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Friday 22nd of March 2019
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आदर्श जीवन शैली-७

 

किसी भी व्यक्ति की जीवनशैली में एक अन्य महत्वपूर्ण विषय जो निर्णायक भूमिका निभा सकता है, रोज़गार और किसी विशेष व्यवसाय में उसकी व्यस्तता है। रोज़गार, भौतिक लाभ के अतिरिक्त मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी निर्णायक होता है। इस्लामी उचित जीवन शैली में काम और प्रयास को महत्वपूर्ण और आवश्यक तत्व कहा गया है। काम और व्यवसाय मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण तत्व है और इस प्रकार से मनुष्य अपनी शारीरिक व मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करता है। काम और प्रयास की भूमिका मानव जीवन के सभी आयामों में देखी जा सकती है यहां तक कि यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य का काम परोक्ष  व अपरोक्ष रूप से उसके विचारधारा और मानवीय मूल्यों पर भी प्रभाव डालता है।

 

मनुष्य जीवन यापन के लिए, सदैव प्रयास करते रहना होता है। मनोकामनाओं और उद्देश्यों की पूर्ति निरंतर प्रयासों के बिना संभव नहीं है। जो व्यक्ति अथवा राष्ट्र प्रगति की चोटी तक पहुंचना चाहता है और सफलताओं की सीमाओं से पार होना चाहता है उसे विलासता और आलस्य से बचना चाहिए। पूरे इतिहास में मानव सभ्यता, अपनी समस्त विविधताओं और अंतरों के साथ, कुछ एसे लोगों के अनथक प्रयासों का परिणाम है जिन्होंने ईश्वरीय योग्यताओं से लाभ उठाते हुए समाज में अपनी भूमिका निभायी है। इसी प्रकार आकाश में उड़ान तथा अंतरिक्ष पर विजय जैसी वर्तमान प्रगति, विभिन्न असाध्य रोगों का उपचार, आधुनिक राजमार्ग, सुरंग, बड़े बड़े कारखाने, आश्चर्यजनक डिजिटल उपकरण आदि सब कुछ मनुष्य के निरंतर प्रयासों का परिणाम है जिनकी सराहना की जानी चाहिए। यदि मानव जीवन में प्रयास का क्रम रुक जाए तो ठहराव और विनाश की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी। अमरीकी लेखक वेलडोरेन्ट लिखते हैं स्वास्थ्य काम करने में हैं, रोज़गार मानव जीवन में प्रसन्नता का रहस्य है। मेरी दृष्टि में उचित यह है कि ईश्वर स धन व दौलत न मांगें बल्कि हमें काम में सफलता और रोज़गार की प्रार्थना करनी चाहिए।

 

श्रम व प्रयास, खान पान की ही भांति मानव जीवन के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण व आवश्यक है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से काम और प्रयास करने में रूझान रखता है। यदि मनुष्य में परिश्रम और प्रयास की भावना न होती और उसे सब कुछ बिना किसी परिश्रम के मिल जाता तो निश्चित रूप से उसके जीवन में आंनद नगण्य हो जाता और धीरे धीरे उसमें जीने की लालसा का ही नाश हो जाता। पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफरे सादिक अलैहिस्सलाम मनुष्य में काम करने की  स्वस्थ्य मानसिकता और मनोदशा पर उसके प्रभाव की ओर संकेत करते हुए कहते हैं  कि यदि मनुष्य की सभी आवश्यकताएं यूंही पूरी हो जातीं तो उसके लिए जीवन कभी भी मधुर नहीं होता और वह जीवन का आनंद नहीं ले पाता। आप एक एसे व्यक्ति की कल्पना करें जो किसी के यहां अतिथि बन जाए और उसके घर में कुछ दिनों तक रहे और इस प्रकार से रहे कि उसके खान पान की सारी व्यवस्था अति उत्तम रूप से उपलब्ध हो तो निश्चित रूप से कुछ दिनों के बाद वह थक जाएगा और कोई एसा काम अवश्य खोजने लगेगा जिसमें वह व्यस्त हो सके। अब कल्पना करें यदि  किसी व्यक्ति की पूरी आयु में सारी आवश्यकताएं पूरी होती रहें जो उसकी भावनाएं क्या होंगी?

 

     इस आधार पर इमाम जाफरे सादिक अलैहिस्सलाम के कथन के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जीवन में प्रयास और काम करने का महत्व केवल आमदनी के लिए नहीं है बल्कि काम और व्यस्तता, मनुष्य की मानसिक स्थिति को बेहतर और उसमें लाभदायक होने की भावना को प्रबल कर सकती है। इसी लिए यदि भौतिक दृष्टि से कोई आवश्यकता मुक्त हो तो भी उसके लिए काम करना आवश्यक होता है।

 

फ्रासं के प्रसिद्ध लेखक और कवि वाल्टेयर ने कहा है कि जब भी मुझे यह आभास होता है कि दुख व पीड़ा और रोग मेरा अंत करने वाला है मैं काम  की शरण में जाता हूं क्योंकि काम करना मेरे मनोरोग का सर्वश्रेष्ठ उपचार है। इस आधार पर यह कहना चाहिए कि काम करने के जो लाभ हैं वह आंतरिक और बाहरी दोनों हैं। काम के बाहरी लाभ, आमदनी और कमाई तथा उससे जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटाना है जबकि उसके भीतरी लाभ, काम करने की भावना को शांत करना तथा लाभदायक होने की भावना पैदा होना है। यह भावना मनुष्य में आशा की ज्योति जगाए रखती है तथा जीवन से आशा को जो एक महत्वपूर्ण चीज़ है, मन में बाकी रखती है।

प्रश्न यह है कि मनुष्य किस उद्देश्य के अंतर्गत काम और प्रयास करता है? क्या मनुष्य केवल अपनी भौतिक आवश्यकतओं की पूर्ति तथ अच्छे जीवन के लिए ही काम करता है? क्या मनुष्य इस लिए खाता पीता है ताकि वह काम कर सके? या फिर वह इस लिए काम करता है ताकि अच्छा खा सके और सुखदायी जीवन व्यतीत कर सके?

 

व्यवसाय और काम का विषय हर समाज में उस समाज की सोच और मापदंडों के अनुसार अलग अलग होता है और हर मत में मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की परिभाषा भी अलग अलग है। कुछ लोग, एक पक्षीय विचार धारा के अंतर्गत काम और प्रयास को केवल सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन मात्र मानते हैं किंतु कुछ लोग इस संदर्भ में भिन्न विचार धारा रखते हैं। जो इस सृष्टि को भौतिकता से परे भी मानता है वह परिश्रम और काम को भी अधिक विस्तृत रूप में देखता है और उसे उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयोग करता है। इस्लाम की दृष्टि में ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति अपने हर काम में उच्च उद्देश्यों को नज़र में रखता है और वह अपना जीवन ईश्वर को प्रसन्न करने और उसकी उपासना में व्यतीत करता है। इसी भावना के अंतर्गत वह आध्यात्मिक  महानता व उच्च स्थान तक पहुंचता है। इस आधार पर सांसारिक गतिविधियां और संसार से लाभ उठाना उस सीमा तक महत्वपूर्ण है जहां तक वह मनुष्य के लिए कल्याण व परिपूर्णता का मार्ग प्रशस्त करे।

 

इस्लामी विचार धारा में मनुष्य के विचार और उसकी आस्था, मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों तथा उसके अन्य कामों की दिशा निर्धारित करती है इसी लिए इस्लाम में अन्य सभी विषयों की भांति, आर्थिक विषयों पर भी सम्पूर्ण रूप से चर्चा की गयी है और यही कारण है कि इसलाम में व्यवसाय और काम को भी आध्यात्म से जोड़ा गया है। यदि कोई व्यक्ति अपने घरवालों के पालन पोषण के लिए ईश्वर की आज्ञापालन के उद्देश्य से काम करता है तो उसका यह काम करना भी उपासना समझा जाता है और उस पर इसलाम में उसे पुण्य व प्रतिफल दिया जाता है। इस्लाम की दृष्टि में आर्थिक क्षेत्र में वह मनुष्य सराहनीय होता है जो नैतिक मूल्यों की प्रतिबद्धता करता हो और उसका व्यवहार उसकी आतंरिक इच्छाओं के अधीन न हो बल्कि उसकी इच्छाएं नैतिक और धार्मिक मूल्यों और शिक्षाओं के अधीन और उनके अनुसार हों। एक मुसलमान को इस प्रकार होना चाहिए कि जिस प्रकार से ईश्वर ने उस पर कृपा की है और उसे समृद्धता प्रदान की है उसी प्रकार उसे भी अन्य लोगों पर कृपा करना चाहिए। वह भौतिक संपत्ति को सही रूप से प्रयोग करता है और उससे अपने और समाज के कल्याण के लिए लाभ उठाता है।

कुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में विश्व के संसाधनों और भंडारों का उल्लेख करते हुए मनुष्य को भूमि को उपजाउ बनाने तथा अनाज उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है ताकि इस प्रकार स्वयं मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। कुरआने मजीद ने इस प्रकार से काम करने का महत्व भी दर्शाया है। कुरआने मजीद में रात दिन के आवागमन, पवन व वर्षा तथा मनुष्य को धरती व आकाश का स्वामी बनाने का उद्देश्य, ईश्वर की कृपा से अपनी अजीविका की खोज का साधन बताया गया है। कुछ लोगों को यह भ्रांति हो जाती है कि धर्म परायणता और धार्मिक नियमों पर प्रतिबद्धता के साथ काम और व्यवसाय नहीं किया जाता जबकि इस्लाम में सांसारिक मायामोह से दूरी का अर्थ उससे अत्याधिक लगाव न रखना है।

 

धार्मिक विचार धारा में मनुष्य को ईश्वरीय उपहारों और कृपाओं से भरपूर लाभ उठाने का पूरा अधिकार है और उसे उन सभी आंनदों का भी अधिकार है जिसके ईश्वर न उसके लिए बनाया है  किंतु इसके साथ यह ध्यान रखना होता है कि यह सुख भोग और आंनद सही मार्ग से हो और केवल भौतिकता का ही आयाम न लिये हो बल्कि इससे परलोक के लिए भी लाभ उठाया जाए और इसे मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए प्रयोग किया जाए। पैगम्बरे इस्लाम और उनके परिजन भी इसी विचारधारा के अंतर्गत काम व परिश्रम में व्यस्त रहते थे। यही कारण है कि जब कुछ दिखावे के आस्थावान लोग उन्हें खेत में काम करते देखते थे तो उन्हें आपत्ति होती।

इस्लामी इतिहास में आया है कि गर्मियों के एक दिन पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम अपने खेत में काम कर रहे थे। उसी समय मुहम्मद बिन मुनकदिर नाम का एक दिखावे का उपासक उनके पास आया और इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम के माथे से टपकते पसीने और गर्मी से लाल हुए मुख को देख कर कहने लगा क्या यह उचित है कि आप जैसा व्यक्ति सांसारिक कामों के लिए स्वंय को इतने कष्ट में डाले, यदि इसी समय आप की मृत्यु हो जाए तो आप ईश्वर के सामने कैसे जाएंगे? इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम ने अपना काम रोक दिया और एक दीवार पर टेक लगा कर कहने लगे यदि इस दशा में मेरी मृत्यु हो जाए तो मैं बहुत प्रसन्न हो जांउगा क्योंकि मैं ईश्वर की उपासना की दशा में मरूंगा मैं काम न करूं, परिश्रम न करूं ताकि मुझे अपनी जरूरत पूरी करने के लिए तेरे जैसे लोगों को सामने हाथ फैलाना पड़े? 

 इमाम मुहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम की यह बात सुनकर मुहम्मद बिन मुनकदिर लज्जित हो गया और कहने लगाः मैं आप को उपदेश देना चाहता था किंतु आप ने मुझे ही पाठ दे दिया।

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