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Monday 24th of February 2020
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किताब बढ़ने की आदत

 

बहुत से एसे लोग हैं जो घंटों व्यायाम करते हैं और अपने शरीर के विभिन्न अंगों को मज़बूत व कठोर बनाने का प्रयास करते हैं। शरीर को स्वस्थ रखने में व्यायाम के बहुत लाभ हैं यहां तक कि बुढापे में भी व्यायाम के बहुत से लाभ हैं तथा दिल और स्नायुतंत्र की बीमारियों को कम करने में प्रभावी भूमिका निभाता है परंतु दिमाग के संदर्भ में क्या है? क्या उसका भी अभ्यास किया जा सकता है? क्या दिमाग़ के व्यायाम से इंसान के बुढापे में सहायता मिलती है? विशेषज्ञों का मानना है कि दिमाग़ का भी व्यायाम है और उसे अंजाम देने से बुढापे में सहायता मिल सकती है? जिस तरह व्यायाम करने के लिए कलब जाना ज़रूरी नहीं है और इंसान अपने घर में व्यायाम कर सकता है उसी तरह से दिमाग़ के बारे में बहुत से व्यायाम हैं और उन्हें किसी विशेष खर्च के बिना अंजाम दिया जा सकता है बल्कि एक छोटी सी पुस्तक उठाकर इस व्यायाम को अंजाम दिया जा सकता है। अभी भी जल्दी ही neuroulogy की पत्रिका में एक शोध के परिणाम प्रकाशित हुए हैं जो इस बात के सूचक हैं कि किताब पढ़ने, लिखने और दूसरे ज़ेहनी कार्य करने से दिमाग़ को तेज़ रखा जा सकता है और बुढापे में स्मरण शक्ति को कमज़ोर होने से रोका जा सकता है।

 

इस बात में कोई अंतर नहीं है कि यह कार्य किस आयु में किया गया है। महत्वपूर्ण यह है कि यह कार्य किया जाये और स्मरण शक्ति को मज़बूत करने वाले समस्त कार्य अंजाम दिये जायें। इस शोध के लिए २९४ व्यक्तियों को चुना गया और ६ वर्षों तक विभिन्न कार्यों द्वारा दिमाग़ी शक्ति का परीक्षण किया गया। इस अवधि के अंदर उन लोगों के दिमागों का भी सूक्ष्म परीक्षण किया गया जिनका इस अवधि में देहान्त हो गया था। इस परीक्षण से शोधकर्ता इस परिणाम पर पहुंचे कि जो व्यक्ति कोई ज़ेहनी कार्य करता है उसका दिमाग़ उन लोगों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित रहता है जो कोई ज़ेहनी कार्य नहीं करता है चाहे वह कार्य किताब का पढ़ना हो या लिखने आदि का।

 

इस प्रकार उस व्यक्ति को, जो किताब पढ़ता हो/ किताब न पढ़ने वालों की अपेक्षा ३२ प्रतिशत दिमाग़ कम होने की समस्या का सामना होगा। जो लोग किताब पढ़ने या लिखने की गतिविधियां नहीं करते हैं उनमें उन लोगों की अपेक्षा जो किताब पढते हैं या लिखने का कार्य करते हैं, ४८ प्रतिशत अधिक दिमाग़ी समस्याओं का सामना होता है। रोचक बिन्दु यह है कि समाज में बहुत से लोग एसे हैं जो किताब पढ़ने की आवश्यकता का ही आभास नहीं करते हैं और वह यह सोचते हैं कि दिन भर के काम काज के बाद एक सीरियल या फिल्म देखने से थकावट दूर हो जायेगी। यह दृष्टिकोण किसी सीमा तक सही हो सकता है परंतु यह बात नहीं भूलना चाहिये कि जिस सीमा तक किताब पढ़ने या लिखने से दिमाग़ सक्रिय रहता है उस सीमा तक दूसरी चीज़ें दिमाग़ को सक्रिय नहीं कर सकतीं।

 

कुछ समय पहले कनाडा में किताब पढ़ने से संबंधित एक कार्यक्रम आयोजित हुआ और उससे जो परिणाम प्राप्त हुए वह इस बात का सूचक है कि अध्ययन का शरीर के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव है। इस प्रकार से कि ६ मिनट के अध्ययन से ६० प्रतिशत टेन्शन कम हो जाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति किताब का अध्ययन करता है उसके दिल की धड़कन व्यवस्थित होती है और किताब का अध्ययन तनाव को कम करता है।

 

शोधकर्ता एक अन्य रोचक परिमाम पर पहुंचे हैं और वह परिणाम यह है कि अध्ययन दूसरी गतिविधियों की अपेक्षा तनाव अधिक कम करता है। उदाहरण स्वरूप अध्ययन संगीत सुनने की अपेक्षा तनाव को कम करने में ६८ प्रतिशत अधिक प्रभावी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि तनाव को कम करने के लिए चाय पीने से अध्ययन करना शत प्रतिशत प्रभावी है और जो लोग वीडियो या कम्प्यूटर गेम्स पर अध्ययन को प्राथमिकता देते हैं वे ६०० प्रतिशत अधिक सफल हैं और वे अपने तनाव को अधिक नियंत्रित कर सकते हैं। इसी प्रकार जो लोग किताब पढते हैं उन पर किये गये अध्ययन इस बात के सूचक हैं कि किताब पढ़ने वालों का स्वास्थ्य किताब और ग़ैर किताब न पढ़ने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा बेहतर रहता है। आंकड़े इस बात के सूचक हैं कि जो लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमेशा भाग लेते हैं उनका स्वास्थ्य उन लोगों की अपेक्षा बेहतर रहता है जो लोग इस प्रकार के कार्यक्रमों में भाग नहीं लेते हैं। कोई सांस्कृतिक कार्य करना जैसे कोई किताब लिखना, कला से संबंधित कोई कार्य करना, पुस्तकालय या संग्रहालय जाने से शरीर के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में २० से  ४० प्रतिशत सहायता मिलती है। इसी प्रकार शोध दर्शाते हैं कि जिन लोगों को किताब पढ़ने में आनंद प्राप्त होता है किताब न पढ़ने वालों की अपेक्षा उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में ३३ प्रतिशत अधिक सहायता मिलती है। 

 

आज सूचना और टेक्नालोजी का दौर है लोगों को कोई विशेष परिश्रम के बिना ही नाना प्रकार की सूचनाएं मिल जाती हैं परंतु बच्चों और नवजवानों की स्थिति दूसरों से अधिक संवेदनशील है क्योंकि बच्चे किसी न किसी चीज़ जैसे कम्प्यूटर गेम्स या मोबाइल जैसी चीज़ों में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें सोचने का भी अवसर नहीं मिलता। दूसरे शब्दों में वैचारिक स्वतंत्रता की संभावना कम हो गयी है। आज का बच्चा आधुनिक चीज़ों में इतना अधिक व्यस्त हो गया है कि वह दूसरों के साथ लेन- देन और उठने -बैठने जैसी चीज़ों को बहुत कम सीख पाता है बहुत से बच्चे वर्तमान समय की चीज़ों में इतना अधिक व्यस्त हो गये हैं कि वे इस बात को जानते ही नहीं हैं कि दूसरों के साथ उठा बैठा कैसे जाता है और सामाजिक मूल्य क्या हैं। आज का बच्चा बहुत जल्द बच्चों की दुनिया से बाहर निकल जाता है और वह संचार माध्यमों और कम्प्यूटर की दुनिया से परिचित हो जाता है और किताब पढ़ने को न केवल कोई महत्व नहीं देता है बल्कि किताब पढने को समय नष्ट करना समझता है और कम्प्यूटर गेम्स आदि ने बच्चों को नशेड़ी जैसा बना दिया है कि वे खाना खाना या स्कूल जाना छोड़ सकते हैं परंतु समय पर फिल्मी सीरियल या कम्प्यूटर गेम्स खेलना नहीं भूलते। यही नहीं जो बच्चे कम्प्यूट गेम्स के आदि हो गये हैं उनका पढ़ाई में कोई विशेष मन भी नहीं लगता है और देर से स्कूल जाने या स्कूल छूट जाने को वे कोई विशेष महत्व नहीं देते हैं।

 

किताब पढ़ना एक एसी आदत है जिसके लाभों की गणना नहीं की जा सकती। अतः छोटे बड़े सबको विशेषकर बच्चों को किताब पढ़ने की आदत डालनी चाहिये। जिस व्यक्ति या बच्चे ने किताब पढने की आदत डाल ली उसने स्वयं को नाना प्रकार की बुराइयों से बचा लिया। किताब पढ़ने वाले का आत्म विश्वास किताब न पढने वाले की अपेक्षा अधिक होता है। जिसने किताब पढ़ने की आदत डाल ली मानो उसने स्वयं को ज्ञान में वृद्धि के स्रोत से जोड़ लिया। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल जाता है और अपनी इच्छाओं को वह अधिक तार्किक बना लेता है। जो व्यक्ति अध्ययन करता है वह अपनी समस्याओं का समाधान अधिक उत्तम ढंग से कर सकता है। इसी कारण जो व्यक्ति किताब पढता है वह दूसरों की अपेक्षा अधिक बेहतर ढंग से जीवन व्यतीत करता है।

 

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अध्ययन व किताब पढना आत्मा का भोजन है। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि यह बात अपनी जगह  पर सही है कि अध्ययन आत्मा का भोजन है परंतु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि आत्मा कहीं कुपोषण का शिकार न हो जाये। यानी उन चीजों को पढना चाहिये जो लाभदायक हों। अगर कोई यह चाहता है कि उसका बेटा या बेटी किताब पढ़ने वाली हो तो उसे चाहिये कि जब बच्चा मां के गर्भ में हो तभी से किताब पढ़ने का काम आरंभ कर देना चाहिये। जो बच्चा मां के गर्भ में है वह पच्चीसवें सप्ताह से सुनने लगता है और आराम एवं शांतिपूर्ण वातावरण में मां के गर्भ में रहने वाले बच्चे के लिए किताब पढ़ना चाहिये। बहुत से अध्ययन कर्ताओं का मानना है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तो अगर उसी समय से किताब पढ़ना आरंभ कर दिया जाये तो बच्चे के अधिक बुद्धिमान व प्रखर होने में बहुत प्रभावी है। बच्चों के लिए एसी किताबों का चयन करना चाहिये जो बच्चों में जिज्ञासा की भावना को प्रोत्साहित करने का कारण बनें।

 

कभी कभी बच्चों में एसी आदतें होती हैं जिनका सुधारना बहुत मुश्किल होता है परंतु अगर वही बातें किताबों के माध्यम से परोक्षरूप से बच्चे के कानों तक पहुंच जायें तो बच्चे में सुधार सरल है। बेहतर यह है कि माता- पिता बच्चों के लिए एसी पुस्तकों का चयन करें जो उनकी आयु के अनुसार हों या कम से कम जब बच्चे स्वयं अपने लिए किताबों का चयन करें तो माता पिता को चाहिये कि वे उनके चयन पर नज़र रखें। हमने कहा कि एसा कार्य किया जाना चाहिये जिससे किताब पढ़ने की रूचि बच्चे में बचपने से पैदा हो और किताब का अध्ययन उसके जीवन की आवश्यकता में परिवर्तित हो जाये। अतः पहले चरण में माता- पिता और शिक्षकों को चाहिये कि वे बच्चों की क्षमताओं को निखारने में अपने दायित्वों का निर्वाह करें। माता- पिता और अभिभावक को यह बात समझनी चाहिये कि अगर बच्चे में किताब पढ़ने की आदत डाल दी गयी तो परोक्ष रूप से वे बहुत सी चीज़ों की शिक्षा बच्चे को दे सकते हैं दूसरे शब्दों में बहुत सी चीज़ों को माता पिता को कहना ही नहीं पड़ेगा और किताब के अध्ययन से बच्चा बहुत सी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है।

 

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