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Tuesday 26th of March 2019
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इस्लामी कल्चर-3

 इस्लामी कल्चर-3

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का एक अहेम क़दम, इस्लामी हुकूमत के एडमिनिस्ट्रेटिव सेंटर की शक्ल में मस्जिद बनाना था। अस्ल में इस बात की ज़रूरत थी कि एक ऐसा सेंटर बनाया जाए जो मुसलमानों की इबादत गाह भी हो और साथ ही वहां उनके सियासी, अदालती, शैक्षिक यहां तक कि सामरिक मामलों को भी तैयार किया जाए। शुरू में मस्जिद को, बैतुलमाल, जंगों से हासिल होने वाली माल व दौलत यहां तक कि बंदियों और जंगी बंदियों की देख-भाल की जगह समझा जाता था। अस्ल में मस्जिद के कार्यक्षेत्र में सभी सियासी व सामाजिक इकाइयां आती थीं, इसी आधार पर मदीना शहर में नई नई इस्लामी हुकूमत की स्थिरता और मज़बूती में मस्जिद की ख़ास भूमिका थी।
मस्जिद की भूमिका और गतिविधि के बारे में यह कहना उचित होगा कि इस्लाम के शुरूआती ज़माने में इल्म व ईमान के बीच सबसे गहरे संबंध मस्जिद में ही स्थापित होते थे। सभी इस्लामी शिक्षाओं व आमुल्कों का बयान मस्जिद में ही किया जाता था और मज़हबी शिक्षाओं बल्कि लिखने-पढ़ने से संबंधित सभी मामले भी मस्जिद में अंजाम दिए जाते थे। बाद में जब धीरे-धीरे प्रशासनिक और अदालती मामलों की इकाइयां मस्जिद से अलग हुईं तब भी इल्म हासिल करने के सेंटर मस्जिद के पड़ोस में ही बने रहे। इस आधार पर पिछली कुछ शताब्दियों तक इस्लामी मुल्कों में बड़े मदरसे और युनीवर्सिटीज़ शहर की जामा मस्जिदों के पास ही बनाई जाती थीं।
मज़हबी आस्थाओं की रक्षा व उनके प्रचलन के लिए, जो पैग़म्बरे इस्लाम का मुख्य लक्ष्य था, निश्चित रूप से सियासी, प्रशासनिक और सामरिक सहारे की ज़रूरत थी। उन्होंने हुकूमत के आधारों को मज़बूत बनाने तथा प्रशासनिक सिस्टम के गठन के लिए सक्षम व क़ाबिल लोगों का चयन किया और उनमें से हर एक को कुछ ज़िम्मेदारी सौंपीं। उनमें से कुछ लोगों ने ज़कात और दान-दक्षिणा जमा करने का काम शुरू किया जबकि कुछ दूसरों ने सामाजिक मामलों का अच्छी तरह बंदोबस्त करने की ज़िम्मेदारी संभाली। मदीना शहर की सरकार की प्रशासनिक सिस्टम बहुत सरल व सादा लेकिन व्यापक थे। कुछ लोगों को समझौतों, सुलह सफ़ाई और सहमति पत्रों को पंजीकृत करने, टैक्स के मानक तय करने, जंग से हासिल होने वाले माल व दौलत का रिकार्ड रखने यहां तक कि क़ुरआने मजीद की आयतों को लिखने का ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कुछ लोगों को इस बात के लिए भी नियुक्त किया था कि वह लोगों अथवा क़बीलों को दी जाने वाली ज़मीनों या पानी के सोर्सेज़ की लिस्ट तैयार करें और उन लोगों अथवा क़बीलों के लिए स्वामित्व के दस्तावेज़ तैयार करें। यह अरबों की बीच पूरी तरह से नई शैली थी क्योंकि अरबों के बीच पूराने ज़माने से चले आ रहे मतभेदों का एक कारण, ज़मीन व विभिन्न संपत्तियों ख़ास कर कुओं और नहरों जैसे पानी के सोर्सेज़ पर क़ब्ज़ा हुआ करता था।
पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने इसी तरह यहूदी व ईसाई क़बीलों सहित विभिन्न क़बीलों के साथ कई संधियां व समझौते किए। इन समझौतों के विषय, समय व स्थान और इसी तरह मुस्लिम फ़ौज की कमज़ोरी व मज़बूती के मद्दे नज़र भिन्न हुआ करती थी, इस तरह से कि कभी कभी उन लोगों को बहुत आश्चर्य होता था जिन्हें हालात का पूरा इल्म नहीं था। उदाहरण स्वरूप पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मक्के के मुश्रिकों से हुदैबिया नामक जो संधि की थी उसके अनुच्छेदों से कुछ लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ जबकि कुछ दूसरों ने उस पर अपनी नाख़ुशी व विरोध का ऐलान किया। आगे चल कर इतिहास ने यह दर्शा दिया कि किस तरह पैग़म्बरे इस्लाम ने किस तरह मदीने में नई नवेली सरकार की रक्षा व उसे मज़बूत बनाने तथा उसके लक्ष्यों व नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए बहुत दूरदर्शितापूर्ण कूटनीति का प्रयोग किया और मामलों का अच्छी तरह बंदोबस्त किया।
इन प्रशासनिक मामलों के साथ ही पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ईरान, रोम, मिस्र, यमन और ईथोपिया सहित विभिन्न पड़ोसी मुल्कों के शासकों को ख़त लिखे। इन लेटरों का मुख्य विषय, उन शासकों को इस्लाम और तौहीद अर्थात एकेश्वरवाद का न्यौता देना था। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में लिखी गई बातें, पैग़म्बरे इस्लाम की विदेश नीति का हिस्सा थीं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर टकराव और जंग पर न्यौते और कूटनीति को प्राथमिकता देने के अपने यक़ीन का उल्लेख किया है। अगर उनके साथी किसी को भी इस्लाम स्वीकार करने का न्यौता दिए बिना ग़ुलाम बनाते थे तो आप उस इंसान को आज़ाद कर देते थे।
पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की एक दूसरों कार्यवाही, इस्लामी हुकूमत के विस्तार और इस्लामी हुकूमत की सीमाओं के भीतर शांति व सुरक्षा की स्थापना पर आधारित थी। इसके लिए उन्होंने ज़रूरत पड़ने पर जंग भी की। वह कभी ख़ुद जंग में शामिल होते और कभी किसी दूसरों को फ़ौज की कमान सौंप देते थे। इसी तरह उन्होंने विभिन्न पड़ोसी क़बीलों के साथ संधियां कीं। उनकी इस तरह की कार्यवाहियां, उस समय के अरब दुनिया के सियासी मंच से बाहर इस्लाम के प्रचार और उसके इंटरनेशनल मैसेज के प्रसार के लिए थीं।
अमरीकी इतिहासकार वेल डोरेन्ट इस्लामी सिस्टम की रूपरेखा तैयार करने में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की तत्वदर्शितापूर्ण भूमिका की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि उस ज़माने में पैग़म्बर न केवल मुसलमानों के नेता थे बल्कि मदीना शहर का सियासी नेतृत्व भी उन्हीं के पास था तथा वह उस शहर के मुख्य जज भी समझे जाते थे। एक ईरानी इतिहासकार व अध्ययनकर्ता अब्दुल हुसैन ज़र्रीनकूब ने लिखा है कि ख़ास तौर से मदीना शहर में इस्लामी आमुल्कों का मेन हिस्सा तय हुआ। क़िबले के परिवर्तन के कुछ ही समय बाद, रमज़ान के महीने में रोज़े रखने और नमाज़ पढ़ने व ज़कात अदा करने के आदेश भी व्यवहारिक हो गए। उनके अनुसार जेहाद, जंग से हासिल होने वाले माल के बंटवारे, मीरास, शराब पर पाबंदी, हज और इसी तरह के कुछ दूसरों आमुल्कों ने अरबों की ज़िंदगी को पूरी तरह से परिवर्तित करके उनके बीच एकता पैदा कर दी।
मदीना शहर पर पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के दस वर्षीय हुकूमत के दौरान उन्होंने दुश्मनों द्वारा थोपी गईं लगभग 80 छोटी-बड़ी जंगों का नेतृत्व किया। या तो वह ख़ुद जंग में मौजूद हो कर इस्लामी फ़ौज का नेतृत्व करते थे या फिर ख़ुद शहर में रहते और अपने किसी साथी को फ़ौज का कमांडर तय कर देते थे। जंगों में फ़ौज के नेतृत्व की पैग़म्बरे इस्लाम की बौद्धिक युक्तियों और सामरिक मामलों में दूसरों लोगों से सलाह करने की उनकी शैली पर सभी इतिहासकारों ने ख़ास ध्यान दिया है। हालांकि जंग अथवा संधि के बारे में आख़री फ़ैसला वह ख़ुद लेते थे लेकिन जंग व प्रतिरक्षा की शैली व रणनीतियों के बारे में वह अपने साथियों से ज़रूर सलाह करते थे। महत्वपूर्ण जंगों से पूर्व वह प्रायः जंग काउंसिल का गठन करते थे और दूसरों लोगों के विचार भी सुना करते थे। उदाहरण स्वरूप उहद नामक जंग में, हालांकि उनका विचार भिन्न था लेकिन उन्होंने एक विचार पर अधिकांश लोगों के सहमत होने के कारण उस विचार को ही स्वीकार किया।
अरब के क़रीबी मुल्कों व इलाक़ों पर जीत हासिल करने के बाद इस्लामी हुकूमत का एरिया बढ़ता चला गया। मुसलमान, विभिन्न राष्ट्रों के भिन्न-भिन्न कल्चरों से परिचित हुए जो स्वाभाविक रूप से एक समान न थें। यह परिचय इस बात का कारण बना कि इन कलचरों की कुछ परंपराएं, मुसलमानों की सरल और सादा ज़िंदगी में भी दाख़िल हो जाएं। इस्लामी कल्चर को अचानक ही विभिन्न तरह की परंपराओं, संस्कारों और आचरणों का सामना हुआ लेकिन इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर जो परंपरा और जो संस्कार दीन से टकराव नहीं रखता था, वह दीन में शामिल हो गया। यह स्थिति इस हद तक जारी रही कि दूसरे ख़लीफ़ा के हुकूमत के ख़ात्मे पर मदीने के सामाजिक माहौल का ढांचा पूरी तरह से तब्दील हो गया।
दूसरी ओर जीते गए इलाक़ों की रक्षा और वहां के मामलों के सही संचालन के लिए ख़ास तरह के इल्म व अनुभव की ज़रूरत थी जिससे शुरू में मुसलमान अनभिज्ञ व बेख़बर थे लेकिन जब उन्होंने लगातार जीत हासिल करनी शुरू की तो विभिन्न तरह की कलाओं, सियासी युक्तियों और संचालन की शैली सीखने का ज़्यादा आभास होने लगा और उन्होंने इन इलाक़ों में महारत हासिल करने के कोशिश शुरू कर दी। उसी समय से धीरे-धीरे नवगठित मुस्लिम समाज में सियासी सिस्टम का अच्छी तरह बंदोबस्त करने हेतु संचालन संस्थाएं वुजूद में आने लगीं। शायद कहा जा सकता है कि ये संस्थाएं, मदीने में बैतुलमाल की स्थापना के साथ वुजूद में आना शुरू हुईं और अमवी व अब्बासी हुकूमतों के ज़माने में प्रशासन व संचालन की विभिन्न संस्थाएं गठित हो गईं।
इस्लामी हुकूमत द्वारा हासिल की गई जीतों के बारे में इस महत्वपूर्ण प्वाइंट की तरफ़ ध्यान दिया जाना चाहिए कि जंगों से हासिल होने वाले माल व दौलत ने अनचाहे में ही इस्लामी समाज में ऐश्वर्य और हित प्राप्ति के रास्ते खोल दिये। इन समस्याओं ने बाद के ज़माने में इस्लाम की हुकूमती सिस्टम पर बड़े बुरे प्रभाव डाले और विभिन्न तरह की गुमराहियों का कारण बनीं। यहां तक कि अरबों ने अपने सांसारिक हितों को ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अहलेबैत तक के अधिकारों की अनदेखी कर दी। अल्बत्ता इसी के साथ यह भी कहना चाहिए कि इस्लामी हुकूमत की जीतों के ज़माने में होने वाली तब्दीलियों के चलते ही दूसरों इलाक़ों ख़ास कर ईरानी मुसलमानों के माध्यम से आने वाले इल्म ने इस्लामी सिवीलाईज़ेशन की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस्लामी हुकूमत की शुरूआती जीतों के बाद ही अनेक प्रचारकों का प्रशिक्षण किया गया जो दूरवर्ती इलाक़ों में इस्लाम का प्रसार भी करते थे और इस्लामी सिवीलाईज़ेशन के क्षेत्र में विभिन्न तरह के इल्म भी स्थानांतरित करते थे। यह बात इस्लामी सिवीलाईज़ेशन की रूपरेखा तैयार करने में बहुत ज़्यादा मददगार साबित हुई।


source : www.abna.ir
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