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Saturday 23rd of March 2019
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नहजुल बलाग़ा पर एक संक्षिप्त निगाह

 

आपने पवित्र पुस्तक नहजुल बलाग़ा के बारे में अवश्य सुना होगा और इस किताब को देखा भी होगा लेकिन नही मालूम कि इस किताब से आप कितने परिचित हैं और इसके बारे में कितना ज्ञान रखते हैं।

नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के कुछ खुतबों, पत्रों और हिकमतों का संग्रह है जिसे आपने अलग अलग स्थानों, मौक़ो और अवसरों पर बयान फरमाया था।

नहजुल बलाग़ा के महत्व के लिए यही काफी है कि इसे क़ुरआने मजीद का भाई कहा गया है इस लिए कि क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा दोनों का रास्ता एक ही है, क़ुरआने करीम का काम भी हिदायत (अनुदेश) और मार्ग दर्शन करना है और नहजुल बलाग़ा का भी।

बल्कि यूँ कहा जाए कि क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा एक दूसरे से अलग नही हो सकते। जैसा कि  रसूले अकरम (स) की हदीस इसी बात को बयान कर रही है कि आप (स) ने फरमाया: अली क़ुरआन के साथ हैं और क़ुरआन अली के साथ है। 

अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जवादी नहजुल बलाग़ा के महत्व और अहमियत की तरफ इशारा करते हुए फरमाते हैं: नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमिनीन (अ) के इरशादात का वह संग्रह (Collection) है जिससे ज़्यादा बुलंदतर (उच्च) सहीफा (पुस्तक) न इससे पहले मुरत्तब (संपादित) हुआ है न इसके बाद होने वाला है। नहजुल बलाग़ा वह पवित्र (Holy) किताब है जिसके मतालिब इलहामे रब्बानी का अतिया हैं तो उसके शब्द (Word) लिसानुल्लाह के तकल्लुम का असर।       

 

नहजुल बलाग़ा का संग्रहित होना

इस किताब के संग्रह कर्ता सैय्यद रज़ी हैं जो सन 359 हिजरी में इराक़ के शहर बग़दाद में पैदा हुए और 6 मुहर्रम सन 406 हिजरी में आपका देहांत हो गया। आप का शुमार शियों के चौथी सदी हिजरी के प्रसिद्ध स्कालर्स में होता है।

अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जवादी, सैय्यद रज़ी के बारे मे फरमाते हैं: किस क़द्र बा बरकत थी सैय्यद रज़ी की ज़िन्दगानी कि 47 साल के अंदर सैकड़ों किताबों का अध्ययन (Study) करके अमीरूल मोमिनीन (अ) के इरशादात का इतना बड़ा ज़खीरा मुरत्तब (संपादित) कर दिया कि आज सारी दुनिया उसे आश्चर्य की नज़र से देख रही है।

खुद सैय्यद रज़ी एक ज़बरदस्त विद्रवान, फक़ीह,  शायर और अदीब थे। आपको अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ) से गहरी मुहब्बत थी आप हज़रत अली (अ) की फसाहत और बलाग़त से भरे कलाम के शैदा थे। यही वजह थी कि आपने हज़रत अली (अ) के बयानों और कथनों को संग्रहित करने में फसाहत और बलाग़त का विशेष ख्याल रखा।

यहाँ इस बात की तरफ इशारा करना ज़रूरी  हुँ कि नहजुल बलाग़ा हज़रत अली (अ) के कुछ बयानों और कथनों का संग्रह है जिसे सैय्यद रज़ी ने जमा किया था। यानि हज़रत की सारी हदीसें और कथन इसमें एकत्र नहीं की गई हैं।  

सैय्यद रज़ी को इस किताब के संग्रह में लगभग 20 साल लग गए। आपने सन 400 हिजरी में इस होली किताब का परिचय करवाया।

तब से अब तक सैकड़ों किताबें और आर्टिकल्स इस पवित्र (Holy) किताब पर लिखे जा चुके हैं और लिखे जा रहे हैं। लेकिन कोई भी इस बात का दावा नही कर सका  है कि उसे इस किताब पर पूरा कमान्ड हासिल हो चुका है और अब लिखने को कुछ नही बचा।

ऐसा नही है कि सिर्फ शियों ने मौला के आश्चर्य जनक वाक्यों और नहजुल बलाग़ा  पर किताबें और आर्टिकल्स लिखे हों बल्कि ग़ैरे शिया और ग़ैरे इस्लामी स्कालर्स ने भी न जाने कितनी किताबें और आर्टिकल्स लिखे हैं। उनमे से कुछ के नाम इस तरह हैं इब्ने अबिल हदीद, शेख मुहम्मद अब्दोह मिस्री, डाक्टर ताहा हुसैन, डाक्टर सबही सालेह, जार्ज जुरदाक़, जार्जी ज़ैदान, जुबरान खलील वग़ैरह वग़ैरह।

बहरहाल सैय्यद रज़ी ने बीस साल की अवधि में हज़रत अली (अ) के जिन बयानों और कथनों को एकत्र किया था उसे तीन भागों में विभाजित करके किताबी शक्ल दे दी जिसकी ताज़गी और नयापन अब तक बाक़ी है और इंशा अल्लाह यह किताब क़्यामत तक बाक़ी और ज़िंदा रहेगी।

नहजुल बलाग़ा का पहला भाग बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस भाग में भाषण और स्पीचेस शामिल हैं जिन्हें मौला ने अलग अलग अवसरों पर बयान फरमाया था जिनको दूसरे लफ्ज़ों में खुतबा  (Sermon) कहा जाता है। इस पवित्र (Holy) किताब में, छोटे बड़े खुतबों को मिलाकर कुल 241 खुतबे पाए जाते हैं। इन खुतबों में विभिन्न विषयों पर डिसकस की गई है चाहे वह दुनियाँ से संबन्धित हों या ग़ैरे दुनिया से, मज़हबी हों या ग़ैरे मज़हबी।

खुतबा नम्बर  192, जो कि खुतब ए क़ासेआ के नाम से प्रसिद्ध है नहजुल बलाग़ा का सबसे बड़ा खुतबा और खुतबा नम्बर 9 सबसे छोटा खुतबा है। 

नहजुल बलाग़ा का दूसरा भाग पत्रों (Letters) का है। जिसे हज़रत अली (अ) ने अलग अलग लोगों को अलग अलग अवसरों पर लिखा था। इनमें जनता और सरकारी लोग, दोनों शामिल हैं। इन पत्रों की कुल संख्या 79 है।

पत्र (Letter)  नम्बर 53, जो कि मालिके अशतर के अहद नामे से मशहूर है नहजुल बलाग़ा का सबसे बड़ा पत्र और पत्र नम्बर 79 सबसे छोटा है।

इस किताब का तीसरा और आखरी भाग हिकमतों (Sayings)  का है जिन्हें कलमाते क़िसार कहते हैं। इस भाग में छोटी  बड़ी  हकीमाना बातों को जमा किया गया हैं कि जिनकी संख्या 480 है।

नहजुल बलाग़ा की सबसे बड़ी हिकमत, हिकमत नम्बर 147 और सबसे छोटी हिकमत, हिकमत नम्बर 434 है।

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