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Sunday 24th of March 2019
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ईदे ग़दीर

 

धन्य है वह ईश्वर जिसने हमें असंख्य नेअमतें व अनुकंपायें प्रदान की हैं हमारा मार्गदर्शन किया है अगर हमारे पालनहार ने हमारा मार्गदर्शन न किया होता तो हमें सत्य का रास्ता न मिलता। निः संदेह ईश्वरीय संदेशक सत्य लाये हैं। आज ईदे ग़दीर है इस शुभ अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।  

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वरीय धर्म इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए २३ वर्षों तक अनथक प्रयास किया। इस अवधि के दौरान पैग़म्बरे इस्लाम ने बहुत सारी कठिनाइयां सहन कीं और ईश्वरीय दायित्व के निर्वाह से एक क्षण भी निश्चेत नहीं रहे। हिजरी क़मरी का १०वां वर्ष था। ईश्वर की ओर से संदेश आया कि हे पैग़म्बरे आप जल्द ही इस दुनिया से परलोक सिधारने वाले हैं। जैसे ही उन्हें ईश्वरीय संदेश मिला उन्होंने इस्लाम और मुसलमानों की भलाई जिस चीज़ में थी उसे पूरी तरह अंजाम देने का प्रयास किया। पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? यह मामला पैग़म्बरे इस्लाम की एक चिंता थी। क्योंकि वह अंतिम पैग़म्बर थे और उनके बाद कोई पैग़म्बर नहीं आने वाला था। इस आधार पर जो व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी बनता उसे महान ईश्वर का आज्ञापालक होना चाहिये था। उस व्यक्ति को समस्त ईश्वरीय सदगुणों से सम्पन्न व हर प्रकार की दिग्भ्रमिता से दूर होना चाहिये था ताकि वह पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी बनने के योग्य हो सके। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवन के अंतिम हज में महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के आदेश से अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके मुसलमानों को बताया दिया।

 

पैग़म्बरे इस्लाम के पावन जीवन के अंतिम हज में उत्तराधिकारी बनाने की घटना का वर्णन एतिहासिक पुस्तकों में इस प्रकार हुआ है। हज समाप्त होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम पवित्र नगर मदीने की ओर चल पड़े। जब वे राबेग़ नाम की ज़मीन पर पहुंचे जिसे ग़दीरे खुम भी कहा जाता है तो महान ईश्वर के विशेष फरिश्ते हज़रत जीब्राईल ईश्वरीय संदेश लेकर उतरे। वह संदेश इस प्रकार थाहे रसूल उस चीज़ को लोगों तक पहुंचा दीजिये जो ईश्वर की ओर से नाज़िल हुआ है और अगर आपने यह कार्य अंजाम नहीं दिया तो पैग़म्बरी का कोई काम ही अंजाम नहीं दिया

 

पैग़म्बरे इस्लाम इस बात से थोड़ा चिंतित थे कि कुछ लोगों के दिलों में द्वेष है इसलिए उन्होंने थोड़ा विचार किया। पैग़म्बरे इस्लाम विचार ही कर रहे थे कि हज़रत जीब्राईल दोबारा नाज़िल हुए और ईश्वरीय संदेश सुनाया कि अगर आपने इस कार्य को अंजाम नहीं दिया तो आपने पैग़म्बरी का अपने दायित्व का ही निर्वाह नहीं किया और ईश्वर लोगों की क्षति से आपकी रक्षा करेगा। निः संदेह ईश्वर काफिरों व नास्तिकों का मार्गदर्शन नहीं करता हैयहां पर प्रश्न यह उठता है कि आखिर कौन सा संदेश है जिसे न पहुंचाया जाये तो पैग़म्बरी का कार्य ही अंजाम नहीं दिया गया है? निः संदेह आयत के अंदाज़ से ज्ञात होता है कि कोई बहुत ही महत्वपूर्ण संदेश था जिसे पहुंचाने के लिए ईश्वर अपने पैग़म्बर से इस प्रकार बात कर रहा है और अपने पैग़म्बर को विश्वास दिला रहा है कि वह लोगों की बुराई से आपको सुरक्षित रखेगा।

 

यहां पर ईश्वर ने लोगों से जो यह कहा है कि वह लोगों की बुराई से सुरक्षित रखेगा तो इससे शारीरिक व आर्थिक क्षति तात्पर्य नहीं है क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम स्वयं सबसे बहादुर इंसान थे और रणक्षेत्र में कभी लेशमात्र भी नहीं डरे। पैग़म्बरे इस्लाम इस बात से भयभीत व चिंतित थे कि कुछ लोगों से कहीं धर्म को नुकसान न पहुंच जाये। पैग़म्बरे इस्लाम ने महान व सर्वसर्मथ ईश्वर का आदेश व्यवहारिक बनाने के लिए ग़दीरे खुम नामक स्थान पर सभी हाजियों को एकत्रित होने का आदेश दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने आदेश दिया कि जो लोग ग़दीरे खुम से आगे निकल गये हैं उन्हें वापस बुलाया जाये और जो पीछे रह गये हैं उनकी प्रतीक्षा की जाये। पैग़म्बरे इस्लाम के आदेश से ऊंटों के कजावे से मिम्बर अर्थात ऊंची कुर्सी बनाई गयी। जब सब हाजी एकत्रित हो गये तो पैग़म्बरे इस्लाम मिम्बर पर गये और महान ईश्वर का गुणगान किया और फरमाया जीब्राईल अब तक तीन बार उतर चुके हैं और ईश्वर की ओर से मुझे आदेश मिला है कि यहां पर रुक जाऊं और उसकी पैग़म्बरी को पूरा करूं।

 

क्या मैं आप लोगों से अधिक आप पर अधिकार नहीं रखता? सबने उत्तर दिया। जी हां आप हम सब पर हम सबसे से ज्यादा अधिकार रखते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने दोबारा कहा क्या मैं आप लोगों का मार्गदर्शक नहीं हूं? सबने पैग़म्बरे इस्लाम की बात की पुष्टि की। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हाथों को पकड़ा और ऊपर उठाया और फरमाया जिसका जिसका मैं मौला व अभिभावक हूं उसके उसके यह अली मौला हैंइतिहासकारों ने उस समय पैग़म्बरे इस्लाम के पास मौजूद हाजियों की संख्या ८० हज़ार से एक लाख २० हज़ार तक बताई है। इस घटना के बाद सूरे माएदा की आयत नंबर तीन उतरी जिसमें महान ईश्वर कहता हैआज काफिर आपके धर्म से निराश हो गये इस आधार पर आप उनसे न डरें और मेरी अवज्ञा से डरें आज मैंने आपके धर्म को परिपूर्ण कर दिया और अपनी नेअमतों को तुम पर पूरा कर दिया और इस्लाम को आपके धर्म के रूप में स्वीकार कर लियायह महत्वपूर्ण घटना काफिरों के निराश होने का कारण बनी। कुछ लोग पैग़म्बरे इस्लाम के देहांत की प्रतीक्षा में थे ताकि उनके देहांत के बाद अपने षडयंत्रों को व्यवहारिक बनायें परंतु इस घटना ने काफिरों को निराश कर दिया। इस महान घटना ने दर्शा दिया कि इस्लाम की दृष्टि से धार्मिक मार्गदर्शक एसे व्यक्ति को होना चाहिये जो भला, जानकार, प्रबंधक, हितैषी व शुभचिंतक और समस्त ईश्वरीय सदगुणों से सुसज्जित हो।

 

अलबत्ता पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी का मामला इतना महत्वपूर्ण था कि ग़दीरे खुम की घटना से पहले भी विभिन्न अवसरों पर पैग़म्बरे इस्लाम ने उसकी ओर संकेत किया था। दूसरे शब्दों में पैग़म्बरे इस्लाम को जिस दिन से ईश्वरीय धर्म इस्लाम के प्रचार प्रसार का आदेश मिला उसी दिन से महान ईश्वर के आदेश से हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। जब पैग़म्बरे इस्लाम को इस बात का आदेश मिला कि वे अपने कुटुंब को ईश्वरीय धर्म से अवगत करायें तो वहीं पर पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा था कि मेरे बाद अली मेरे उत्तराधिकारी होंगे ईश्वर की सौगन्ध मैं अरब के अंदर किसी को नहीं पहचानता जो कुछ मैं अपनी कौम के लिए लाया हूं वह अपनी क़ौम के लिए उससे बेहतर लाया हो। निः संदेह मैं तुम्हारे लिए लोक परलोक की भलाई लेकर आया हूं। ईश्वर ने मुझे आदेश दिया है कि तुम्हें उसकी ओर बुलाऊं। तो तुम में से जो भी मेरी इस कार्य में सहायता करेगा वह मेरा भाई और मेरा उत्तराधिकारी होगा

 

उसी सभा में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उठकर पैग़म्बरे इस्लाम की सहायता और उनके प्रति अपनी वफादारी की घोषणा की जबकि उस समय हज़रत अली अलैहिस्सलाम नौजवान थे। इस प्रकार पहली सभा में ही पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी का निर्धारण हो गया था इसके बाद भी विभिन्न अवसरों पर पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी के मामले की इस सीमा तक पुनरावृत्ति की गयी कि कहा जा सकता है कि लगभग समस्त लोग पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी से अवगत हो गये थे।

 

ग़दीरे खुम की घटना बहुत प्रसिद्ध है और कोई भी इस महत्वपूर्ण एतिहासिक घटना का इंकार नहीं कर सकता। इस्लामी जगत के महान विद्वान सैयद मुर्तज़ा अलमुल हुदा इस संबंध में लिखते हैंजो इस घटना के सही होने के बारे में तर्क मागे वह उस व्यक्ति की भांति है जो पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन की प्रसिद्ध परिस्थितियों के बारे में प्रमाण पूछे और यह उस तरह है जैसे किसी को पैग़म्बरे इस्लाम के अंतिम हज के बारे में ही संदेह हो। क्योंकि प्रसिद्धि की दृष्टि से ये सब एक समान हैं और सुन्नी विद्वानों ने भी विभिन्न तरीकों से ग़दीरे खुम की घटना को लिखा है। उदाहरण स्वरूप इमाम अहमद हंबल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अलमुस्नद में पैग़म्बरे इस्लाम के एक अनुयाई व साथी ज़ैद बिन अरक़म के हवाले से लिखा है। ज़ैद बिन अरक़म कहते हैं हम पैग़म्बरे इस्लाम के साथ खुम नाम की घाटी में एकत्रित हुए। उन्होंने हम सब को नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया। उस समय हम लोगों ने पैग़म्बरे के साथ दोपहर की नमाज़ पढ़ी। उसके बाद उन्होंने भाषण दिया और लोगों ने वृक्ष पर कपड़े टांग रखे थे ताकि पैग़म्बरे इस्लाम छाया में रहें और कम से कम उन्हें सूरज की गर्मी लग सके। उस समय पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया था कि क्या नहीं जानते हो? क्या गवाही नहीं देते हो कि मैं हर मोमिन से अधिक उस पर अधिकार रखता हूं? सब ने कहा कि हां उस समय पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमायाजिसका मैं मौला व अभिभावक हूं उसके यह अली मौला हैं ईश्वर उसे दोस्त रखे जो अली को दोस्त रखे और उसे दुश्मन रखे जो अली को दुश्मन रखे

 

हाकिमे निशापुरी भी सुन्नी विद्वानों की दो बड़ी किताबें बोखारी और मुस्लिम के हवाले से लिखते हैंजब पैग़म्बरे इस्लाम अपने जीवन के अंतिम हज से लौट रहे थे कि वह ग़दीरे खुम में रुक गये और सबको वृक्ष के नीचे एकत्रित होने का आदेश दिया। उसके बाद फरमाया जल्द ही ईश्वर मुझे बुला लेगा और मैं परलोक सिधार जाऊंगा। निः संदेह मैं तुम्हारे मध्य दो मूल्यवान चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूं कि एक दूसरी से बड़ी है ईश्वरीय किताब और मेरे निकट परिजन तो देखना है कि तुम मेरे बाद इनके साथ कैसा व्यवहार करते हो। बेशक दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होगें यहां तक कि वे दोनों हौज़े कौसर पर मेरे पास आयेंगे। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया ईश्वर मेरा मौला है और मैं हर मोमिन का मौला हूं उसके बाद अली का हाथ पकड़ा और फरमाया जिसका मैं मौला हूं उसके अली मौला हैं ईश्वर उसे दोस्त रखे जो अली को दोस्त रखे और उसे दुश्मन रखे जो अली से दुश्मनी करेतिरमिज़ी, इब्ने माजा, इब्ने असाकिर, इब्ने नईम, इन्बे असीर, खारज़्मी, सिवती, इब्ने हजर, हैसमी, ग़ज़ाली और बुखारी जैसे विद्वानों ने अपनी अपनी किताबों में ग़दीरे खुम की घटना का वर्णन किया है।

 

सुन्नी विद्वान अबू साअद मसऊद बिन नासिर सजिस्तानी ने अपनी किताब अद्देराया फी हदीसिल विलायतमें इस हदीस को पैग़म्बरे इस्लाम के १२० अनुयाइयों के हवाले से लिखा है। इस आधार पर ग़दीरे खुम की हदीस इतनी अधिक प्रसिद्ध है कि कोई भी न तो उसका इंकार कर सकता है और न ही वास्तविकता पर पर्दा डाल सकता है। मिस्री लेखक व अध्ययनकर्ता अब्दुल फत्ताह अब्दुल मकसूद अपनी किताब इमाम अलीमें लिखते हैंनिः संदेह हदीसे ग़दीर एसी वास्तविकता है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता और वह प्रज्वलित दीपक की भांति चमक रही है

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