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Friday 26th of April 2019
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इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में महिलाओं का स्थान

 

आज समाज में महिलाओं के योग्य व उचित स्थान का निर्धारण एक आधार भूत विषय में परिवर्तित हो गया है। बड़े सौभाग्य की बात की है कि वर्ष १९७९ में सफल होने वाली ईरान की इस्लामी क्रांति ने ईश्वरीय धर्म इस्लाम की प्रकाशमयी शिक्षाओं से लाभ उठाकर महिलाओं की श्रेष्ठ एवं महत्वपूर्ण भूमिका पर ध्यान दिया है। इस प्रकार से कि ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के अनुसार महिलाओं के मामले को ईरान के महत्वपूर्ण मामलों में गिना जाता है। आज इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाओं का मामला परिवार और समाज दो क्षेत्रों में बयान किया जाता है।

 

महिलाओं की समस्याओं व मामलों के संबंध में यह दृष्टिकोण जिसका स्रोत इस्लाम धर्म है, उनकी क्षमताओं व योग्यताओं के निखरने एवं समाज की प्रगति का कारण बना है। इस्लाम महिला को मानवीय दृष्टि से देखता है। इस दृष्टिकोण से महिला भी एक प्रतिष्ठित मनुष्य है और उसे समाज एवं परिवार का महत्वपूर्ण आधार समझा जाता है। इस दृष्टिकोण के आधार पर विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में महिला की उपस्थिति परिवार के गठन और उसे मज़बूत बनाने की दिशा में कोई बाधा नहीं है। उल्लेखनीय है कि समाज का पहला आधार परिवार है जिसकी समाज की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका है।

 

 इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता महिलाओं की समस्याओं के बारे में उच्च व गहन दृष्टिकोण रखते हैं और वे परिवार को समाज की मूल कोशिका मानते हैं तथा कहते हैं कि यदि यह कोशिका सुरक्षित व स्वस्थ हो तो शेष समाज भी सुरक्षित रहेगा। वे देशों द्वारा सुरक्षित व स्वस्थ समाज से लाभ उठाये बिना प्रफुल्ल इस्लामी समाज के विकास को असंभव मानते हैं। स्पष्ट है कि आज पश्चिमी समाज की मूल व महत्वपूर्ण समस्या है कि वह परिवार को महत्वपूर्ण आधार की दृष्टि से नहीं देखता है और महिला को परिवार से अलग एक व्यक्ति के रूप में देखता है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि पश्चिम, परिवार की समस्या के बारे में उत्तर देने से कतराता व भागता है। वरिष्ठ नेता का मानना है कि परिवार पश्चिम का कमज़ोर बिन्दु है और परिवार की मूल सदस्य महिला पश्चिमी समाज में व्यवहारिक रूप में परिवार से भिन्न व अलग है।

 

विवाह सदैव शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक एवं भावनात्मक आवश्यकता की पूर्ति का मूल कारक व साधन रहा है और समाज की आधारभूत संस्था के रूप में परिवार मानव संस्कृति व सभ्यता के विकास का आधार है। आज पश्चिमी समाजों में बड़े पैमाने पर विवाह न करने और कुंआरे व अविवाहित रहने के लिए प्रोत्साहित व प्रोपेगैंडे किये जाते हैं। इस क्षेत्र में आज हम ऐसे परिवारों के आंकड़े में वृद्धि के साक्षी हैं जिसमें पिता या माता नहीं हैं। इसके विपरीत ईरान के इस्लामी समाज में विवाह एक पवित्र बंधन है जिसकी जड़ ईश्वरीय धर्म इस्लाम के सिद्धांतों व शिक्षाओं में निहित है।

 

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम विवाह को मनुष्य के ईमान का पूरक बताते हैं और उसे अपनी सुन्नत अर्थात परम्परा कहते हैं। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता भी विभिन्न धर्मों विशेषकर इस्लाम में विवाह के पवित्र पहलु की ओर संकेत करते हैं और उनका मानना है कि इस पवित्र आयाम को विवाह से अलग नहीं होना चाहिये। वे विवाह के संबंध में सदैव उसके सादा होने और तामझाम से बचने पर बल देते हैं। विवाह और परिवार गठित करने का एक उद्देश्य पति-पत्नी के मध्य प्रेमपूर्ण संबंध उत्पन्न करना है। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरये रूम की २१वीं आयत में कहता है" कि ईश्वर के चिन्हों में से है कि उसने तुम्हीं में से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किये हैं ताकि तुम्हें उनसे आराम मिले और उसने तुम्हारे मध्य प्रेम व दया रख दी "इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिला को परिवार के आराम व शान्ति के केन्द्र के रूप में देखा जाता है।

 

अलबत्ता परिवार की सुरक्षा की पूर्ति करने में पुरूष की भूमिका, इस दृष्टिकोण से कोई विरोधाभास नहीं रखती है। क्योंकि परिवार में महिला और पुरुष की भूमिका को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के अनुसार यदि महिला की शांतिदायक और पुरुष की सुरक्षा की पूर्ति करने वाली भूमिका एक दूसरे से समन्वित हो जाये तो दोनों के मध्य प्रेम उत्पन्न हो जायेगा। इस समन्वय व समरसता का परिणाम यह है कि घर से बाहर की समस्यायें व कठिनाइयां घर में महिला के लिए सहनीय होंगी और महिला समाज के स्तर पर प्रभावी भूमिका निभा सकती है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि पश्चिमी समाज में हर चीज़ से अधिक महिला को पुरुषों की इच्छाओं की पूर्ति के साधन में परिवर्तित कर दिया गया है। वरिष्ठ नेता का इस संबंध में मानना है कि महिला और परिवार के संदर्भ में पश्चिम का सबसे बड़ा अपराध महिला के बारे में उसका दृष्टिकोण है। आप कहते हैं कि महिला की प्रतिष्ठा को सबसे बड़ा आघात पश्चिम की नीति से पहुंच रहा है। पश्चिम विशेषकर अमेरिका, उत्तरी युरोप और Scandinavian देशों में ऐसे केन्द्र हैं जिनके कार्य का मूल आधार ही पुरुषों की इच्छाओं की पूर्ति के लिए महिलाओं को उपलब्ध करवाना है। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में इसका प्रचार भी किया जाता है, और इस पर कोई आपत्ति भी नहीं करता! यह परम्परा हो गयी है। इससे बड़ा आघात महिला के लिए और क्या हो सकता है? इस आधार पर इस ग़लत संस्कृति के मुकाबले में नर्मी व लचक नहीं दिखानी चाहिये। पश्चिम महिला और परिवार के मामले में एक गहरी पथभ्रष्टता का शिकार है केवल परिवार नहीं है बल्कि महिला के व्यक्तित्व और उसकी पहचान के संदर्भ में पश्चिम एक विचित्र पथभ्रष्ठता का शिकार है" किन्तु ईश्वरीय धर्म इस्लाम महिला को मानवीय दृष्टि से देखता है। इस्लाम में महिला और पुरुष मानवता में एक दूसरे के समान व बराबर हैं और उनमें से वह श्रेष्ठ है जिसका ईश्वर से भय व सदाचारिता अधिक है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने में महिला और पुरुष को समान मानते हैं और हज़रत फातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत ज़ैनब और हज़रत मरियम के स्थान को मनुष्य की कल्पना से बहुत ऊपर मानते हैं।

 

वर्तमान समय में इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाएं एक ओर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को सिद्ध कर रही हैं तो दूसरी ओर वे घर, बच्चों की प्रशिक्षा, पत्नी और माता की अपनी भूमिका का निर्वाह भी कर रही हैं। महिलाओं का यह कार्य इस्लाम धर्म की परिवार और उसकी केन्द्रीय भूमिका के संदर्भ में शिक्षाओं का सम्मान करने का परिणाम है जो घर में महिला के कार्य को ईश्वर के मार्ग में जेहाद व धर्मयुद्ध समझता है। परिवार में महिला की दो महत्वपूर्ण भूमिकायें हैं एक पत्नी की और दूसरे माता की। आज मनोवैज्ञानिक मातृत्व की भावना को एक स्वाभाविक आवश्यकता मानते हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक de marneffe daphne  ने "मातृत्व की भावना" शीर्षक के अंतर्गत अपनी पुस्तक में लिखा है कि" अधिकांश माताएं बच्चों की प्रशिक्षा हेतु अपनी रूचि को एक मूल्यवान स्वाभाविक कारण और अपनी मूल इच्छा को व्यक्त करने का मार्ग समझती हैं"खेद के साथ कहना पड़ता है कि पश्चिमी समाज में बच्चों की देखभाल व पालन पोषण हेतु महिलाओं में जो स्वाभाविक इच्छा व रूचि पायी जाती है उसे गम्भीर ख़तरे का सामना है। महिलाओं को बच्चा न पैदा करने या बच्चों को नर्सरी स्कूलों जैसे केन्द्रों में रख देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि माता अपनी अद्वितीय भूमिका को उनके हवाले कर दे।

 

सौभाग्य की बात है कि ईरानी महिला अपनी ज़िम्मेदारी व भूमिका के महत्व को समझ कर विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के साथ बच्चों की प्रशिक्षा कर रही हैं तथा मातृत्व की भूमिका को विशेष महत्व देती हैं। अलबत्ता पत्नी की भूमिका भी न केवल मातृत्व की भूमिका से कम नहीं है बल्कि बहुत महत्वपूर्ण है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता महिलाओं की पत्नी की भूमिका को असाधारण मानते और कहते हैं कि पत्नी होने की भूमिका को कम नहीं समझना चाहिये। इस बारे में आप कहते हैं" यदि हम यह चाहते हैं कि पुरुष समाज में एक लाभप्रद प्राणी रहे तो महिला को उसके घर में एक अच्छी पत्नी होना चाहिये" घर के बाहर काम करना महिला के जीवन का एक अन्य पहलु भी है। इस्लाम के अनुसार महिलाएं विभिन्न वैज्ञानिक, शोध, अध्ययन, राजनीति, और आर्थिक क्षेत्रों में काम कर सकती हैं। इस्लाम में १४ सौ वर्ष पहले महिला की इस प्रकार की सक्रियता को मान्यता दी गयी है जबकि पश्चिम में महिला की राजनीतिक भागीदारी के अधिकार की बात २०वीं शताब्दी के अंत में और २१वीं शताब्दी के आरंभ में की गयी। इस्लामी गणतंत्र ईरान इस्लाम का अनुसरण करके महिला को समाज का आधा भाग समझता है और उसने महिलाओं की उन्नति व विकास के लिए विभिन्न क़ानून बनाये हैं। ईरानी महिलाओं का मानना है कि उनका वास्तविक विकास उसी समय होगा जब वे एक ओर संतुलित व बहुपक्षीय दिशा में अपने व्यक्तिगत विकास की ओर ध्यान देंगी और दूसरी ओर वे परिवार में माता और पत्नी होने के अपने दायित्वों का निर्वाह करेंगी।

 

ईरान की इस्लामी क्रांति ने इस्लाम धर्म की शिक्षाओं के आधार पर महिलाओं का नया आदर्श प्रस्तुत किया है जिसमें महिलाओं को घर और घर से बाहर एक प्रभावी मनुष्य के रूप में देखा जाता है और इस आदर्श में पश्चिम के विपरीत मानवीय प्रतिष्ठा, लज्जा और महिला की पवित्रता पर हर चीज़ से अधिक ध्यान दिया जाता है ताकि अवैध हितों की पूर्ति के लिए उसका प्रयोग एक साधन के रूप में न किया जाये और वह लाभप्रद सामाजिक गतिविधियों के अतिरिक्त परिवार के वातावरण को प्रेम से परिपूर्ण रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सके। स्पष्ट है कि ईरानी महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं के दृष्टिगत संतुलित एवं पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त है। एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आत्मिक व वैचारिक है जो इस्लामी क्रांति के प्रकाश में ईरानी महिलाओं के क्षेत्र में हुआ है।

 

इस आधार पर इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद सद्दाम द्वारा ईरान पर थोपे गये ८ वर्षीय युद्ध के दौरान तथा देश के वैज्ञानिक क्षेत्रों सहित विभिन्न अवसरों पर हम महिलाओं की उपस्थिति के साक्षी हैं। अमेरिकी लेखक व डाक्टर paul spracjman ने "दा" नामक किताब का अनुवाद किया है और यह किताब युद्ध में एक ईरानी महिला की गतिविधियों के बारे में है। वह इस किताब के अनुवाद के अपने लक्ष्य के बारे में लिखता है" हमने जो यात्राएं ईरान में की हैं उन सब में समाज में विस्तृत पैमाने पर महिलाओं की गतिविधियों व उपस्थिति को देखा है। मेरा मानना है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक शक्तिशाली हैं। इस आधार पर मैं इस किताब का अनुवाद करके ईरानी महिलाओं का सही चित्रण विश्ववासियों के समक्ष करना चाहता हूं" ईरानी महिलाओं ने अपनी भागीदारी एवं प्रयास से ध्यान योग्य प्रगति कर ली है। वर्तमान समय में उच्च शिक्षा से संबंधित ६८ प्रतिशत भाग लड़कियों का है। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व शिक्षित महिलाओं की दर ३४ प्रतिशत से बढ़कर अब ८० प्रतिशत हो गयी है जो इस्लामी क्रांति द्वारा महिला समाज पर ध्यान दिये जाने का सूचक है और क्रांति के बाद वैज्ञानिक, टेक्नालोजी, आविष्कार, नैनो टेक्नालोजी, परमाणु ऊर्जा और एरो स्पेस सहित विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं की क्षमता ध्यान योग्य है। इस प्रकार ईरानी महिलाओं ने इस्लामी क्रांति की संस्कृति से प्रेरणा लेकर भली भांति दर्शा दिया कि वे राजनीतिक एवं सामाजिक सहित समस्त क्षेत्रों में उपस्थित हैं तथा धार्मिक आस्थाएं और इस्लामी मूल्य महिलाओं की व्यक्तिगत एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने में न केवल बाधा नहीं हैं बल्कि वे इन गतिविधियों का मार्ग दर्शन सही दिशा में करते हैं।

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