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Tuesday 21st of May 2019
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हदीसो के उजाले मे पश्चाताप 1

हदीसो के उजाले मे पश्चाताप 1

पुस्तकः पश्चाताप दया की आलिंग्न

लेखकः आयतुल्ला अनसारीयान

 

हज़रत इमाम बाक़िर (अ.स.) का कथन हैः आदरणीय आदम (अलैहिस्सलाम) ने ईश्वर के समक्ष अर्ज़ी पेश कीः हे पालनहार मुझ पर तथा मेरी संतान पर शैतान को प्रबल किया कि वह रक्त के समान घूमता है, हे पालनहार इस की   अपेक्षा मे मेरे लिए क्या निर्धारित किया है?

संबोधन हुआः हे आदम यह वास्तविकता मनुष्य के लिए निर्धारित की है यदि तुम्हारी संतान मे किसी ने पाप करने का सोचा तो उसके कर्मो मे नही लिखा जाएगा, और यदि उसने अपनी सोच विचार के अनुसार पाप कर भी लिया तो उसके कर्मो मे सिर्फ़ एक पाप लिखा जाएगा, परन्तु तुम्हारी संतान मे किसी ने कोई भलाई करने का सोचा तो तुरंत ही उसके कर्मो की सूची मे लिख दिया जाएगा, यदि उसने अपनी सोच विचार के अनुसार भलाई की उसके कर्मो मे दस भलाई लिखी जाएगी; आदम अलैहिस्सलाम ने कहाः हे पालानहार!  इसमे वृद्धि कर दे; आवाज़ आईः यदि तुम्हारी संतान मे किसी ने पाप किया परन्तु उसके पश्चात मुझ से पश्चाताप कर लिया तो मै उसको क्षमा कर दूंगा; दुबारी आदम ने कहाः हे पालानहार! और वृद्धि कर; संबोधन हुआः मैने तुम्हारी संतान के लिए पश्चाताप को रखा तथा उसके द्वार को विस्तृत किया कि तुम्हारी संतान मृत्यु के संदेश से पूर्व पश्चाताप कर सकती है, इस अवसर पर आदम अलैहिस्सलाम ने कहाः हे प्रभु! यह मेरे लिए पर्याप्त है।[1]   



[1]  ـ عن أبي جعفر (عليه السلام) قال : إن آدم (عليه السلام) قال : يا رب ! سلطت علي الشيطان وأجريته مني مجرى الدم فاجعل لي شيئا . فقال : يا آدم ! جعلت لك أن من هم من ذريتك بسيئة لم تكتب عليه فإن عملها كتبت عليه سيئة ومن هم منهم بحسنة فإن لم يعملها كتبت له حسنة وإن هو عملها كتبت له عشرا . قال : يا رب ! زدني . قال : جعلت لك أن من عمل منهم سيئة ثم استغفر غفرت له . قال : يا رب ! زدني . قال : جعلت لهم التوبة وبسطت لهم التوبة حتى تبلغ النفس هذه . قال : يا رب ! حسبي .

अन अबी जाफ़र (अलैहिस्सलाम) क़ालाः इन्ना आदमा (अलैहिस्सलाम) क़ालाः या रब्बे! सल्लतता अलैय्यश्शैतानो व अजरैयतहु मिन्नि मजरद्दमो फजअल ली शैआ फ़क़ालाः या आतमो! जाअलतो लका इन मिनहुम मिन ज़ुर्रियतका बेसय्येअतिन लम तकतुब अलैहे फ़इन अमालहा कतबतो अलैहे सय्येअतन वमनहुम मिनहुम बेहसनतिन फ़इन लमयमलहा कतबतो लहु हसानतन वाइन होवा अमालहा कतबतो लहु अशरा, क़ालाः या रब्बे! ज़िदनी। क़ालाः जाअलतो लका इन मन अमाला मिनहुम सय्येअतन सुम्मा इसतग़फ़रा ग़फ़रतो लहू क़ालाः या रब्बे! ज़िदनी क़ालाः जाअलतो लहोमुत्तोबता व बसत्तो लहोमुत्तोबता हत्ता तोबल्लेग़ुन्नफ़सा हाज़ेही। क़ालाः या रब्बे! हसिबनि। (काफ़ी भाग 2, पेज 440, ईश्वर ने आदम को क्या प्रदान किया का अध्याय, हदीस 1; बिहारुल अनवार, भाग 6, पेज 18, अध्याय 20, हदीस 2)

 

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