँचे हैं या उसके बाद के सालों में मतभेद पाया जाता है, लेकिन महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि अरबईन की ज़ियारत की परंपरा को अहलेबैत ने जीवित किया है और इन्ही का अनुसरण करते हुए शिया हर साल आपकी ज़ियारत करने के लिये दुनिया के कोने कोने से कर्बला पहुँचते हैं।

 

एक दूसरी रिवायत में आया है कि अब्दुल्लाह हर्र जअफ़ी जिसने कर्बला में इमाम हुसैन (अ) की सहायता नहीं की थी, उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद से मिलने के बाद कर्बला की तरफ़ चले और वहां इमाम हुसैन (अ) के लिये नौहा पढ़ा।

 

शहीदों की मज़ारों पर पहला कूफ़ी श्रद्धालु

उबैदुल्लाह बिन हर्र कूफ़े से निकला और कर्बला की तरफ़ चल पड़ा और उसने यह शेर पढ़ेः

 

یقول امیر قادر و ابن غادر

الا کنت قاتلت الحسین بن فاطمه

 

و نفسی علی خذلانه واعتزاله

و بیعة هذا الناکث العهد لائمه

 

فیا ندمی ان لا اکون نصرته

الاکل نفس لاتسدد نادمه

 

و انی لانی لم اکن من حماته

لذو حسرة ما ان تفارق لازمه

 

-    धोखेबाज़ कमांडर, और धोखेबाज़ का बेटा मुझसे कहता है कि तूने उस शहीद (फ़ातेमा के बेटे) से युद्ध नहीं किया?! हां मैं लज्जित हूँ कि क्यों उनकी सहायता नहीं कि, बल्कि हर वह व्यक्ति (समय पर) तौफ़ीक़ न पाय उसको पछतावा होगा।

-    मैं इस बात से कि उनके साथियों में से नहीं था अपने अंदर एक पछतावे का आभास करता हूँ जो कभी भी मुझसे अलग नहीं होगा।

-    ईश्वर उन लोगों की आत्मा को जिन्होंने उनकी सहायता के लिये कमर कस ली है (अपनी रहमत की) बारिश से सदैव तृप्त करे।

-    (अब) जब कि क़ब्रों और उनके स्थानों पर खड़ा हूँ मेरे आँसू बह रहे हैं और क़रीब है कि मेरा कलेजा फट जाए। (3)

 

आशूरा के साथ साथ

अरबईन की ज़ियारत का राज़ के तौर पर जिसको देखा जा सकता है वह इसका हुसैनी क्रांति के साथ होना है। शियों का इस दिन के लिये विशेष सम्मान और दूसरी बहुत सी चीज़ें इसी बात को दिखाते हैं। यह कि मासूमों ने जाबिर के इस कार्य की सराहना की है और एक रिवायत के अनुसार स्वंय अहलेबैत भी चेहलुम के दिन आपकी जियारत के लिये गये और दूसरी तरफ़ इमाम सादिक़ (अ) से चेहलुम के दिन के लिये विशेष ज़ियारत यह सब आशूरा के बाक़ी रहने में अरबई और चेहलुम के विशेष किरदार को बयान कर रहे हैं।

 

शियों के बीच चेहलुम का महत्व

 

शियों के बीच पुराने ज़माने से ही चेहलुम का महत्व रहा है और इमाम हुसैन (अ) के वाफ़ादारों के एतिहासिक कलैंडर में यह सदैव से जाना पहचाना रहा है। शेख़ तूसी की मिस्बाहुल मुजतहिद नामक पुस्तक जो शेख़ तूसी द्वारा शियों की ख़ुशी, ग़म रोज़ा और इबादत की तारीख़ के बारे में एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब है में सफ़रमहीने के अंतर्गत आप लिखते हैं:

 

इस महीने का पहला दिन (121 हिजरी से) ज़ैद बिन अली बिन हुसैन की शहादत का दिन है।

इस महीने का तीसरा दिन 64 हिजरी में वह दिन है कि जब मुसलिम बिन अक़बा ने काबे के पर्दे को आग लगाई और उसकी दीवारों पर पत्थर बरसाए, जब कि वह यज़ीद बिन उबैदुल्लाह बिन ज़ुबैर के उत्तराधिकारी के तौर पर जंग कर रहा था।

 

बीस सफ़र (यानी चेहलुम का दिन) वह दिन है कि जब हरमे इमाम हुसैन (अ) यानी बंदियों का क़ाफ़िला शाम से मदीने की तरफ़ चला है। और यह वह दिन है कि जब जाबिर बिन अब्दुल्लाह बिन हराम अंसारी, पैग़म्बर के सहाबी, मदीने से कर्बला पहुँचे ताकि इमाम हुसैन (अ) की क़ब्र की ज़ियारत कर सकें और वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने लोगों में आपकी क़ब्र की ज़ियारत की है।

 

इस दिन इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत मुस्तहेब है और यह ज़ियारत, अरबईन की ज़ियारत है जो इमाम हसन अस्करी (अ) से रिवायत हुई है कि आपने फ़रमायाः मोमिन की पाँच निशानियां है: 51 रकअत नमाज़ पढ़ना, दाहिने हाथ में अंगूठी पहनना, माथे लर सजदे का निशान और नमाज़ में बिस्मिल्लाह का तेज़ पढ़ना...

उसके बाद शेख़ तूसी ज़ियारते अरबई को इमाम सादिक़ (अ) से बयान करते हैं

 السلام علی ولی الله و حبیبه‌، السلام علی خلیل الله ونجیبه‌، السلام علی صفی الله و ابن صفیه‌...

 

यह वह चीज़ है जिसको महान विश्वसनीय और सम्मानीय धर्मगुरू और ज्ञानी शेख़ तूसी ने 5वीं शताब्दी में अरबईन के बारे में लिखा है। जो यह दिखाता है कि यह दिन यानी अरबईन सदैव से ही शियों के यहां विशेष स्थान रखता रहा है और यह उसके आरम्भ से ही है और शियों को जब भी संभव हुआ है इस दिन इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिये कर्बला पहुँचे हैं  और यह परंपरा आज तक अपनी पूरी शक्ति के साथ बाक़ी है और दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है कि आज लाख़ों की संख्या में श्रद्धालु इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत के लिये चेहलुम के अवसर पर इराक़ के पवित्र शरह कर्बला पहुँचते हैं।

 

********

(1)    तहज़ीबुल अहकाम, जिल्द 6, पेज 52,

(2)    बिहारुल अनवार, जिल्द 68 पेज 130 हदीस 62

(3)    अलकामिल फ़ित्तारीख़ जिल्द 4, पेज 288 और 289, वक़अतुत तफ़, पेज 277

 

सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

 

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