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Saturday 20th of April 2019
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सूरए बक़रह-1 आयत नं 1 से आयत नं 2 तक

ईश्वरीय ग्रंथ क़ुरआने मजीद क दूसरे सूरे का नाम है सूरए बक़रह। बक़रह शब्द का अर्थ होता है गाय। बनी इस्राईल की गाय की कथा के कारण इस सूरे का नाम बक़रह पड़ा। सूरए बक़रह का आरंभ ऐसे अक्षरों से होता है जिनका विशेष अनुक्रम है तथा वे मनुष्य का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।

सूरए बक़रह-1 आयत नं 1 से आयत नं 2 तक
प्रस्तावना
ईश्वरीय ग्रंथ क़ुरआने मजीद क दूसरे सूरे का नाम है सूरए बक़रह। बक़रह शब्द का अर्थ होता है गाय। बनी इस्राईल की गाय की कथा के कारण इस सूरे का नाम बक़रह पड़ा। सूरए बक़रह का आरंभ ऐसे अक्षरों से होता है जिनका विशेष अनुक्रम है तथा वे मनुष्य का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।
प्रायः एक शब्द कुछ अक्षरों से मिलकर बनता है और तभी अपना अर्थ पहुंचाता है परन्तु अल्लाह ने अपनी पुस्तक क़ुरआन के ११४ सूरों में से २९ सूरों का आरंभ ऐसे अक्षरों से किया है जिनमें से प्रत्येक अक्षर अलग-अलग है और इन अक्षरों को अलग अलग ही पढ़ा जाता है। उदाहरण स्वरूप सूरए बक़रह की पहली आयत में हम इस प्रकार पढ़ते हैः

ا ل م
अलिफ़ लाम मीम।

अरबी भाषा में इससे पहले इस प्रकार के अक्षरों का प्रयोग नहीं किया गया था। ऐसे अक्षरों को "हुरूफ़े मुक़त्तेआत" कहते हैं जिसका अर्थ होता है एक दूसरे से अलग-अलग अक्षर।
अधिकांश इन अक्षरों के पश्चात ऐसी आयतें आई हैं जिनमें क़ुरआन के मोजेज़ा अर्थात एक ईश्वरीय चमत्कार होने तथा उसकी महानता एवं वास्तिवकता का उल्लेख किया गया है। जैसा कि सूरए शूरा में आया हैः हे पैग़म्बर, इस प्रकार ईश्वर ने तुम पर और तुमसे पहले वाले पैग़म्बरों पर अपना विशेष संदेश "वहि" उतारा।

मानो अल्लाह यह कहना चाहता है कि मैंने अपनी इस किताब को जो चमत्कार भी है, उन्ही अक्षरों से बनाया है जो तुम्हारे पास भी मौजूद है, ऐसे अक्षरों से नहीं जो तुम्हारे लिए अपरिचित हों। वे लोग जो क़ुरआन के ईश्वरीय चमत्कार होने का इन्कार करते हैं यदि सच्चे हैं तो इन्ही अक्षरों से क़ुरआन के प्रकार की ऐसी किताब लिखें जो हर प्रकार से क़ुरआन के बराबर हो।
वास्तव में यह अल्लाह का चमत्कार ही है कि उसने सामान्य अक्षरों से एक ऐसी किताब की रचना कर दी कि मनुष्य उसके एक सूरे का भी उदाहरण नहीं ला सकता। जैसा कि प्रकृति में भी अल्लाह निर्जीव मिटटी से हज़ारों प्रकार के पेड़-पौधे तथा फल-फूल उगाता है जबकि मनुष्य मिटटी से ईंट और गारा बनाता है।

अल्लाह सूरए बक़रह में भी सूरए शूरा की ही भांति हुरूफ़े मुक़त्तआत के पश्चात कहता हैः

ذالک الکتاب لا ریب فیھ ھدی للمتقین

वह महान पुस्तक जिसकी सच्चाई में कोई शंका नहीं है, पवित्र तथा नेक लोगों की ही मार्गदर्शक है।
आज के मनुष्य के लिए पिछली पीढ़ियों का सबसे मूल्यवान उत्तराधिकार पुस्तक है, जिसने अपनी मौन भाषा में बड़े-बड़े ज्ञान, मान्यताएं तथा अर्थ, संसार तक पहुंचाए हैं। यद्यपि पवित्र क़ुरआन एक किताब के रूप में आकाश से नहीं उतरा परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम किसी भी प्रकार के परिवर्तन से अल्लाह की आयतों की सुरक्षा के लिए, जो आयत भी आप पर उतरती थी उसे लोगों के सामने पढ़ देते थे ताकि पढ़े-लिखे लोग, उसे लिख लें जबकि दूसरे लोग उसे याद कर लें।

मनुष्य यदि ध्यानपूर्वक इस किताब का अध्ययन करे तथा उसके अर्थों को समझे तो उसे विश्वास हो जाएगा कि यह किताब अल्लाह की ओर से आई है तथा एक मनुष्य के लिए इस प्रकार की बातें बयान करना, वह भी चौदह शताब्दी पूर्व एक ऐसे राष्ट्र में जिसमें ज्ञान नाम की कोई वस्तु थी ही नहीं, असंभ है।
जैसा कि हमने आरंभ में कहा था कि पवित्र क़ुरआन, सौभाग्य एवं कल्याण की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करने वाली किताब है तथा जो भी सफलता एवं सौभाग्य की इच्छा रखता है उसके पास अल्लाह की किताब के आदेशों का अनुसरण करने के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है। वह अपने अस्तित्व में मौजूद योग्यताओं का उचित प्रयोग करके उन ख़तरों एवं संकटों से बच सकता है जो उसके शरीर या उसकी आत्मा को हानि पहुंचा सकते हैं।
सूरए बक़रह की ही १८५वीं आयत में ईश्वर कहता हैः क़ुरआने मजीद, रमज़ान के महीने में लोगों के मार्गदर्शन के लिए उतरा है।

अलबत्ता यह बात भी स्पष्ट है कि इस ईश्वरीय किताब से केवल वही लोग लाभान्वित हो सकते हैं जो सत्य को पहचानने तथा उसे स्वीकार करने के लिए तत्पर हों अन्यथा हठधर्मी, धर्मांन्ध एवं स्वार्थी लोग न केवल सत्य के जिज्ञासु नहीं होते बल्कि जहां भी उन्हें सत्य मिल जाता है, उसे समाप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अतः आरंभ में प्राकृतिक एवं आत्मिक पवित्रता की आवश्यकता है जो क़ुरआन के मार्गदर्शन को स्वीकार करने के लिए वातावरण अनुकूल करती है। इसी कारण इस आयत में कहा गया है कि क़ुरआन केवल उन लोगों का मार्ग दर्शन करता है जो पवित्र हों।
इस आयत से हमने जो बातें सीखीं वे इस प्रकार हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के असहाब अर्थात साथी, क़ुरआने मजीद के लिखने तथा उसके याद करने को बहुत महत्व देते थे। इसी कारण अल्लाह की ओर से आने वाली आयतें, एक किताब के रूप में आ गईं। हमें भी इस ईश्वरीय किताब के आदर तथा सम्मान का ध्यान रखना चाहिए।

पवित्र क़ुरआन के विषय दृढ़ एवं स्थिर हैं क्योंकि वे अल्लाह की ओर से आए हैं।
पवित्र क़ुरआन समस्त मनुष्यों के मार्गदर्शन की किताब है न कि किसी विशेष गुट के मार्ग दर्शन की, इसी कारण हमें क़ुरआन से ये यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह हमे भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र या गणित की गुत्थियों का समाधान बताएगा।
हम क़ुरआन के प्रकाश को उसी समय अपने हृदय में उतार सकते हैं जब हम वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए तैयार हों। जी हां प्रकाश, उज्जवल शीशे से पार हो सकता है ईंट और मिटटी से नहीं।

 


source : www.abna.ir
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