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Monday 17th of February 2020
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निराशा और हताशा नास्तिको की विशेषता है

निराशा और हताशा नास्तिको की विशेषता है

लेखक: आयतुल्लाह हुसैन अनसारियान

                          

किताब का नाम: शरहे दुआ ए कुमैल

 

प्रार्थी को इस तत्थ से वाक़िफ़ होना चाहिए कि दयालु परमेश्वर ने उसको प्रार्थना के लिए आमंत्रित किया है उसने प्रार्थना के स्वीकार होने की गारंटी ली है और प्रार्थना का स्वीकार करना उसके लिए बहुत अधिक सरल और आसान है; क्योकि ब्राह्माण के सभी प्राणि (जीव जन्तु) उसके आदेश के आधीन है, वह एक आदेश का उपयोग करते हुए प्रार्थना स्वीकार करने के सभी रास्ते प्रार्थी को प्रदान करता है।

इसलिए, यह बात सही नही है जिस दयालु परमेश्वर की शक्ति, विजन, करम ओर कृपा, क्षमा, अनुग्रह और दया अनंत है और उसका सेवक (बन्दा) विशेष रूप से प्रार्थना और रहस्य की बाते करते समय हताश और निराश हो। क्योकि हताशा और निराशा क़ुरान के अनुसार नास्तिको की विशेषता है।

لَا تَئسُوا مِن رَوحِ اللہِ إنَّہُ لَا یَئَسُ مِن رَوحِ اللہِ إلّاألقَومُ الکَافِرُونَ

ला तैय्असू मिन रोहिल्लाहे इन्नहु लायय्असो मिन रोहिल्लाहे इल्ललक़ौमुल काफेरूना[१]

परमेश्वर की दया से निराश नरहो; क्योकि नास्तिको के समूह के अलावा कोई भी परमेश्वर की दया से निराश नही होता।

पवित्र क़ुरान पुरज़ोर सिफ़ारिश करता है कि परमेश्वर की दया से निराश नहो:

لَا تَقنَطُوا مِن رَحمَتِ اللہِ

ला तक़नतू मिन रहमतिल्लाहे[२]

हज़रत मुहम्मद का कथन है:

الفَاجِرُ الرَاجِی لِرَحمَتِ اللہِ تَعَالیٰ أقرَبُ مِنھَا مِنَ العَابِدِ المُقَنَّطِ

अलफ़ाजेरुल राजी लेरहमतिल्लाहे तआला अक़रबो मिनहा मिनलआबेदिल्मुक़न्नते[३]

दुष्ठ व्यक्ति निराश पुजारी से परमेश्वर की दया से अत्यधिक नज़दीक होता है।

शियो के छटे इमाम हज़रत जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने कहा:

ألیَاسُ مِن رَوحِ اللہِ أشدُّ بَرداً مِنِ الزَّمھَرِیرِ

अलयासो मिन रोहिल्लाहे अशद्दो बरदम मिनज़्ज़महरीरे[४]

परमेश्वर की दया से निराश होना ठंडक के गंभीर मौसम की शीतलता से अत्यधिक गंभीर है।

रिवायात एवं इस्लामी ज्ञान, परमेश्वर की दया से निराशा और हताशा घातक पाप (वरिष्ठ पाप) माना जाता है, और परमेश्वर की दया से निराश होने हेतु निश्चित एगोनी (अज़ाब) का वचन दिया है।

प्रर्थी की प्रार्थना शीघ्र स्वीकार ना हो तो प्रार्थी को निराश और हताश नही होना चाहीये। क़ुरान के छंदो और रिवायात के अनुसार, शायद उसकी प्रार्थना के स्वीकृत होने मे मसलहत नही थी अथवा संभवत: प्रार्थना के स्वीकृत होने का समय नही आया है और वह अपनी प्रार्थना एवं रहस्य (मुनाजात) को जारी रखे, उसे स्वीकृत होने से रोका गया है, या अनन्त के उस हिस्से के लिए जिस से सदैव लाभ प्राप्त करता रहे, पुनरुत्थान (क़यामत = संसार की समाप्ति) उसकी प्रार्थना के स्वीकार होने का समय है।

वैसे भी पर्म परमेश्वर की दया से निराश होना, किसी भी प्रकार से मानसिक, धार्मिक, नैतिक एंव मानवीय नही है, और आस्तिक कभी भी परमेश्वर की दया से निराश नही होता और हताशा एंव उत्साहभंग करने वाली वस्तुओ को अपने अंदर जन्म लेने नही देता।

प्रार्थना और उसके स्वीकार होने के विषय से संबंधित अत्यधिक महत्वपूर्ण रिवायात (कथनो के छंद) इस्लामी मूल्यवान पुस्तको मे पंजीकृत है जैसे:

इमाम सादिक़ (अ.स।) का कथन है:

إنَّ العَبدَ لَیَدعُو فَیَقُولُ أللہُ عَزَّ وَ جَلَّ لِلمَلَکَینِ: قَدَ أستَجَبتُ لَہُ، و لکَنَ أحبَسُوہُ بِحَاجَتِہِ؛ فَإنِّی أُحِبُّ أَن أَسمَعَ صَوتَہُ۔ وَ إِنَّ العَبدَ لَیَدعُو فَیَقُولُ أللہُ تَبَارَکَ وَ تَعَالیٰ: عَجِّلُو لَہُ حَاجَتَہُ؛ فَإنِّی أُبغِضُ صَوتَہُ!!

इन्नलअबदाल्यदऊ फ़यक़ूलुल्लाहो अज़्ज़ावजल्ला लिलमलकैने: क़दिस्तजबतो लहु, वलाकेनहबसूहो बेहाजतेही; फ़इन्नी ओहिब्बो अनअसमओ सौतहू। वइन्नलअबदाल्यदऊ फ़यक़ूलुल्लाहो तबारका वतआला: अज्जेलू लहु हाजतहू; फ़इन्नी अबग़ेज़ो सौतहू!! [५]

जब वास्तव मे मनुष्य प्रार्थना करता है तो परमेश्वर दो स्वर्गीयदूतो (फ़रिशतो) से कहता है: मैने इसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है, परन्तु इसकी आवश्यकता को स्थागित करे रहो ताकि यह अपनी प्रार्थना को जारी रखे: क्योकि मै इसकी आवाज़ को सुनना पसन्द करता हूँ। और जब मनुष्य प्रार्थना करता है तो पर्म परमेश्वर कहता है: कि इसकी आवश्यकता को पूरा करने मे जल्दी करो, क्योकि मै इसकी आवाज़ से घृणा करता हूँ।

عَن منصور الصَّیقَل قَالَ: قُلتُ لِأبِی عَبدِ أللہِ عَلَیہِ السَّلَام : رُبَّمَا دَعَا ألرَجُلُ بِالدُّعَاءِ فَأستُجِیبَ لَہُ ثُمَّ أُخِّرَ ذَلکَ إِلَی حِین۔ قَالَ : فَقَالَ: نَعَم۔ قُلتُ: وَ لِمَا ذَاکَ لِیَزدَادَ مَنَ الدُّعَاءِ؟ قَالَ: نَعَم۔

अन मनसूरिस्सैक़ल क़ाला: क़ुलतो ले अबिअब्दिल्लाहे अलैहिस्सलाम: रुब्बमा दाअर्रजोलो बिद्दोआए फ़स्तोजीबालहू सुम्माउख़्ख़ेरा ज़ालेका एलाहीनिन। क़ाला: फ़क़ला: नआम। क़ुलतो: वलेमा ज़ाका लेयज़दादा मिनद्दोआए? क़ाला: नआम।[६]

मंसूर सैक़ल कहते है: मैने इमाम सादिक (अ.स.) से प्रश्न किया: जब कोई व्यक्ति प्रार्थना करता है तो स्वीकार भी हो जाती है फ़िर उसके उत्तर देने मे पुनरुत्थान (संसार की समाप्ति) तक देरी की जाती है। इमाम ने उत्तर दिया: हाँ। मैने कहा: क्या इसका कारण यह है कि अधिक प्रार्थना करे? इमाम ने उत्तर दिया: हाँ ऐसा ही है।   



[१] सूरए यूसुफ़ 12, आयत 87

[२] परमेश्वर की दया से निराश नहो। सूरए ज़ुमर 39, आयत 53

[३] कनज़ुल उम्माल, भाग 3, पेज 140, हदीस 5869; मिज़ानुलहिकमत, भाग 10, पेज 5046, बाबुल क़ुनूत, हदीस 17109

[४] अलख़ेसाल, भाग 2, पेज 348, हदीस 21; मुसतदरकुल वसाइल, भाग 12, पेज 59, पाठ 64, हदीस 13507

[५] अलकाफ़ी, भाग 2, पेज 489, पाठ मन अबतअत अलैहिल इजाबत, हदीस 3; वसाएलुश्शिया, भाग 7, पेज 61 62, पाठ 21, हदीस 8728

[६] अलकाफ़ी, भाग 2, पेज 489, पाठ मन अबतअत अलैहिल इजाबत, हदीस 2; वसाएलुश्शिया, भाग 7, पेज 61, पाठ 21, हदीस 8727

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