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Monday 18th of March 2019
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नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार ८

 

हमने इमाम और इमामत की विशेषताओं के बारे में चर्चा की थी आज भी हम उसी विषय पर चर्चा जारी रखेंगे। कृपया हमारे साथ रहें।

पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन का अंतिम समय था उस समय उन्होंने फरमायामैं तुम्हारे बीच दो क़ीमतें व मूल्यवान चीज़ें छोड़कर जा रहा हूं अगर तुम लोग इन दोनों से जुड़े रहे तो कभी भी गुमराह नहीं होगे जान लो कि सर्वज्ञाता ईश्वर ने मुझे खबर दी है कि यह दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि यह दोनों प्रलय के दिन मेरे पास हौज़ पर आयेंगे

 

पैग़म्बरे इस्लाम की यह हदीस अर्थात कथन हदीसे सकलैन के नाम से प्रसिद्ध है। यह हदीस पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की सत्यता के प्रमाणों में से है। यह हदीस इस बात की स्पष्ट प्रमाण है कि अगर कोई इंसान सीधा रास्ता पाना चाहता है और यह चाहता है कि वह प्रलय के दिन पैग़म्बरे इस्लाम से हौज़े कौसर पर मुलाक़ात करे तो उसे चाहिये कि वह इन दोनों का अनुसरण करे और यह दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि बहुत से इंसान एसे हैं जिन्होंने कुरआन को ले लिया है और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को छोड़ दिया है और वे समझते हैं कि सीधे रास्ते हैं जबकि वे गुमराह हैं क्योंकि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की हदीस पर अमल नहीं किया है। इसी तरह कुछ एसे भी इंसान हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अनुसरण का दावा करते हैं और वे पवित्र कुरआन को कोई विशेष महत्व नहीं देते एसे लोग भी सीधे रास्ते से भटक गये हैं। सही रास्ते पर केवल वही लोग हैं जो पवित्र कुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को पकड़ लिये हैं और उनके बताये रास्ते पर अमल करते हैं। इन दोनों में से जो भी किसी एक को छोड़ दे और दूसरे को पकड़ ले वह सीधे रास्ते पर नहीं है अद्यपि वह इस बात की कल्पना करता हो कि वह सीधे रास्ते पर है परंतु वास्तविकता यह है कि वह सीधे रास्ते पर नहीं है।

 

पवित्र कुरआन मनुष्यों के मार्गदर्शन की किताब व प्रकाश है। जो लोग अंधकार में जीवन व्यतीत कर रहे हैं वे इस ईश्वरीय ग्रन्थ से प्रकाश लेकर अपने जीवन को प्रकाशमयी बना सकते हैं परंतु पवित्र कुरआन की आयतों से लोग अलग अलग निष्कर्ष निकालते हैं और कुछ लोग उसकी आयतों से ग़लत निष्कर्ष निकालने के कारण गुमराह हो गये हैं। प्रश्न यह उठता है कि पवित्र कुरआन की आयतों का सही अर्थ व मतलब समझने के लिए क्या करना चाहिये? इसका उत्तर यह है कि पवित्र कुरआन की आयतों के सही अर्थ को समझने के लिए उन लोगों के कथनों को पढ़ना चाहिये जिन्हें महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन का शिक्षक बनाया है। निः संदेह पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन ही पवित्र कुरआन के सही व्याख्याकर्ता हैं। वे समूचे कुरआन की हर आयत के वास्तविक अर्थों व रहस्यों से पूर्णतः अवगत हैं। वे एक क्षण के लिए भी पवित्र कुरआन से अलग नहीं होंगे और संपूर्ण कुरआन का ज्ञान उनके सीनों में है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें क़ीमती चीज़ की संज्ञा दी है और समस्त लोगों का आह्वान किया है कि वे उनका अनुसरण व अनुपालन करें क्योंकि वे कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे और वही व्यक्ति सीधे रास्ते पर होगा जो इन दोनों को पकड़ लेगा जिसने भी इन दोनों में से किसी एक को छोड़ा वह सीधे रास्ते से भटक गया।

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण नम्बर ८६ में एक एसे गुट का वर्णन करते हैं जो स्वयं को विद्वान समझता है जबकि वास्तविकता इस प्रकार नहीं है। यह गुट पवित्र कुरआन की व्याख्या अपनी राय के अनुसार करता है और अपनी इच्छाओं को सत्य की आड़ में पेश करता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम का परिचय पथप्रदर्शक चेराग़ से करते और फरमाते हैंहे लोगो! कहां जा रहे हो? क्यों हक़ व सत्य से मुंह मोड़ रहे हो? क्यों परेशान हो? जबकि मार्गदर्शन की पताका लहरा रही है ईश्वरीय आयतें व निशानियां स्पष्ट और मार्गदर्शन के चेराग़ प्रज्वलित हैं पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन तुम्हारे मध्य हैं वे सच्चे पथप्रदर्शक, धर्म के मार्गदर्शक और वास्तविकता व सच्चाई बयान करने वाले हैं। तो पैग़म्बर के परिजनों को कुरआन में सबसे उच्च स्थान पर पाओगे और जिस तरह प्यासे पानी की ओर जाते हैं उस तरह तुम उनके अस्तित्व से लाभ उठाओ

 

वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उस व्यक्ति को लोगों का मार्गदर्शन करना चाहिये जो हर पहलु से सबसे अधिक योग्य व श्रेष्ठ हो और ईश्वरीय ग्रंथ पवित्र कुरआन से सबसे अधिक अवगत हो। पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन ईश्वरीय धर्म इस्लाम और उसके आदेशों के वास्तविक रक्षक हैं। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार इमाम केवल समाज का शासक व प्रबंधक नहीं होता बल्कि वह पैग़म्बरे इस्लाम की परम्परा को जारी रखता है और उनकी शिक्षाओं को समय व स्थान के अनुसार लागू करता है। इमामों का प्रशिक्षण वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश उतरने और पवित्रता के केन्द्र में हुआ है। महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के सूरे अहज़ाब की ३३वीं आयत में स्पष्ट शब्दों में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों की पवित्रता की ओर संकेत किया है और कहा है कि अहले बैत अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन हर प्रकार की अपवित्रता से पवित्र व दूर हैं।

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम सच्चे इमामों की विशेषता बयान करते हुए नहजुल बलाग़ा के भाषण नम्बर १५२ में कहते हैंबेशक सच्चे इमाम ईश्वर की ओर से लोगों के मार्गदर्शक हैं वे ईश्वर के आदेशों से अवगत और बंदों के लिए उसके प्रतिनिधि हैं। कोई भी स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता मगर यह कि वह इमामों को पहचाने और इमाम उसे पहचानें। कोई नरक में नहीं जायेगा मगर यह कि वह नगर का इंकार करने वाला हो और इमाम भी उसके धर्म और ईमान को स्वीकार न करें

इस आधार पर जो व्यक्ति सफल होना और यह चाहता है कि वह स्वर्ग में जाये तथा वहां की अनुकंपाओं से लाभान्वित हो उसे चाहिये कि वह इमामों को अपने जीवन का आदर्श व उदाहरण बनाये और समस्त जीवन में उनका अनुसरण करे।

 

हज़रत अली अलैहिस्लाम इस बारे में नहजुल बलाग़ा के भाषण नंबर ९७ में फरमाते हैंअपने पैग़म्बर के परिजनों को देखो वे जिधर जाते हैं उधर जाओ उनके पद चिन्हों पर चलो कि कदापि तुम सच्चे मार्ग से न तो हटोगे और न ही बर्बाद होगे

इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम लोगों को नसीहत करते हुए फरमाते हैंअगर इमाम चुप रहें तो तुम भी चुप रहो और अगर इमाम आंदोलन करें तो तुम भी आंदोलन करो उनसे आगे न बढ़ो नहीं तो गुमराह हो जाओगे और उनसे पीछे भी न रह जाओ नहीं तो मिट जाओगे

 

पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का ज्ञान इतना अधिक है कि उनके शत्रुओं ने भी इसे स्वीकार किया है और यह एसी वास्तविकता है जिसका इंकार नहीं किया जा सकता। हज़रत अली अलैहिस्सलाम लोगों के मध्य अपने एक भाषण में अथाह ज्ञान के सागर की ओर जिसका स्रोत ईश्वर का असीमित ज्ञान है, करते और फरमाते हैंहे लोगो मुझसे पूछो इससे पहले कि मैं तुम्हारे बीच न रहूं जान लो कि ईश्वर की सौगन्ध अगर मुझे एक स्थान पर बिठा दिया जाये तो मैं तौरात के मानने वालों का निर्णय तौरात के अनुसार, ईसाईयों का निर्णय इंजील के अनुसार और ज़बूर को मानने वालों का निर्णय ज़बूर के अनुसार और फुरक़ान अर्थात कुरआन के मानने वालों का निर्णय कुरआन के अनुसार करूंगा इस प्रकार से कि वे सबके सब कहेंगे कि पालनहार! अली ने वैसा ही फैसला किया जैसा तूने फरमाया था। ईश्वर की सौगन्द जो लोग कुरआन से अवगत होने का दावा कर रहे हैं मैं उन सबसे कुरआन और उसकी वास्तविकताओं से अधिक अवगत हूं! मुझसे पूछो इससे पहले कि तुम मुझे खो दो सौगन्द उस ईश्वर की जिसने दाना चीरा और सृष्टियों की रचना की अगर कुरआन की किसी आयत के बारे में मुझसे सवाल करो तो मैं तुम्हें बताऊंगा कि यह आयत किस समय और कहां उतरी और किसके बारे में है कौन सी आयत का क्या अर्थ है कौन सी आयत मक्की और कौन सी मदनी है मैं सब जानता हूं। ईश्वर की सौगन्द कोई गुट एसा नहीं है जो गुमराह हो जाये या उसका मार्गदर्शन हो जाये मगर यह कि उसके मार्गदर्शक को या जो लोगों को उकसाता है और लोगों को प्रलय तक बुलाने वाले सबको पहचानता हूंहज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण नमंबर १७ में लोगों से उन लोगों का परिचय कराते हुए, जो विदित में विद्वान हैं, फरमाते हैंईश्वर के निकट सबसे घृणित दो लोग हैं एक वह है जिसे ईश्वर ने उसे उसकी हाल पर छोड़ दिया है तो वह सीधे रास्ते से भटक गया है और झूठी व बनावटी बातों से दिल लगा बैठा है और लोगों को गुमराही की ओर आमंत्रित करता है। दूसरा वह व्यक्ति है जो जिन चीज़ों को नहीं जानता है उसने उन सबको मिश्रित कर रखा है और धूर्तता व पाखंड से अज्ञानी लोगों के मध्य आगे बढ़ता है फितना, फसाद और बुराई में जल्दी करता है शांति के लाभों व फाएदों को नहीं देखता। इंसान दिखाई देने वाले लोग उसे विद्वान समझते हैं जबकि उसे ज्ञान नहीं है

 

सत्य बोलना और सत्य का साथ देना मनुष्य का महत्वपूर्ण दायित्व है। इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार हर इंसान का महत्व व मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस सीमा तक सत्य के मापदंडों से समन्वित है। बहुत से लोग सत्य का दावा करते हैं और स्वयं को उसका पक्षधर बताते हैं परंतु जब उनके हित खतरे में पड़ जाते हैं तो वे बड़ी सरलता से हक व सत्य के विरुद्ध हो जाते हैं और वे हक़ के मुकाबले में खड़े हो जाते हैं परंतु पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों ने कभी भी इस प्रकार का जीवन व्यतीत नहीं किया।

 

निः संदेह पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन सदैव सत्य के साथ थे और इसका कारण यह था कि वे सत्य की सूक्ष्म पहचान रखते थे बल्कि वे सत्य व सच्चाई की प्रतिमूर्ति  थे और जो भी उनके मुकाबले में आया वह नाहक़ व असत्य था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस वास्तविकता को स्पष्ट करते हुए अपने भाषण नंबर २३९ में फरमाते हैंपैग़म्बर के परिजन ज्ञान के स्रोत और अज्ञानता को मिटाने वाले हैं उनकी विन्रमता तुम्हें ज्ञान प्रदान करने वाली है और उनका विदित तुम्हें उनकी आंतरिक पवित्रता से और उनका मौन तुम्हें उनकी तत्वदर्शिता से अवगत करेगा। वे कदापि सत्य व हक़ का विरोध नहीं करेंगे और उसके बारे में उनमें मतभेद नहीं है।

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