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Thursday 18th of April 2019
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शैख़ हसन शहाता का परिचय

 

शैख़ हसन शहाता जिनको वहाबियों ने निर्मम हत्या करके शहीद कर दिया मिस्र के एक प्रसिद्ध शिया धर्मगुरू थे जिनके वकतव्य में मिस्र के अधिकतर लोग एकत्र होते थे क्योंकि आप अपने वकतव्य में हक़ बात कहते और हक़ का साथ देते थे और सदैव असली इस्लाम का बचाव करते थे।

मिस्र में शिया समुदाय के कुछ लोग 23 जून 2013 की शाम को इमाम मेहदी (अ) के जन्म दिवस के अवसर पर एक धार्मिक जश्न मनाने के लिए मिस्र की राजधानी क़ाहेरा के पास स्थित अलजीज़ा के इलाक़े में एक गाँव अबू मुस्लिम में जमा हुऐ थे। इलाक़े के कुछ वहाबी आतंकियों नें घर का घेराव कर दरिंदों की तरह धावा बोल कर शिया धर्मगुरू शेख़ हसन शहाता (65) और उनके भाई मुहम्मद शहाता (35) समेत चार लोगों को शहीद कर दिया। हमलावरों ने घर में तोड़ फोड़ करके आग भी लगा दी जिससे पूरा घर जल कर राख हो गया।

शिया धर्मगुरू शेख़ हसन शहाता का जन्म 19460 में मिस्र के अल-शर्क़िया प्रांत में एक "हनफी" मसलक परिवार में हुआ था। आपने बचपन ही में कुरआन हिफ्ज़ कर लिया था। आपने 50 वर्ष का आयु में इस्लाम धर्म के बारे में अनुसंधान और चर्चा करके शिया धर्म को अपना लिया था।

शेख़ हसन शहाता ने "अलक़िराआत" नामक केंद्र से स्नातकोत्तर (M.A) किया था, आपने 15 वर्ष की आयु में पहली बार अपने गाँव में जुमें की नमाज़ पढाई थी और 5 वर्ष तक पढ़ाते रहे उसके बाद 2 वर्ष तक दूसरे शहर में जुमें की नमाज़ पढाते रहे।

शेख़ हसन शहाता ने एक ऐसे घर में जन्म लिया था जो अहलेबैत (अ) से मुहब्बत करते थे, आपने इस ओर इशारा भी किया है आप कहते हैं कि " मेरे पिता मुझे हज़रत अली (अ) के बारे में वहुत कुछ बताया करते थे, मुझसे कहते थे कि ऐ मेरे बेटे हज़रत अली (अ) इस्लाम के सबसे बड़े समर्थक और हामी थे, जब आप हुज़ुर (स) के साथ होते थे तो किसी में यह हिम्मत नहीं होती थी की आपका उत्पीड़न कर सके।

शेख़ हसन शहाता कहते हैं कि मैं वर्षों तक अहले तसव्वुफ (रहस्यवादी) के साथ रहा हूँ उनसे केवल यही समझ पाया हूँ कि यह लोग कई शाखाओं में बटे हुऐ हैं और वहाबी भी उन्हीं में से एक हैं जिन्होंने इस्लाम के चेहरे को ही बदल कर रख दिया है, वह लोग चारों मसलक के इमामों में से किसी को भी नहीं मानते और इसी ग़लत सोच के ऊपर उन्होंने अपने धार्मिक सिद्धांतों की बुनियाद रखी है, यह लोग केवल "इब्ने तैमिया" को स्वीकार करते और मानते हैं यहाँ तक की उसको हुज़ुर (स) से अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं।

शिया धर्म को अपनाने के बाद शेख़ हसन शहाता को होस्नी मुबारक के 30 वर्षों के कार्यकाल में कई बार जेल जाना पड़ा और आपके मिस्र से बाहर जाने पर भी पाबन्दी थी।

मिस्र की मीडिया और प्रेस आपको मिस्र का सबसे बड़ा शेख और विवादास्पद व्यक्ति मानती है और आपको अल्लामा शेख हसन शहाता कहा करते थे, शेख हसन शहाता अल-अज़हर विश्वविद्यालय के बड़े विद्वानों में गिने जाते थे, आप क़ाहिरा शहर की एक बड़ी मस्जिद में नमाज़ पढ़ाया करते थे, आप रेडियो, टीवी और मस्जिदों में बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया करते थे।

लोग जुमें के दिन आपके जुमें के ख़ुत्बे (उपदेश) सुनने के लिए मस्जिद में बड़ी संख्या में उपस्थित होते थे, आप अपने जुमें के ख़ुत्बों (उपदेश) में हुज़ुर (स) के अहलेबैत के हक़ पर होने को बताते थे, लोग आपको हक़ का अनुयायी जानते थे।

शेख हसन शहाता ने अल-अज़हर विश्वविद्यालय में बहुत से छात्रों को पढ़ाया है उन्हीं में से शैख़ "तनतावी" भी हैं।

कहा जाता है कि आपने हुज़ुर (स) को ख़्वाब में देखा था, हुज़ुर (स) ने शेख हसन शहाता से हज़रत अली (अ) की विलायत को स्वीकार करने के साथ साथ पर स्टेज से उसकी रक्षा करने को भी कहा था और आपने ऐसा किया भी, यही कारण था कि आपके मुख से निकली हुई हर बात हर व्यक्ति के दिल में उतर जाती थी और आपके सभी लैक्चरों में लोग बड़ी संख्या में उपस्थित होते थे।

शेख हसन शहाता मिस्र में वहाबियों की हर ग़लत सोच का खंडन करते थे जिसके ऊपर उन्होंने अपने धार्मिक सिद्धांतों की बुनियाद रखी थी, आप अपने हर लैक्चर में इस ओर इशारा भी करते थे, यही कारण था की 19960 में मिस्र के सुरक्षा प्रबंधन ने वहाबियों की एक शिकायत पर आपको गिरफ्तार कर लिया और अली(अ) की विलायत के स्वीकार करने और उसके ऐलान करने के जुर्म में आपको जेल में डाल दिया जिससे आप आम जनता में और अधिक विख्यात हो गये। जेल से रिहाई के बाद आपको मिडिया से दूर रहने को कहा गया था।

आपने बहुत सी किताबें लिखी हैं उन्हीं में से एक किताब " ऐहयाओ उलूमिद्दीन " है, आपने बहुत से रिसाले भी लिखे हैं, उन्हीं में से एक का नाम " सिराजुल उम्मत फी ख़साईसे सादातील आईम्मा " है।

अगर हम शेख हसन शहाता के जीवन के मुख्य चरणों का वर्णन करना चाहें तो निम्नलिखित चरणों में संक्षेप में वर्णन किया जा सकता हैः-

(1)-आपने अपने जीवन का कुछ समय मिस्र के अल-शर्क़िया प्रांत के ’’ अल-दौरामून ’’ शहर में व्यतीत किया है, यह शहर अख़वानुल मुस्लेमीन और वहाबियत दोनों का गढ़ था, वहीं पर आपने जनता को अहलेबैत (अ) की मुहब्बत का सबक़ दिया और उनको अहलेबैत (अ) से प्रेम करना भी सिखाया।

(2)-आपके जीवन का दूसरा चरण मिस्र की राजधानी क़ाहेरा में व्यतीत हुआ, क़ाहेरा में आप सन 1984 से लेकर 1996 0 तक रहे हैं, यहीं पर आपने धर्म का प्रचार भी किया और कोबरी नामक स्थान पर जुमा भी पढ़ाया, यह वही समय था जब होस्नी मुबारक के सिपाहियों ने आपको गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था, आप धर्म प्रचार के आरोप में एक दो बार नहीं बल्कि कई बार जेल भी गये हैं।

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