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Friday 22nd of March 2019
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मानव जीवन के चरण 6

मानव जीवन के चरण 6

 पुस्तक का नामः दुआए कुमैल का वर्णन

लेखकः आयतुल्लाह अनसारीयान

 

छटा चरणः भ्रूण की सूरत बंदी

 

هُوَ اللّهُ الخالِقُ البارِئُ المُصَوِّرُ لَهُ الأَسْماءُ الْحُسْنَى

 

होवल्लाहुल ख़ालेकुल बारिउल मुसव्वरो लहुल असमाउल हुसना [1]

वह ऐसा परमात्मा है जो निर्माता है, ईजाद करने वाला तथा सूरते बनाने वाला है, उसके बेहतरीन नाम है।

जब यह कोशिकाए पूरी हो जाती है अर्थात भ्रूण के शरीर की आवश्यक सामान का उपलब्ध हो जाता है तत्पश्चात मानव के शरीर को तैयार करने के बहुत से शुक्राणु गर्भाश्य को प्रदान किए जाते है तथा इस प्रकार गर्भाश्य मे मानव का विकास करता है:

ईश्वर की व्यापक दया की छाया तथा उसकी शक्ति से यह अंगिनत कोशिकाए सर्वप्रथम एक दूसरे से अलग हो जाते है तथा प्रत्येक कोशिका अपने स्थान पर चली जाता है, मस्तिष्क की कोशीका, नेत्र की कोशीका तथा कान इत्यादि की कोशीकाए और प्रत्येक कण अपने विशेष भाग को प्राप्त करके मनुष्य के अंगो का गठन करता है जिसके कारण यह कोशिकाए धीरे धीरे मनुष्य की शक्ल प्राप्त कर लेते है।

भ्रूण के बाहिनी ओर एक छोटी सी गोली समान एक वस्तु होती है जो इस भ्रूण का खाघ केंद्र क़रार पाती है और यह गोली रक्त मे दौड़ती रहती है, और आहार, पानी एंव श्वसन का जो कि पाचक प्रणाली एंव आक्सीजन Oxygen  के माध्यम से रक्त मे प्रवेश करता है से प्राप्त करके नाभी के माध्यम से शिशु के शरीर मे प्रवेश करती है।



[1] सुरए हश्र 59, छंद 24

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