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Tuesday 26th of March 2019
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पश्चाताप तत्काल अनिवार्य है 6

पश्चाताप तत्काल अनिवार्य है 6

पुस्तक का नामः पश्चताप दया का आलंगन

लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

 

 . . . وَمَن لَمْ يَتُبْ فَأُولئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ 

 

... वमन लम यतब फ़ऊलाएका होमुज़्ज़ालेमून[1]

पापी को इस तत्थ से जागरूक होना चाहिए, कि पश्चाताप को त्यागना, उसको अत्याचारियो के समूह मे सम्मिलित कर देता है, और अत्याचारी को ईश्वर प्यार (पसंद) नही करता।

 

وَاللهُ لاَ يُحِبُّ الظَّالِمِينَ

 

वल्लाहो लायोहिब्बुज़्ज़ालेमीन[2]

पापी को इस बात से अवग्त होना चाहिए, कि पापी से ईश्वर, उसके दूत तथा दिव्य नेता (औलिया) नफ़रत करते नाराज़ एवं क्रोधित होते है, हज़रत मसीह अपने चेलो (शिष्यो अर्थात हव्वारीयो) को चेतावनी देते है।

 

يَا مَعْشَرَ الْحَوارِيّينَ ، تَحَبَّبُوا اِلَى اللهِ بِبُغْضِ اَهْلِ الْمَعاصِى ، وَتَقَرَّبُوا اِلَى اللهِ بِالتَّباعُدِ مِنْهُم وَالْتَمِسُوا رِضاهُ بِسَخَطِهِمْ

 

या माशरल हव्वारियीना, तहब्बबू एलल्लाहे बेबुग़ज़े अहलिल मआसी, वतक़र्रबु एलल्लाहे बित्तबाओदे मिनहुम वलतमेसू रेज़ाहो बेसख़तेहिम[3]

हे मित्रो! पापी के प्रति घृणा तथा शत्रुता के बजाय स्वयं को ईश्वर के प्रति प्रेमी बनाओ, संक्रमित मनुष्यो से दूरी चयन करते हुए ईश्वर से निकटता बनाओ, पापी के प्रति क्रोधित एवं प्रकोपित होने के बजाय ईश्वर की सहमति की खोज मे रहो।

अपराधी को इस तत्थ से अवग्त होना चाहिए, कि प्रत्येक पाप से संक्रमित होना ईश्वर के समीप उसकी गरीमा, मान एवं व्यक्तित्व मे कमी का कारण है, तथा पशुओ के स्थान बलकि उस से भी नीचे स्थान पर चला जाता है तथा पुनरुत्थान मे अमानवीय शक्ल मे प्रवेश करेगा।

अमीरुल मोमेनीन (अ.स.) ने आज़िब के पुत्र बर्रा से कहाः धर्म को कैसे देखते हो? बर्रा ने उत्तर दियाः इससे पहले कि आप तक पहुँचू, और आपकी विलायत एवं नेतृत्व के आलंगन को अपने हाथो मे थामू, आपकी आज्ञयो का पालन करने से पूर्व यहूदीयो के समान था, पूजा पाठ आज्ञाकारिता, तथा सेवा करना मेरे लिए कम मूल्य थी, हमारे हृदय विश्वास की हक़ीक़त की चमक और आपकी आज्ञाकारिता से पूजा तथा सेवा के मूल्य से अवग्त हुए, अमीरुल मोमेनीन ने बर्रा से कहाः दूसरे लोग पुनरुत्थान मे गधे के समान प्रवेश करेगे, और तुम मे से प्रत्येक व्यक्ति पुनरुत्थान मे प्रवेश करके स्वर्ग की ओर जाओगे।[4]



[1] सुरए हुजरात 49, छंद 11

 

[3] मजमूअए वर्राम (वर्राम का संग्रह), भाग 2, पेज 235; बिहारुल अनवार, भाग 14, पेज 330, अध्याय 21, हदीस 64; मुस्तदरकुल वसाइल, भाग 12, पेज 196, अध्याय 6, हदीस 13865

[4] रिजाले अल्लामए बहरुल उलूम (विद्वान बहरुल उलूम का मानव चरित्र शास्त्र), भाग 2, पेज 127

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