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Friday 28th of February 2020
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हज़रत फातेमा मासूमा का शुभ जन्म दिवस

हज़रत फातेमा मासूमा का शुभ जन्म दिवस

आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम की पौत्री और हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की बहन तथा इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की सुपुत्री हज़रत फातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के जन्म दिवस का शुभ अवसर है। इस शुभ अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का जन्म १७३ हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में हुआ था। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा ऐसे माता- पिता की छत्रछाया में बड़ी हुईं जो समस्त सदगुणों से सुसज्जित थे। उपासना, त्याग, सदाचार , ईश्वर से भय, क्षमा शीलता और समस्याओं एवं कठिनाइयों के मुकाबले में धैर्य इस परिवार की स्पष्ट विशेषतायें थीं। हज़रत फ़ातेमा मासूमा भी इन सदगुणों से सुसज्जित थीं और इस्लामी शिक्षाओं व ज्ञानों को प्राप्त करने में उन्होंने बहुत प्रयास किये और चूंकि वह एसे घराने में जन्मी थीं जहां सब लोग ज्ञानी थे इस लिए उन्होंने इन महान हस्तियों की सहायता से असीम ज्ञान प्राप्त कर लिया।

हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा, इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की संतान में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के बाद सब से अधिक ज्ञानी थीं और शिष्टाचार व नैतिकता के भी उच्च स्थान पर पहुंची थीं। उस युग के बुद्धिजीवियों ने उन्हें जो उपाधियां दी हैं और उन्हें जिन नामों से याद किया है उन सब से इस वास्तविकता का पता चलता है। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा, ने लोगों के मार्गदर्शन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने महान पिता से जो कुछ भी सीखा था उसे किसी प्रकार के परिवर्तन के बिना लोगों को सिखा दिया। हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके उत्तराधिकारियों के कथनों को बयान करके लोगों को जागरुक बनाती थीं। दूसरे शब्दों में यह महान महिला मोहद्दिसा अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों को बयान करने वाली थीं। उन्होंने पैगम्बरे इस्लाम का यह प्रसिद्ध कथन लोगों तक पहुंचाया है कि जो पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के प्रेम की राह में मर जाए वह शहीद होता है। 

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के पवित्र परिजनों के अनुयाइयों का एक गुट काफी दूर  से कुछ प्रश्न पूछने पवित्र नगर मदीना पहुंचा किंतु इस कारवां के थके मांदे लोग जब इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम  के घर पहुंचे तो उन्हें यह पता चला कि इमाम यात्रा पर गये हैं। कारवां वालों ने अपने प्रश्न हज़रत मासूमा फातेमा की सेवा में पेश किये जो उस समय एक किशोरी थीं। दूसरे दिन वह पुनः इमाम काज़िम अलैहिस्सलमा के घर पहुंचे ताकि अपने पत्रों और प्रश्नों के उत्तर ले सकें किंतु उन्हें पता चला कि इमाम अभी तक वापस नहीं लौटे हैं। उन लोगों ने अपने अपने प्रश्न और पत्र वापस मांगे ताकि फिर कभी इमाम की सेवा में उपस्थित होकर उनके जवाब पूछें किंतु उन्हें पता चला कि हज़रत फातेमा मासूमा ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया है।

 जब कारवां वापस जा रहा था तो कारंवा वालों की भेंट इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से हुई और वे बड़ी खुशी के साथ उनकी सेवा में उपस्थित हुए और पूरी घटना बतायी। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम ने जैसे ही पत्र खोले और उनमें लिखे गये उत्तर पढ़े  उनका  तेजस्वी चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। मुस्कान के साथ उन्होंने  तीन बार कहा" उसके पिता उस पर न्यौछावर हों" इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का यह वाक्य हज़रत फातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा द्वारा दिये गये उत्तरों के सही होने की पुष्टि करता है।

पापों और गलतियों से दूर होना ईश्वर के दूतों और उनके उत्तराधिकारियों की विशेषता है किंतु उनके अतिरिक्त भी कुछ ऐसे लोग इतिहास में थे कि जो ईश्वर की उपासना और उसका आज्ञापालन करके पवित्रता के इस स्थान तक पहुंचने में सफल हुए थे, हज़रत फातेमा मासूमा भी एसी ही हस्तियों में से थीं। इसी लिए उन्हें मासूमा अर्थात " पापों से पवित्र " की उपाधि मिली थी। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने फरमाया है कि जिसने कुम नगर में फातेमा मासूमा के मज़ार के दर्शन किये वह उसी प्रकार से है जैसे उसने मेरे दर्शन किये हैं। 

हज़रत मासूमा अपने भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम से बहुत अधिक प्रेम करती थीं। वर्ष २०१ हिजरी क़मरी में जब हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को विवश होकर पवित्र नगर मदीना को छोड़कर ईरान के ख़ुरासान क्षेत्र आना पड़ा तो अपने भाई की दूरी सहन करना आपके लिए बहुत कठिन हो गया था। अतः आपने भी पवित्र नगर मदीना छोड़कर ख़ुरासान आने का निर्णय किया। चूंकि हज़रत फ़ातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा इस्लामी संस्कृति, पैग़म्बरे इस्लाम, उनके पवित्र परिजनों और अपने महान पिता की शिक्षाओं को बयान करने तथा समय के अत्याचारी शासक के विरुद्ध संघर्ष करने में अपने पिता के मार्ग को जारी रखने वाली थीं इसलिए अवसर का लाभ उठा कर उन्होंने इस यात्रा में भी लोगों का मार्ग दर्शन किया। आपने अपने भाषणों में लोगों को अत्याचारी अब्बासी शासकों के वास्तविक चेहरों से परिचित करा दिया और उसकी पाखंड भरी नीतियों की वास्तविकता लोगों के समक्ष खोल दी। पवित्र मदीना नगर से मर्व की आपकी यात्रा अब्बासी शासकों के विरुद्ध संघर्ष का एक भाग थी परंतु खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह यात्रा उनके भाई से उनकी भेंट का कारण न बन सकी। अब्बासी शासकों के कारिन्दों ने सावे नगर के मार्ग में उनके कारवां पर आक्रमण कर दिया और उनके कारवां के साथ चलने वाले कुछ व्यक्तियों को शहीद कर दिया। हज़रत मासूमा इस यात्रा में बीमार पड़ गयीं और जब वे इस बात को समझीं कि वे मर्व नगर के मार्ग को जारी नहीं रख सकतीं तो उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगों से कहा कि मुझे क़ुम नगर ले चलें क्योंकि मैंने अपने पिता से सुना है कि यह नगर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम के परिजनों के प्रेमियों का केन्द्र है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस्लामी इतिहास उन पुरुषों और महिलाओं के परित्याग का ऋणी है जिन्होंने इस्लामी संस्कृति और शिक्षा के प्रचार- प्रसार में बहुत अधिक कठिनाइयां सहन की हैं। क़ुम नगर में १७ दिन रहने के बाद हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का स्वर्गवास हो गया। इस प्रकार यह महान महिला सदा के लिए क़ुम नगर में रह गयीं और अपने भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को न देख सकीं। हज़रत फ़ातेमा की पवित्र आत्मा के कारण उनके भाई हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने उन्हें "मासूमा" अर्थात पाप न करने वाली की उपाधि दी और एक अन्य स्थान पर आपने कहा है कि जो क़ुम में मासूमा का दर्शन करेगा वह उस व्यक्ति की भांति है जिसने हमारा दर्शन किया है।

वर्तमान समय में सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से क़ुम नगर को ईरान में विशेष महत्व प्राप्त है और यह नगर यथावत विकास की ओर अग्रसर है। सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक परिवर्तनों में हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के पवित्र अस्तित्व के अच्छे परिणाम, एक नगर तक सीमित नहीं रहे बल्कि इन परिणामों को पूरे  ईरान में देखा जा सकता है। क़ुम नगर में हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के पावन रौज़े ने देश- विदेश से लाखों तीर्थ यात्रियों व पर्यटकों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। क़ुम में हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा का पवित्र रौज़ा इस नगर में विभिन्न धार्मिक शिक्षा केन्द्रों के बनने और वहां से महान विद्वानों के अस्तित्व में आने का कारण बना है। अपनी प्राचीनता के साथ क़ुम नगर को इस्लाम का परिचय कराने और महान धर्म गुरूओं एवं विद्वानों के प्रशिक्षण में विशेष स्थान प्राप्त है।

 वर्तमान समय में समूचे विश्व से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के पवित्र परिजनों से प्रेम करने एवं उनके प्रति श्रृद्धा रखने वाले लोग क़ुम में आपके पवित्र रौज़े के समीप स्थित शिक्षा केन्द्रों में इस्लामी ज्ञानों एवं शिष्टाचार अर्जित करने में व्यस्त हैं। हम इस शुभ अवसर पर एक बार फिर हज़रत फातेमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के जन्म दिन पर  अपने सभी श्रोताओ को बधाई बधाई पेश करते हैं।


source : hindi.irib.ir
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