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Friday 28th of February 2020
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पवित्र रमज़ान-22

पवित्र रमज़ान-22

रमज़ान के पवित्र महीने में यह ऐसा समय है जब दयालु व तत्वदर्शी ईश्वर की दया व कृपा ने हर समय से अधिक उसके बंदों को अपना पात्र बना रखा है। रमज़ान के पवित्र महीने के इन दिनों के शबे क़द्र होने की अधिक संभावना है। शबे क़द्र वह रात है जिसमें ईश्वर पूरे वर्ष के लिए प्रत्येक मनुष्य की रोज़ी निर्धारित करता है। इससे बढ़ कर सौभाग्य क्या हो सकता है कि मनुष्य अपने पूरे अस्तित्व के साथ ईश्वरीय दया का आभास करे और हृदय से ईश्वरीय कृपा को स्वीकार करे। पवित्र रमज़ान के बाक़ी बचे इन दिनों में रोज़ेदार इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि ईश्वर के आतिथ्य में उसके द्वारा उनके लिए बिछाए गए व्यापक दस्तरख़ान से अपने लिए अधिक से अधिक सामान जुटा लें। इस पवित्र महीने में उनका प्रयास है कि अपने विचारों व कर्मों को भलाइयों से सुसज्जित करके उस प्रकार जीवन बिताएं, जिस प्रकार ईश्वर चाहता है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पवित्र रमज़ान के अंतिम दस दिनों में जिनमें शबे क़द्र होने की संभावना अधिक है, अपना बिस्तर समेट देते थे और बहुत कम सोते थे। वे शबे क़द्र में अपने घर वालों को ईश्वर की उपासना हेतु जगाते थे और कहते थे कि ईश्वर का कोई भी बंदा यदि शबे क़द्र में ईमान व निष्ठा के साथ रात भर जाग कर उपासना करे तो ईश्वर उसके सभी पापों को क्षमा कर देता है। तो सलाम हो उस रात पर जो ईश्वर के शब्दों में हज़ार महीनों से बेहतर है, सलाम हो उस रात पर जिसका हर क्षण ईश्वरीय दया व कृपा से ओत-प्रोत है। आज की रात आसमान के वासी ज़मीन पर आए हुए हैं। इस रात फ़रिश्ते धरती पर फैले हुए हैं, वे ईमान वालों की गोष्ठियों व बैठकों को देखते हैं और उन्हें सलाम करते हैं। आज की रात उड़ान भरने की रात है। तो उठें और अपने आपको ईश्वरीय दया का पात्र बनाने के लिए तैयार करें। आजके कार्यक्रम का आरंभ भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की मकारेमुल अख़लाक़ नामक दुआ के एक भाग से करते हैं।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैं। प्रभुवर! मुझे वह चरित्र प्रदान कर जो अधिक पवित्र हो और मुझे वह कार्य करने का सामर्थ्य प्रदान कर जिससे तू अधिक प्रसन्न हो। ईश्वर के पैग़म्बरों और दूतों का सबसे महत्वपूर्ण अभियान यह था कि लोगों के अंतर्मन को अनेकेश्वरवाद की बुराई से पवित्र करें और उन्हें एकेश्वरवाद के मार्ग पर आगे बढ़ाएं। क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अभियान के बारे में सूरए आले इमरान की 164वीं आयत में कहता है। निसन्देह, ईश्वर ने ईमान वालों पर उपकार किया उस समय जब उसने उन्हीं में से एक को पैग़म्बर बनाकर भेजा ताकि वह उन्हें ईश्वर की आयतें पढ़कर सुनाए और उन्हें (बुराइयों से) पवित्र करे तथा उन्हें किताब व तत्वदर्शिता की शिक्षा दे। जबकि इससे पूर्व वे खुली हुई पथभ्रष्टता में थे।

हदीसों में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम जब भी सूरए शम्स की नवीं आयत की तिलावत करते थे, जिसका अनुवाद है कि जिसने भी अपने अंतर्मन को पवित्र व स्वच्छ कर लिया वही कल्याण प्राप्त करने वाला है, तो थोड़ी देर रुकते और फिर ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि प्रभुवर! मुझे अंतर्मन की पवित्रता प्रदान कर कि तो मेरे अंतर्मन का स्वामी है। उसे स्वच्छ व पवित्र बना कि तू सबसे अच्छा पवित्र करने वाला है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम भी अपने पूर्वज पैग़म्बरे इस्लाम की भांति अंतर्मन की पवित्रता से अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि प्रभुवर! मुझे उन गुणों एवं विशेषताओं को प्राप्त करने में सफल करे जिनसे मनुष्य का अंतर्मन पवित्र होता है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम इस दुआ के अगले वाक्य में ईश्वर से कहते हैं। प्रभुवर! मेरी शक्ति व क्षमता को उस मार्ग में प्रयोग कर जिससे तो अधिक प्रसन्न होता हो। धार्मिक शिक्षाओं में वे सभी कार्य ईश्वर की प्रसन्नता का कारण बनते हैं जिन्हें सदकर्म कहा गया है और इनमें से हर कर्म जितनी निष्ठा के साथ किया जाएगा उसी अनुपात से उस पर ईश्वर की ओर से पारितोषिक प्राप्त होगा। धार्मिक किताबों से यह बात भी समझ में आती है कि सभी भले कर्म भी आध्यात्मिक मूल्य की दृष्टि से एक समान नहीं हैं। इस आधार पर यदि किसी ईमान वाले व्यक्ति के सामने एक ही समय में दो कर्म हों जिनमें से एक अच्छा हो और दूसरा अधिक अच्छा हो तो उसे अधिक अच्छा कर्म करना चाहिए क्योंकि उसका आध्यात्मिक मूल्य भी अधिक होगा और उसे करने से ईश्वर भी अधिक प्रसन्न होगा। इस दुआ में भी इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें सर्वोत्तम कार्य करने की क्षमता प्रदान करे।

 

ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के जीवन की एक यादगार घटना।

एक दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से प्रार्थना करते समय उससे इच्छा प्रकट की कि वह उन्हें उस व्यक्ति को दिखाए जो स्वर्ग में उनका पड़ोसी होगा। ईश्वर की ओर से उन्हें संदेश मिला कि अमुक स्थान पर एक युवा रहता है जो स्वर्ग में तुम्हारा पड़ोसी होगा। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उसके पास गए तो देखा कि वह एक क़साई है। उन्होंने दूर से उसके कार्यों पर दृष्टि रखी कि वह कौन सा मूल्यवान और असाधारण काम करता है कि उसे इस प्रकार का उच्च स्थान प्राप्त हुआ है। वे काफ़ी समय तक उसे देखते रहे किंतु उन्हें कोई भी असाधारण बात दिखाई नहीं दी। जब रात हुई तो वह युवा अपनी दुकान से निकला और घर की ओर चल पड़ा। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उससे अपना परिचय कराए बिना कहा कि क्या वह उन्हें आज की रात अपना मेहमान बना सकता है? वे सोच रहे थे कि शायद इस प्रकार उन्हें पता चल जाए कि ईश्वर से उस युवा के विशेष संपर्क और स्वर्ग में उसके उच्च स्थान का रहस्य क्या है? उस युवा ने हज़रत मूसा के आग्रह को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने घर ले गया। सबसे पहले उसने खाना तैयार किया और पूर्ण रूप से अपाहिज एक बुढ़िया के पास गया और बड़े धैर्य व संयम से उसे एक-एक निवाला खिलाता रहा यहां तक कि उसका पेट भर गया। फिर उसने उसके कपड़े बदले और बड़े प्रेम व स्नेह के साथ उसे उसके स्थान पर जा कर लिटा दिया। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने, जो उस युवा के कामों को बड़ी गहरी दृष्टि से देख रहे थे, देखा कि उस रात उस युवा ने अपने धार्मिक कर्तव्यों के अतिरिक्त कोई विशेष कार्य नहीं किया। न उसने आधी रात को उठ कर उपासना की, न ईश्वर के समक्ष रोया-गिड़गिड़ाया और न ही कोई विशेष प्रार्थना की। अगले दिन घर से निकलने से पूर्व वह पुनः उस बुढ़िया के पास गया, उसे खाना खिलाया और बड़ी निष्ठा के साथ उसके अन्य काम किए। जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उसके पास से जाने लगे तो उन्होंने पूछा कि यह महिला कौन है जिसे तुमने खाना खिलाया और उसके अन्य काम किए? वह आसमान की ओर देख कर क्या कह रही थी? उस युवा ने कहा, यह मेरी मां है और जब भी मैं इसे खाना खिलाता हूं तो वह ईश्वर से मेरे लिए प्रार्थना करती है कि प्रभुवर! मेरा बेटा मेरी जो सेवा कर रहा है उसके बदले में तू उसे स्वर्ग में अपने पैग़म्बर मूसा का पड़ोसी बना दे। यह सुन कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस युवा को शुभ सूचना दी कि उसके बारे में उसकी मां की प्रार्थना को ईश्वर ने स्वीकार कर लिया है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा अपने बड़े पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को की गई वसीयत के एक भाग पर दृष्टि डालते हैं। वे कहते हैं। कमज़ोर पर अत्याचार सबसे बुरा अत्याचार है। यदि नर्मी, कठोरता का कारण बने तो कठोरता नर्मी हो जाती है। कभी कभी, न समझाने वाला समझा देता है और जिससे उपदेश देने को कहा जाए वह बहका देता है। अपनी वसीयत के इस भाग में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कमज़ोर व असहाय लोगों पर अत्याचार सबसे बुरा अत्याचार होता है क्योंकि वह अपनी प्रतिरक्षा की क्षमता नहीं रखता इसके अतिरिक्त उसके द्वारा अत्याचारी को दिए जाने वाले श्राप के व्यवहारिक होने की भी अधिक संभावना होती है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जब मेरे पिता अर्थात इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपने जीवन की अंतिम घड़ियां बिता रहे थे तो उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया और कहा कि यह बात मेरे पिता ने मरते समय मुझ से कही थी और उन्होंने यह बात अपने पिता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से और उन्होंने हज़रत अली से सुनी थी कि ऐसे व्यक्ति पर अत्याचार करने से डरो जिसका ईश्वर के अतिरिक्त कोई सहायक न हो।

इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत में कहते हैं कि चूंकि कुछ लोगों के साथ नर्मी उनके भीतर अधिक दुस्साहस पैदा होने का कारण बनती है अतः उनके साथ नर्मी से काम नहीं लेना चाहिए। अलबत्ता इस्लाम का आधार, नर्मी व लचक पर है किंतु कभी कभी कुछ लोग इस मानवीय व्यवहार से अनुचित लाभ उठाते हुए अपने बुरे कर्म या हिंसा में वृद्धि करने लगते हैं। इस प्रकार के लोगों के मुक़ाबले में कड़ाई से काम लेकर ही उन्हें सुधारा जा सकता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इसके बाद कहते हैं कि कभी कभी वे लोग भी अच्छा उपदेश दे देते हैं जो उपदेशक नहीं होते और कभी कभी उपदेशक भी लोगों को सही मार्ग से बहका देते हैं। इमाम अली का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को उन लोगों की बातें भी अनसुनी नहीं करनी चाहिए जो उपदेश देने वाले नहीं होते क्योंकि यह संभव होता है कि उनकी बातों में कोई बड़ा अच्छा उपदेश या तत्वदर्शिता का बिंदु हो। और इसके विपरीत कभी कभी उपदेश देने वाले भी ग़लती से या दूसरे कारणों से अपनी बातों से लोगों को बहका देते हैं। इस आधार पर सदैव अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए और दोनों प्रकार के लोगों की सही या ग़लत बातों को समझना चाहिए।


source : hindi.irib.ir
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