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Wednesday 27th of March 2019
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पवित्र रमज़ान-14

पवित्र रमज़ान-14

सर्वसमर्थ व महान ईश्वर कहता है कि मेरे बंदों के लिए सर्वोत्तम उपासना यह है कि वे मेरी दया, कृपा और भलाई की आशा लगाये रहें और मेरे बारे में अच्छा विचार रखें। इस स्थिति में हमारी कृपा व दया उनकी समस्त मांगों की पूर्ति करेगी। उसके पश्चात मेरी क्षमा से वे स्वर्ग में प्रवृष्ट होगें और यह इस कारण है कि मैंने अपना नाम रहमान व रहीम अर्थात क्षमा और दया करने वाला ईश्वर रखा है"चर्चा के आरंभ में हम महान ईश्वर के बारे में सबसे अच्छे विचार, सबसे अच्छी आस्था व संतोष और पवित्र क़ुरआन की आयत के माध्यम से महान ईश्वर की कृपा व दया की मांग करते हैं" हमारे पालनहार हमें और हमारे उन भाइयों को जो हमसे पहले ईमान लाये, क्षमा कर दे और हमारे हृदयों में ईमान लाने वालों के प्रति द्वेष व ईर्ष्या न डाल, हे हमारे पालनहार निःसंदेह तू बहुत प्रेम करने वाला और दयालु है"निःसंदेह रोज़ा व व्रत रखने वाले ईश्वरीय प्रेम और दया में डूबे हुए हैं और पवित्र रमज़ान महीने की मधुर समीर में विदित में कठिन परंतु वास्तव में बहुत ही सुन्दर व आध्यात्मिक क्षण बिता रहे हैं। उनके लिए रोज़ा रखना केवल एक अनिवार्य दायित्व नहीं है बल्कि महान ईश्वर से प्रेम करने का एक रास्ता है। इसके अतिरिक्त कि यह उपासना आत्मा को नर्म करती है, इरादे को मज़बूत करती है और इच्छाओं को संतुलित व नियंत्रित करती है, इस उपासना के बहुत अधिक शारीरिक लाभ हैं। स्वास्थ्य को सुनिश्चित बनाने और आयु के लम्बा करने में उसकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। डाक्टर fritz becker अपनी किताब"रोज़ा तुम्हें मुक्ति दिला सकता है" की भूमिका में कहते हैं"सबसे अधिक विश्वसनीय, किसी प्रकार की हानि न पहुंचाने वाली और उपचार की सबसे अच्छी हानि रहित शैली, रोज़ा उपचार है अर्थात रोज़े के माध्यम से उपचार और उसके साथ किसी भी पद्धति की तुलना नहीं की जा सकती। मेरी दृष्टि में रोज़ा उपचार अमाशय, आंत और स्नायुतंत्र से संबंधित बीमारियों के उपचार की सर्वोत्तम शैली है। रोज़ा उपचार के माध्यम से शरीर में एकत्रित होने वाले पदार्थों की हानि से बचा जा सकता है और कुल मिलाकर शरीर के अंगों को यह अवसर मिल सकता है कि वे अपने महत्वपूर्ण कार्यों को फिर से सुव्यवस्थित कर लें। रोज़ा चीर- फाड़रहित आपरेशन है। जैसाकि डाक्टर सिमर मैन ने उसे स्पष्ट किया है और बीमारियों से रोकथाम में उसके परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती। कहा जा सकता है कि युवा होने और शरीर के अंगों की मरम्मत की सबसे उत्तम शैली रोज़ा है तथा इसकी तुलना उपचार की उस शैली से नहीं की जा सकती जिसमें व्यक्ति की नई कोशिकाओं का प्रत्यर्पण किया जाता है। डाक्टर fritz becker आगे कहते हैं" रोज़ा रखना न भूख सहन करना है और न ही उपचार की एक शैली बल्कि शरीर के लिए एक प्रकार का आराम है जो शरीर को यह संभावना व अवसर देता है कि वह स्वयं को अपनी भीतरी सफाई और शरीर से अतिरिक्त पदार्थों को बाहर निकालने के लिए तैयार करे तथा फिर से स्वयं की सफाई- सुथराई एवं पुनर्निर्माण करे। इस कार्य का चमत्कारिक रहस्य हमारे शरीर की जीवित कोशिकाओं व अंगों के भीतर नीहित है। क्योंकि हर व्यक्ति के अन्दर ईश्वर की ओर से प्रदान की गयी उपचार की एक शक्ति मौजूद होती है"मानसिक दबाव वर्तमान समय की एक प्रचलित बीमारी है। इस प्रकार से कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार विश्व की कुल जनसंख्या के लगभग १२ प्रतिशत लोगों को मानसिक बीमारियों का सामना है और शरीर की ८० प्रतिशत बीमारियां मानसिक दबावों के साथ आरंभ होती हैं। मनोचित्सकों के अनुसार इन दबावों का महत्वपूर्ण कारण समाजों का नैतिकता और आध्यात्म से खाली हो जाना है। मनोचित्सकों ने मानसिक समस्याओं से मुक़ाबले के लिए रास्ते बतायें हैं। जब हम इस समस्या को इस्लाम की दृष्टि से देखते हैं तो हमें ऐसे रास्ते दिखाई पड़ते हैं जो मनुष्य की आंतरिक शांति का कारण बनते हैं। इस्लाम शताब्दियों से विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से विभिन्न जातियों व विभिन्न वर्ण के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रहा है और उनकी जीवन शैली के एक दूसरे से भिन्न होने के साथ उनके सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के लिए सर्वोत्तम क़ानून बनाया है। मानसिक बीमारियों के उपचार का एक मार्ग, जिसका सुझाव इस्लाम ने दिया है, स्वयं पवित्र क़ुरआन पर ध्यान देना है। इस महान ईश्वरीय पुस्तक की वास्तविकतायें असाधारण शैली में बयान की गयी हैं और अपनी चमत्कारिक शैली के साथ ये वास्तविकातायें आत्मा को विशेष कोमलता प्रदान करने के साथ- साथ उसे परिवर्तित करती हैं। पवित्र क़ुरआन की आयतों की गहराइयां इस प्रकार राष्ट्रों को अपनी ओर आकृष्ट करती हैं कि वे अज्ञानता की धूल को साफ़ कर देती हैं और लोगों को अच्छे व्यवहार से परिचित कर देती हैं। पवित्र क़ुरआन पर ध्यान दिये जाने को मानसिक बीमारियों को जड़ से उखाड़ फेकने का सबसे प्रभावी मार्ग समझा जाता है और यह स्वयं पवित्र क़ुरआन की चमत्कारिक महानता व प्रभाव का एक पहलु है। पवित्र क़ुरआन जिसे महान ईश्वर की ओर से मुक्ति व भलाई का मार्ग बयान करने वाली किताब का नाम दिया गया है, अपना परिचय दिलों को मज़बूत करने वाले और उन्हें शांति प्रदान करने वाले के रूप में करता है। जो भी इस ईश्वरीय किताब से अधिक लगाव पैदा करेगा और लगातार उसे पढ़ेगा तो वह अधिक शांति का आभास करेगा। इस प्रकार के व्यक्तियों का जीवन स्वस्थ व सफल होगा। सर्वसमर्थ व महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है कि हमने क़ुरआन को क्रमशः तुमपर उतारा है ताकि उसके माध्यम से मैं तुम्हारे हृदय को मज़बूत बनाऊं। जब मनुष्य का हृदय स्थिर एवं मज़बूत हो जायेगा तो कोई भी दुःख उसकी शांति को नहीं छीन सकता।महान ईश्वर एक अन्य स्थान पर कहता है कि इस किताब का पढ़ना लोगों के ईमान में वृद्धि का कारण बनता है। महान ईश्वर कहता है" मोमिन केवल वे लोग हैं जो जब भी ईश्वर का नाम लिया जाता है तो उनके दिल कांप उठते हैं और जब उन के समक्ष क़ुरआन की आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनके ईमान और बढ़ जाते हैं और वे केवल अपने पालनहार पर भरोसा करते हैं"तो एक अन्य शैली, जिसे जीवन को आनन्दमय और प्रकाशमयी बनाने के लिए सीखना चाहिये, पवित्र क़ुरआन से प्रेम और उसकी जीवनदायक आयतों की तिलावत है जिसे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों में सर्वोत्तम उपासना का नाम दिया गया है। विशेषकर पवित्र रमज़ान महीने की रातों में क़रआन के पढ़ने का बहुत पुण्य है और रमज़ान के पवित्र महीने को क़ुरआन की वसंतु ऋतु कहा गया है। कितना अच्छा हो यदि हम पवित्र क़ुरआन की तिलावत करके महान ईश्वर के उस निमंत्रण का उत्तर दें जिसमें उसने कहा है कि जितना संभव हो सके क़ुरआन पढ़ो"यदि हमारे पास पानी से भरा एक पात्र हो परंतु आटा न हो जिसे हम गूंध सकें तो कभी किसी के दस्तरखान पर रोटी ही नहीं होगी। ईमान स्वच्छ जल की भांति है और अच्छा व भला कार्य आटे की तरह है और उनमें से कोई भी एक दूसरे के बिना मनुष्य को स्वर्ग में नहीं ले जा सकता। यदि हम लोक- परलोक पर गहरा विश्वास रखें परंतु इस विश्वास व आस्था के आधार पर कोई भला कार्य न करें तो उसका क्या लाभ? इसके विपरीत यदि हम कोई अच्छा कार्य करें परंतु महान ईश्वर पर आस्था व ईमान न हो तो वह कार्य इसी ज़मीन पर रह जायेगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हरे- भरे पेड़ को काट कर उसे उसकी जड़ से अलग कर दिया गया है। स्वाभाविक है कि शीघ्र या देर से उस कटे हुए पेड़ का तना सूख जायेगा। अच्छे कार्य के बिना ईमान और ईमान के बिना अच्छे काम का कोई लाभ नहीं है। सर्वसमर्थ व महान ईश्वर उस स्वर्ग की शुभसूचना, जिसके नीचे नहरें बह रही हैं, उसे देता है जिसके पास एक साथ यह दोनों चीज़ें हों यानी ईमान और अच्छे कर्म।


source : irib.ir
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